एएस फाउंडेशन के बैनर तले ‘भारतीय मीडिया : सच के कितने पास, तथ्य से कितने परे’ विषय पर विमर्श आयोजित
मुजफ्फरपुर, 1 नवंबर। आजादी के बाद भारतीय मीडिया का समाजशास्त्र समय के साथ बदलता गया है। इसी बदलाव के कारण आज मीडिया की निष्पक्षता, निर्भीकता और विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। वर्तमान मीडिया को आजादी के दौर की पत्रकारिता से सीख लेने की जरूरत है। उस समय पत्रकारिता सत्ता के सामने सवाल खड़े करने और जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का माध्यम थी। ये बातें इतिहासकार एवं लेखक डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने कहीं।

वे रविवार को आमगोला स्थित शहनाई बैंक्वेट हॉल में एएस फाउंडेशन, मुजफ्फरपुर के तत्वावधान में ‘अप्पन समाचार’ पुस्तक के बहाने आयोजित ‘भारतीय मीडिया : सच के कितने पास, तथ्य से कितने परे’ विषयक वैचारिक विमर्श को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में शिक्षाविदों, साहित्यकारों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शोधार्थियों और बुद्धिजीवियों ने समकालीन भारतीय मीडिया की भूमिका, उसकी विश्वसनीयता, सामाजिक जवाबदेही और लोकतंत्र में उसकी प्रासंगिकता पर गंभीर विचार-विमर्श किया।

विमर्श के मुख्य वक्ता प्रख्यात लेखक एवं चिंतक डॉ. हरिनारायण ठाकुर ने कहा कि मीडिया को अपनी निष्पक्ष और जिम्मेदार भूमिका कभी नहीं भूलनी चाहिए। दुर्भाग्य से आज पारंपरिक पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य से विमुख होती दिखाई दे रही है। मीडिया की सार्थकता आम आदमी के जीवन, संघर्ष और सवालों को सामने लाने में है। उन्होंने ‘अप्पन समाचार’ के प्रयासों की सराहना करते हुए जनसरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता को समय की आवश्यकता बताया।

लेखक एवं चिंतक अरुण नारायण ने बिहार की पत्रकारिता के इतिहास के परिप्रेक्ष्य में पारंपरिक और वैकल्पिक मीडिया की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज के वास्तविक सवालों को सामने लाना और लोकतांत्रिक चेतना को मजबूत करना है। तथ्यपरक पत्रकारिता ही लोकतंत्र का आधार है। मीडिया को सनसनीखेज खबरों से आगे बढ़कर समाज के उन वर्गों की आवाज बनना चाहिए, जिन्हें मुख्यधारा में पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती।

बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर के हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. सुशांत कुमार ने मीडिया के बदलते चरित्र और उसकी चुनौतियों पर अपनी बात रखी। उन्होंने मीडिया के गिरते स्तर, संवेदनहीनता, बाजारवाद और कॉरपोरेट घरानों के बढ़ते प्रभाव को लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि मुख्यधारा का मीडिया जब शोषितों, वंचितों और उपेक्षित समुदायों के सवालों को पर्याप्त जगह नहीं देता, तब उनकी आवाज सत्ता और व्यवस्था तक पहुंचने से रह जाती है। ऐसी स्थिति में जनजागरण और वैकल्पिक मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने अपनी आवाज बुलंद करने और जनपक्षधर समानांतर मीडिया को मजबूत बनाने पर जोर दिया।

पारंपरिक और वैकल्पिक मीडिया पर पैनल विमर्श
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में पारंपरिक एवं वैकल्पिक मीडिया की भूमिका, चुनौतियों और संभावनाओं पर पैनल डिस्कशन आयोजित किया गया। इसमें पत्रकारिता के विभिन्न पक्षों पर गहन चर्चा हुई। पैनल में डॉ. ज्ञान प्रकाश, डॉ. राजीव कुमार, भूपाल भारती, अशोक भारती, राजा ठाकुर, अमृतांज इंदीवर और संतोष सारंग शामिल रहे। इस दौरान श्रोताओं ने पत्रकारिता की गिरती साख, मीडिया की जवाबदेही, निष्पक्षता और जनसरोकारों से उसके दूर होते जाने जैसे सवाल उठाए। पैनलिस्टों ने इन सवालों पर अपने विचार रखे और बदलते मीडिया परिदृश्य में वैकल्पिक पत्रकारिता की संभावनाओं पर चर्चा की।

कठपुतली प्रस्तुति से मीडिया के बदलते स्वरूप पर कटाक्ष
विमर्श के दौरान कठपुतली कलाकार सुनील सरला ने अपनी कलात्मक प्रस्तुति के माध्यम से लोकतांत्रिक मीडिया की प्रवृत्ति में आए बदलाव को दर्शाया। कठपुतली शो ने मीडिया की बदलती भूमिका और सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों पर रोचक एवं विचारोत्तेजक ढंग से सवाल खड़े किए। इस प्रस्तुति ने कार्यक्रम को एक रचनात्मक और सांस्कृतिक आयाम प्रदान किया।
कार्यक्रम में डॉ. संजय कुमार ‘सुमन’, डॉ. रामेश्वर राय, डॉ. हेम नारायण विश्वकर्मा, डॉ. ललन भगत, डॉ. विष्णुदेव यादव, डॉ. अविनाश कुमार, सोनू सरकार, मदन प्रसाद, बैजू कुमार, फूलदेव पटेल, नीरज कुमार, अमरेन्द्र कुमार, यशोदा कुमारी पासवान, डॉ. रिंकु कुमारी, अनीता कुमारी, सिमरन सहनी, मुन्ना कुमार, लालबाबू पटेल, राकेश रंजन, राजीव भारद्वाज, ऋषि राज और आलोक कुमार सहित अनेक गण मान्य लोग उपस्थित रहे। सभागार में बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन, शोधार्थी, महिलाएं, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिकों की भागीदारी रही।

कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. सुशांत कुमार एवं संतोष सारंग ने संयुक्त रूप से किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. हेम नारायण विश्वकर्मा ने किया।
पूरे विमर्श का केंद्रीय निष्कर्ष यह रहा कि मीडिया की विश्वसनीयता केवल खबरों की संख्या या प्रसार से नहीं, बल्कि उसकी तथ्यपरकता, निष्पक्षता और जनपक्षधरता से तय होती है। ‘अप्पन समाचार’ पुस्तक के बहाने आयोजित इस संवाद ने मुख्यधारा की पत्रकारिता के आत्ममंथन के साथ-साथ वैकल्पिक और जनपक्षधर मीडिया को मजबूत करने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया।