– राकेशरेणु
2009-10 के आसपास की बात होगी. यूं तो मुजफ्फरपुर घर-आंगन सरीखा है, फिर भी इस बार वहां एक कार्यक्रम के सिलसिले में जाना हुआ था. वहीं अप्पन समाचार के संतोष सारंग से पहली मुलाक़ात हुई. वे एक राष्ट्रीय अख़बार के स्थानीय संस्करण से जुड़े भारतीय वसंत कुमार के साथ आए थे. अप्पन समाचार अभी नया-नया था. सामुदायिक मीडिया का यह प्रकल्प संतोष सारंग की अनूठी परिकल्पना थी. संतोष जी उसकी कार्यशैली के बारे में बता रहे थे. उपलब्धियों के बारे में भी. ग्रामीण किशोरियों-युवतियों को लेकर स्थानीय खबरों के संकलन, प्रसारण के क्षेत्र में अभिनव प्रयोग कर रहा था. बहुत सीमित संसाधन और पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा के बगैर ये युवतियां गांव, गांववासियों और खेती से जुड़ी समस्याओं को सशक्त तरीक़े से प्रसारित कर रही थीं.
यह वह दौर था जब यूट्यूब पर समाचार प्रसारण की शुरुआत नहीं हुई थी. मीडिया का गोदी मीडिया में कायांतरण और पतन नहीं हुआ था. देश में अघोषित दीर्घकालीन आपातकाल नहीं लगा था. जब सोशल मीडिया शैशवावस्था में था. इंटरनेट का वैसा प्रसार नहीं हुआ था जैसा अब है. इस परिदृश्य में मुजफ्फरपुर और उत्तर बिहार की किशोरियों ने पत्रकारिता के क्षेत्र में एक अभिनव और युगांतकारी पहल की. इसी के आसपास अथवा ठीक इसके बाद छत्तीसगढ़ से खबर लहरिया का प्रसारण शुरू हुआ.
कैमरे और कलम से स्थानीय पत्रकारिता के क्षेत्र में क्रांतिकारी पहल करने वाली उन्हीं ग्रामीण किशोरियों और महिलाओं के संघर्ष की कहानी अब एक किताब में जिल्दबंद की गई है. किताब का नाम वही है जो इस सामुदायिक मीडिया का नाम है- अप्पन समाचार. संपादक हैं इस अभिनव पहल से जुड़े डॉ सुशांत कुमार और अमृतांज इंदीवर.
अप्पन समाचार में इस प्रयास से जुड़ी महिलाओं और किशोरियों के लोमहर्षक तथा उत्साहवर्धक आत्म वृत्तांत तो हैं ही, अनेक वरिष्ठ पत्रकारों के आलेख भी इसमें शामिल किए गए हैं. इन आलेखों से पारंपरिक पत्रकारिता के सामने उपस्थित चुनौतियों और सीमाओं को भी समझा जा सकता है. इसके बरक्स पत्रकारिता के अनौपचारिक व नवाचारी स्वरूपों के सामर्थ्य को भी समझा जा सकता है. ग्रामीण अंचलों से उठ रही आवाजों को जानने-सुनने की इच्छा रखने वालों और सामुदायिक पत्रकारिता के बदलते स्वरूप में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह एक अनिवार्य पुस्तक है.
(लेखक राकेशरेणु सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित साहित्यिक-सांस्कृतिक मासिक पत्रिका ‘आजकल’ के पूर्व संपादक हैं. वे एक सुपरिचित कवि व लेखक हैं. उन्होंने फेसबुक वॉल पर अप्पन समाचार के बारे में लिखा है.)