मीडिया कंपनियों की पत्रकारिता को ‘मुख्यधारा’ कहना बंद कीजिए : अनिल चमड़िया

मीडिया कंपनियों की पत्रकारिता को ‘मुख्यधारा’ कहना बंद कीजिए : अनिल चमड़िया
  •  बिहार विधान परिषद, पटना के उप भवन सभागार में हुआ आयोजन
  • ‘मुख्यधारा की पत्रकारिता और वैकल्पिक मीडिया की भूमिका’ विषय पर भी हुई परिचर्चा
  • पटना विश्वविद्यालय व पटना काॅलेज के एमजेएमसी व बीएमसी के छात्र-छात्राओं ने भी की शिरकत

पटना। हिन्दी मीडिया को मुख्यधारा की मीडिया कहना कहीं से भी संगत नहीं है. इसे मीडिया कंपनियां चलाती हैं और इनमें सीमेंट या जूट बनाने वाली कंपनियां भी शामिल रही हैं, जिनका लोकतंत्र से कोई सीधा रिश्ता नहीं रहा है. लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 19 में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है.

ये बातें वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने बिहार विधान परिषद के उप भवन सभागार में 21 सितंबर को अप्पन समाचार फाउंडेशन (एएस फाउंडेशन), मुजफ्फरपुर द्वारा आयोजित ‘अप्पन समाचार’ पुस्तक के विमोचन सह परिचर्चा कार्यक्रम में कहीं. परिचर्चा का विषय ‘मुख्यधारा की पत्रकारिता और वैकल्पिक मीडिया की भूमिका’ था. कार्यक्रम की अध्यक्षता राजकीय डिग्री कॉलेज चनपटिया, पश्चिम चंपारण के प्राचार्य सह सीनेटर प्रो. (डॉ.) संजय कुमार सुमन ने की. संचालन बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के पीजी हिंदी विभाग में वरीय सहायक प्राध्यापक व कहानीकार डॉ. सुशांत कुमार ने तथा अध्यापक व पत्रकार धन्यवाद ज्ञापन अमृतांज इंदीवर ने किया.

मीडिया कंपनियों की पत्रकारिता को ‘मुख्यधारा’ कहना बंद कीजिए : अनिल चमड़िया

कार्यक्रम में करीब 150 गणमान्य नागरिकों, ग्रामीणों, पत्रकारिता के छात्रों, शिक्षकों, पत्रकारों, अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों की उपस्थिति रही. मुजफ्फरपुर जिले के चांदकेवारी और हुस्सेपुर पंचायत से भी बड़ी संख्या में ग्रामीण कार्यक्रम में शामिल हुए। इन दोनों पंचायतों से लालबाबू राय (शिक्षक), लालबाबू पटेल, प्रमोद भगत, राजकुमार दास (पूर्व सरपंच) सहित दर्जनों ग्रामीणों ने कार्यक्रम में शिरकत की.

इस अवसर पर पूर्व राज्यसभा सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार अली अनवर, वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया, वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार, पटना साइंस कॉलेज की प्राचार्य प्रो. अलका यादव, राजकीय डिग्री कॉलेज चनपटिया, पश्चिम चंपारण के प्राचार्य सह सीनेटर प्रो. (डॉ.) संजय कुमार सुमन और वरिष्ठ पत्रकार व अप्पन समाचार के सूत्रधार डॉ. संतोष सारंग ने संयुक्त रूप से ‘अप्पन समाचार’ पुस्तक का लोकार्पण किया. इसके पूर्व सभी ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया.

इस दौरान ‘अप्पन समाचार’ की रिपोर्टिंग टीम की महिला पत्रकारों यानी कम्युनिटी रिपोर्टरों— सिमरन सहनी, अनिता कुमारी, काजल कुमारी, नेहा कुमारी, प्रियंका कुमारी, गुड़िया कुमारी, रिंकल कुमारी, रिमझिम कुमारी, प्रियंका कुमारी, वंदना कु

मारी और नैना सुहानी को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया. लगभग दो दशक पूर्व कस्बाई और ग्रामीण इलाके में शुरू की गई इनकी पत्रकारिता की सभी वक्ताओं ने सराहना की.

मुख्यधारा की मीडिया की अवधारणा पर सवाल

वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने मुख्यधारा की मीडिया की अवधारणा पर ही सवाल खड़ा किया. उन्होंने कहा कि हम अनावश्यक रूप से इसे महिमामंडित करते रहे हैं और इसके विकल्प की बात करते रहे हैं, जबकि सच यह है कि ‘मुख्यधारा की मीडिया’ की यह अवधारणा ही सवालों के घेरे में है. उन्होंने कहा कि पहले प्रेस आयोग की रिपोर्ट पर 1955 में संसद में हुई बहस के दौरान मीडिया को लेकर जो चिंताएं व्यक्त की गई थीं, उनमें से अनेक चिंताएं आज 2026 में भी बनी हुई हैं.

उन्होंने कहा कि जिसे हम मुख्यधारा की मीडिया कहते हैं, वह वास्तव में मीडिया कंपनियां हैं, जिन्हें सीमेंट या जूट बनाने वाली कंपनियां भी चलाती रही हैं. इनका लोकतंत्र से कभी सीधा रिश्ता नहीं रहा. टेलीविजन और प्रिंट मीडिया की बात करें, तो इसके बड़े हिस्से पर लगभग 50 कारोबारी घरानों के नियंत्रण की चर्चा होती रही है. इसलिए मीडिया कंपनियों की पत्रकारिता को मुख्यधारा की पत्रकारिता कहना बंद करना चाहिए.मीडिया कंपनियों की पत्रकारिता को ‘मुख्यधारा’ कहना बंद कीजिए : अनिल चमड़िया

श्री चमड़िया ने कहा कि हमारे समय की विडंबना यह है कि हम बात समाजवाद की करते हैं, लेकिन जीना पूंजीवाद में चाहते हैं. हम ठहरे हुए लोग हैं और आज इसी ठहराव को तोड़ने की जरूरत है. यह कैसे हो सकता है, इस पर गंभीरता से विचार करना होगा. उन्होंने सवाल उठाया कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ क्या है? मीडिया को चौथा स्तंभ क्यों कहा जाता है और यह धारणा कहां से आई? लोकतंत्र की पूरी अवधारणा हमारे संविधान में लिपिबद्ध है. संविधान के अनुच्छेद 19 में नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है. इसका मतलब है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है. लेकिन सारी शक्तियां कंपनियों के हवाले कर दी गई हैं.

आज बहुत-सी कंपनियों द्वारा मीडिया संस्थान चलाए जा रहे हैं. जाहिर है कि इस पेशे में ताकत, पैसे और संसाधन अर्जित करने का ग्राफ सबसे अधिक है. आजादी के आंदोलन में मीडिया की भूमिका का संदर्भ देते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि उस दौर में किन कंपनियों के अखबारों की भूमिका थी? उन्होंने कहा कि एक दौर में छोटे-छोटे अखबारों की जो भूमिका थी, वह आज लगभग खत्म कर दी गई है. यह सही है कि ऐसे अखबार सीमित संख्या में निकलते थे, लेकिन उनका प्रभाव बहुत व्यापक था. बंगाल से कोई अखबार निकलता था, तो पंजाब तक पहुंचता था. तब हर जिले में ऐसे छोटे-छोटे अखबार होते थे, जो जनता की आवाज मुखर करते और सत्ता को असहज करते थे. इन अखबारों और उनके प्रयासों को समाज के हाशिये पर डाल दिया गया.

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आज की पत्रकारिता की चर्चा करते हुए श्री चमड़िया ने कहा कि एल्गोरिदम ने हमें एक खास तरह के वातावरण में घेर लिया है और तकनीक ने हमें पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया है. यह एक बड़ी चुनौती है. हम दौड़ते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तव में हम ठहरे हुए हैं. उन्होंने कहा कि हम खुद को आधुनिक सिद्ध करते हैं, लेकिन विचारों में उतने ही पीछे हैं. आधुनिकता का संबंध हमेशा विचारों से होता है.

‘अप्पन समाचार’ ग्रामीण समाज की आवाज का दस्तावेज

‘अप्पन समाचार’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यह बहुत अच्छा काम किया गया है. इसे वे दस्तावेजीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखते हैं. हाशिये के समाज से आने वाली लड़कियों ने समाज को जागरूक करने की दिशा में एक अलग तरह का काम किया है. उन्होंने कहा कि इन लड़कियों ने एक चुनौतीपूर्ण काम पूरा किया है.

उन्होंने कहा कि मीडिया कंपनियां पत्रकारों से अपने हित में काम करवाती हैं और वे कभी नहीं चाहतीं कि व्यापक दायरे में समाज को देखने और उसका विश्लेषण करने की क्षमता पत्रकारों में विकसित हो. कम्युनिटी रेडियो समाज की व्यापक चिंताओं का मंच बने, यह अच्छी बात है. उन्होंने कहा कि यदि तकनीक लोकतंत्र के सवालों पर गुस्सा करने के बजाय केवल आपका मनोरंजन करने लगे, तो यह दुखद है. तकनीक की क्षमता को हमेशा व्यापक सामाजिक सवालों की परिधि में देखना चाहिए.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. (डॉ.) संजय कुमार सुमन ने कहा कि ‘अप्पन समाचार’ समाज और सत्ता के घातक प्रश्नों के खिलाफ आवाज उठाने की एक सशक्त पहल का खूबसूरत दस्तावेजीकरण है। उन्होंने कहा कि जब अखबारों का नियंत्रण बड़ी-बड़ी कंपनियां करने लगे, तो यह चिंता का विषय है कि हमारा लोकतंत्र और संविधान किस रूप में सुरक्षित है.

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स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की चर्चा करते हुए श्री सुमन ने कहा कि तब पत्रकार छोटे-छोटे कमरों में बैठकर बहुत श्रम से पत्र-पत्रिकाएं निकाला करते थे. विषम परिस्थितियों में पुलिस और खुफिया तंत्र उनके पीछे लग जाता था और उन्हें जान जोखिम में डालकर वहां से भागना पड़ता था. पत्रकारिता को लेकर जो जोखिम उस दौर में था, वह आज भी कम नहीं हुआ है. ‘अप्पन समाचार’ की इन बेटियों ने भी कम जोखिम उठाए. उन्होंने अपने पंचायत के अधिकारियों के पसीने छुड़ाए और अपने आसपास सकारात्मक वातावरण पैदा किया. उन्होंने कहा कि जातियों में बंटे भारतीय समाज में जब तक जातियों के भीतर का श्रेष्ठताबोध खत्म नहीं होगा, तब तक समाज का भला नहीं हो सकता.

गांव की बेटियों को पत्रकारिता से जोड़ने का प्रयास

पूर्व राज्यसभा सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार अली अनवर ने कहा कि संतोष सारंग बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने हमारी बहन-बेटियों की ऐसी टीम तैयार की, जो समाज के लिए नजीर बन सकती है. आईआईएमसी की डिग्री लेकर बहुत सारे लोग पत्रकारिता कर रहे हैं, यह नई बात नहीं है, लेकिन सुदूर गांवों से हाशिये के समाज की बच्चियों को तैयार करना और उन्हें पत्रकारिता से जोड़ना अनोखा काम है. यह ऐसी मिसाल है, जिस पर समाज का ध्यान जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि मेनस्ट्रीम मीडिया आज हास्यास्पद स्थिति में पहुंच गई है और ऐसे में उम्मीद सोशल मीडिया से बंधती है. अपने पत्रकारीय जीवन की चर्चा करते हुए अली अनवर ने कहा कि वे ‘एक्सीडेंटल पत्रकार’ हैं. उन्होंने पत्रकारिता की औपचारिक पढ़ाई नहीं की, लेकिन हमेशा एक एक्टिविस्ट की तरह काम किया. राज्यसभा में भी इसी अंदाज में काम किया. व्यवस्था के खिलाफ लिखना ही उनकी असली जवाबदेही रही है.

अली अनवर ने अपने पत्रकारीय जीवन के अनुभवों और विभिन्न घटनाओं का उल्लेख करते हुए छोटे अखबारों और वैकल्पिक पत्रकारिता की भूमिका पर चर्चा की. उन्होंने ‘अप्पन समाचार’ की पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह काम आगे चलकर प्रभाव पैदा करेगा और समाज के दूसरे लोग भी इसका अनुकरण करेंगे.

वैकल्पिक पत्रकारिता की जरूरत

वरिष्ठ कथाकार संतोष दीक्षित ने कहा कि ‘अप्पन समाचार’ सामुदायिक स्तर पर मीडिया में किए गए अच्छे काम का दस्तावेज है. उन्होंने कहा कि विज्ञापनों से भरे आज के समाचार माध्यम सरकार के अधिक मुखापेक्षी हो गए हैं. पत्रकारिता का मुख्य काम सूचना देना और निगरानी रखना है, लेकिन यह दुखद है कि आम जनता से जुड़ीं आवाजें ऊपर तक नहीं पहुंच रही हैं. इसकी मुख्य वजह यह है कि समाचार पत्र बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों की इजारेदारी में आ गए हैं और जनता के मुद्दों की उपेक्षा की जा रही है.

उन्होंने कहा कि आम लोगों का इस मीडिया से भरोसा लगभग उठ गया है. आज वैकल्पिक मीडिया की जरूरत सबसे अधिक महसूस हो रही है. नागरिक पत्रकारिता कई मामलों में अच्छी है, लेकिन कुछ मामलों में खतरनाक भी हो सकती है. मुख्यधारा की मीडिया में एक अच्छी बात यह थी कि किसी घटना को संवाददाता संज्ञान में लेता था और वह संपादक के माध्यम से गुजरकर खबर बनती थी. वैकल्पिक मीडिया में संपादक की भूमिका कमजोर हुई है, इसलिए मनमानियां भी बढ़ी हैं और किसी तरह का नियंत्रण नहीं रह गया है. ‘अप्पन समाचार’ के संवाददाताओं की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि वे उनकी आवाज का स्वागत करते हैं और यह आवाज दूर तक जाएगी, बशर्ते वे अपनी चुप्पियों को भी हथियार बनाएं.

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कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. सुशांत कुमार ने कहा कि जिस समय सोशल मीडिया की धूम भी नहीं थी, उससे पहले संतोष सारंग ने गांव की किशोरियों को ‘अप्पन समाचार’ के माध्यम से प्रशिक्षित किया. मुजफ्फरपुर के सुदूर पिछड़े गांवों से इस अभियान की शुरुआत हुई और कम समय में इसका असर दिखाई देने लगा. वर्ष 2007 में संतोष सारंग के मन में इस न्यूज नेटवर्क का विचार आया और इसके लिए उन्होंने मुजफ्फरपुर के अत्यंत पिछड़े गांवों की महिलाओं का चयन किया. ग्रामीणों के मन में इस अभियान को लेकर कई तरह की आशंकाएं थीं, लेकिन काम आगे बढ़ने के साथ लोगों का कारवां भी बनता गया.

ग्रामीण पत्रकारिता की यात्रा और ‘अप्पन समाचार’

संतोष सारंग ने अकबर इलाहाबादी की प्रसिद्ध कविता— “खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो / जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो” को उद्धृत करते हुए सवाल उठाया कि आखिर किसके लिए अखबार निकालें? उन्होंने कहा कि मुख्यधारा की मीडिया की हालत सामने है और वह गोदी मीडिया के रूप में देखी जा रही है.

मुजफ्फरपुर के पारू प्रखंड के दियारा इलाके में जब ‘अप्पन समाचार’ की बुनियाद रखी गई थी, तब वह इलाका बेहद खतरनाक माना जाता था। वहां दिनदहाड़े गोलियां चलती थीं। इसके बावजूद अमृतांज इंदीवर, फूलदेव पटेल, पंकज सिंह, राजेश कुमार जैसे मित्रों की मदद से 45 मिनट की पहली बुलेटिन तैयार की गई.

उन्होंने कहा कि यह पहल सत्ता या पूंजीपतियों के किसी गिरोह के खिलाफ खड़ी करने के लिए नहीं, बल्कि गांव, गरीबों, मजदूरों और किसानों की समस्याओं को अभिव्यक्ति देने के लिए शुरू की गई थी. 45 मिनट की इस बुलेटिन को प्रोजेक्टर के माध्यम से लोगों को दिखाया जाता था. इसका व्यापक सामाजिक प्रभाव देखने को मिला.

इस काम को आगे बढ़ाने में दियारा इलाके की लड़कियां सामने आईं. उन्होंने कहा कि यदि इस काम का दस्तावेजीकरण नहीं किया गया और इन बहादुर लड़कियों की कहानियां सामने नहीं आईं, तो एक प्रेरक कहानी खत्म हो जाएगी. आज इस पहल पर कई विश्वविद्यालयों में शोध हो रहे हैं. गांव के वंचित समुदाय की इन बेटियों की कहानी को बतौर संपादक हिंदी के सहायक प्राध्यापक व कहानीकार डॉ. सुशांत कुमार और अध्यापक व पत्रकार अमृतांज इंदीवर ने पुस्तक का रूप दिया है.

पटना साइंस कॉलेज की प्राचार्या प्रो. अलका यादव ने कहा कि आज का दिन अभिमान का दिन है. हमारी बेटियों ने अरसा पहले जो संघर्ष शुरू किया था, आज उन्होंने उस संघर्ष की एक महत्वपूर्ण यात्रा पूरी की है. उनका यह काम महिलाओं को हर स्तर पर आगे ले जाने में मदद करेगा.

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत कुमार ने सवाल उठाया कि मुख्यधारा की मीडिया की भूमिका आखिर किधर है? उन्होंने कहा कि यह मीडिया आज जनता के साथ खड़ी नहीं दिखाई देती, इसलिए जनता के पास विकल्प के रूप में सोशल मीडिया है. इसने समानांतर मंच के रूप में जनता के बीच अपनी पहुंच बनाई है और लोगों को अपनी बात कहने का अवसर दिया है. बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन जैसे मुद्दों को सोशल मीडिया ने जगह दी है. इसने हाशिये के समाज को बोलने का मंच दिया और अपनी बात सबके सामने रखने का हुनर सिखाया.

संघर्ष से दस्तावेज तक

धन्यवाद ज्ञापन करते हुए अमृतांज इंदीवर ने ‘अप्पन समाचार’ शुरू करने की पृष्ठभूमि बताई. उन्होंने कहा कि जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब गांव में न सड़क थी, न बिजली. पूरा गांव शिक्षा के अंधकार में डूबा हुआ था. लोग नक्सली बन रहे थे और बंदूक उठा रहे थे. आर्थिक रूप से सक्षम लोग गांव से पलायन कर शहरों की ओर जा रहे थे. अशिक्षा के कारण गांव के युवा गलत रास्ते पर जा रहे थे. हमारे पास कलम के सिवा कोई हथियार नहीं था. इन्हीं परिस्थितियों के बीच ‘अप्पन समाचार’ की नींव रखी गई.

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उन्होंने कहा कि उन्होंने इस पहल को बहुत करीब से बनते देखा है. उस समय जिला स्तर का कोई अधिकारी भी अपने लाव-लश्कर के साथ वहां मुश्किल से पहुंच पाता था. नदी किनारे का वह दियारा इलाका ऐसा ही था. इसी वातावरण और परिवेश में संतोष सारंग ने गांव में ‘अप्पन समाचार’ को खड़ा किया. पहले वे स्वयं जुड़े, फिर उनके प्रयास से अनीता कुमारी, खुशबू, रूबी कुमारी, पिंकी कुमारी, अनिता राम, सविता कुमारी, रेणु कुमारी, अश्विनी पासवान, जुबेहा खातून जैसी लड़कियां तैयार हुईं और उसके बाद गांव में लड़कियों की एक और टीम बनी. लोगों ने कहा कि यह लड़कियों को बर्बाद कर रहा है, लेकिन जब यह टीम तैयार हुई तो दुनिया भर से मीडिया के छात्र-छात्राएं वहां पहुंचने लगे.

उन्होंने बताया कि बीच में आर्थिक संकट के कारण कुछ साल तक यह पहल बंद रही. इतने वर्षों में सामूहिक प्रयास से जो सकारात्मक वातावरण बना था, वह फिर से छिन्न-भिन्न होने लगा. गांव एक बार फिर अराजकता की ओर बढ़ने लगा. ऐसे समय में तीनों ने मिलकर इस पहल को पुस्तक का रूप देने का निर्णय लिया.

उन्होंने कहा कि आज गांव में तेजी से शहरीकरण फैल रहा है और प्रदूषण बढ़ रहा है. युवा नकारात्मक खबरों में लगे हैं, विकासात्मक लेखन लगभग नहीं हो रहा. नीम और बरगद काटे जा रहे हैं, कुएं और तालाब भरे जा रहे हैं. आज फिर गांव को एक मजबूत इकाई के रूप में खड़ा करने की जरूरत है और इस काम में युवाओं तथा लड़कियों की बड़ी भूमिका होनी चाहिए.

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कार्यक्रम में शैलेंद्र कुमार, स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन, युवा कवि अरविंद पासवान, सामाजिक कार्यकर्ता भीष्म कुमार, डॉ. हेमनारायण विश्वकर्मा, वरीय पत्रकार प्रभात कुमार, डॉ. रिंकु कुमारी, प्रो. उपेन्द्र प्रसाद, आरएन कालेज, हाजीपुर में हिंदी की सहायक प्राध्यापक डॉ सोनल, भूपाल भारती, सहायक प्राध्यापक डॉ. अविनाश कुमार, पर्यावरण कार्यकर्ता सिद्धांत सारंग, शत्रुघ्न साहू, फुलदेव पटेल, अजय शर्मा, राकेश साहू सहित अनेक लोग उपस्थित थे।

कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि सभागार में शहर और गांव दोनों की भागीदारी दिखाई दी. ग्रामीणों को अंगवस्त्र देकर एवं अप्पन समाचार को पर्दे के पीछे से सींचने वाले युवाओं/लोगों को भी मोमेंटो व अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया. एक ओर पत्रकारिता, शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोग मौजूद थे, वहीं दूसरी ओर चांदकेवारी और हुस्सेपुर पंचायत सहित विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों से आए लोगों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. लगभग 150 लोगों की इस सामूहिक भागीदारी ने ‘अप्पन समाचार’ की उस मूल भावना को सामने रखा, जिसके केंद्र में गांव, ग्रामीण समाज, महिलाएं, किशोरियां और समुदाय की अपनी आवाज है.

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