गरीबी, संघर्ष और एक लड़की का अडिग हौसला

गरीबी, संघर्ष और एक लड़की का अडिग हौसला

किस्मत से जंग

पायल कुमारी 
वर्ग – 11 वीं , 
उच्च मा. विद्यालय जारंग पूर्वी 

किस्मत—एक ऐसा शब्द, जिसे लोग अक्सर अपनी असफलताओं का कारण बना लेते हैं। जब ज़िंदगी उम्मीद के मुताबिक नहीं चलती, तो इंसान सबसे पहले किस्मत को ही दोष देता है। “मेरी किस्मत ही खराब है”—यह वाक्य जैसे हर मुश्किल घड़ी का आसान बहाना बन चुका है। लेकिन क्या सच में किस्मत ही सब कुछ तय करती है? या फिर इंसान की मेहनत, हिम्मत और संघर्ष किस्मत की लिखी लकीरों को भी बदल सकते हैं? यह कहानी है कंचन की—एक ऐसी लड़की की, जिसने गरीबी, अभाव और जिम्मेदारियों के बीच भी सपने देखना नहीं छोड़ा, बल्कि अपनी मेहनत और बुलंद हौसलों से उड़ान भरना चाहती है।
यह कहानी सिर्फ कंचन की नहीं है, बल्कि उन हजारों लड़कियों की है, जो चुपचाप हालातों से लड़ती हैं, बिना किसी शिकायत के। पढ़िये, बिहार के मुजफ्फरपुर जिला अंतर्गत गायघाट के ढुबौली गांव की एक सच्ची कहानी।

 

गरीबी, संघर्ष और एक लड़की का अडिग हौसलामाँ, अब आटा खत्म हो गया है, अब क्या बनाओगी?” कंचन ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में सवाल कम और चिंता ज़्यादा थी। माँ यह सुनकर चौंक गई।कंचन चूल्हा जलते जलाते हुए फिर बोली “तुम्हें कल ही कहा था कि आटा खत्म होने वाला है। अब बताओ, क्या बनेगा? देखों जरा, छुटकी भूख से कैसे बिलबिला रही है? उसे क्या खाने को दूं और कैसे चुप कराऊं?
” कमरे में एक अजीब सी खामोशी फैल गई। यह खामोशी किसी झगड़े की नहीं थी, बल्कि उस भूख की थी, जो सिर्फ पेट में नहीं, आँखों में भी उतर आई थी।
कुछ देर बाद माँ ने भारी मन से कहा, “डब्बे में थोड़ा चावल है उसे पका ले और छुटकी को दे दो। आज किसी तरह गुज़ारा हो जाएगा। कल मैं और तुम मिलकर मालिक के खेत में मजदूरी करने चलेंगे।” यह कोई ठोस योजना नहीं थी, बस हालातों से निकला एक मजबूर फैसला था। गरीब के घर में आज का खाना ही सबसे बड़ी राहत होता है।

घर से निकलते समय माँ ने कंचन से कहा कि आज किसी से उधार माँगकर देख आना। कल जो पैसे मिलेंगे, उनसे राशन का इंतजाम हो जाएगा। उधार—कंचन के लिए यह शब्द नया नहीं था। गरीबी में उधार इंसान का सबसे नज़दीकी सहारा भी बन जाता है और सबसे भारी बोझ भी। उधार माँगते समय आँखें झुक जाती हैं, लेकिन पेट की आग शर्म से बड़ी हो जाती है। और फिर दुकानदार ने अब उधार देने से भी इनकार कर दिया था।

कंचन चार बहनों में सबसे बड़ी थी। सबसे बड़ी बेटी होने का मतलब था—सबसे ज़्यादा जिम्मेदारी। एक बहन नानी के यहाँ रहती थी और कंचन घर में माँ का हाथ बँटाती थी। रसोई से लेकर खेत तक, हर काम में वह माँ के साथ खड़ी रहती थी। कम उम्र में ही उसने समझ लिया था कि यह घर अब सिर्फ माँ का नहीं, उसका भी है।

समझदार बेटी, किताबों से आगे की पढ़ाई

कंचन घर में सबसे समझदार थी—काम करने में निपुण और पढ़ाई में तेज़। वह दसवीं कक्षा की छात्रा थी और गाँव के ही स्कूल में पढ़ती थी। लेकिन उसकी पढ़ाई सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं थी। उसने ज़िंदगी को बहुत करीब से देखा और समझा था।

खेतों में मजदूरी, रातों में पढ़ाई

माँ विधवा थी। घर चलाने के लिए माँ-बेटी दोनों खेतों में मजदूरी करती थीं। धूप में जलते हाथ, कीचड़ में सने पैर और थका हुआ शरीर—यही उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी थी। काम की वजह से कंचन रोज़ स्कूल नहीं जा पाती थी, लेकिन पढ़ाई से उसका रिश्ता कभी नहीं टूटा। दिनभर मेहनत और रात में थकी आँखों से किताबें—यही उसका संघर्ष था।

कम उम्र का पका हुआ चेहरा

कंचन का चेहरा उसकी उम्र से बड़ा लगने लगा था। समझ की मार ने उसे जल्दी बड़ा बना दिया था। कई बार वह सोचती कि अगर उसके पिता ज़िंदा होते तो शायद माँ को इस तरह रोज़ आँसू नहीं बहाने पड़ते। माँ की आँखों से गिरते आँसू उसे भीतर तक आहत कर देते थे।

माँ के आँसू, दर्द जो ताकत बन गया

कंचन माँ के आँसू देखती थी, लेकिन चाहकर भी उन्हें पोंछ नहीं पाती थी। न ही उनके दर्द का पूरा अंदाज़ा लगा पाती थी। बस इतना जानती थी कि यही आँसू उसे कमज़ोर नहीं, बल्कि और मज़बूत बना रहे हैं। कंचन हालातों से समझौता करने वाली नहीं थी। उसने मन ही मन ठान लिया था कि उसे इस गरीबी को काटकर एक दिन उजाले में बदलना है। वह नहीं चाहती थी कि उसके जीवन में यह अंधेरा हमेशा के लिए छाया रहे। माँ के रात-रात भर रोने वाले आँसू उसे बिल्कुल पसंद नहीं थे। अब वह और ज़्यादा मन लगाकर पढ़ने लगी थी। वह खुद से बार-बार कहती थी, “मैं सफल होकर ही रहूँगी।” यह सिर्फ सपना नहीं था—यह उसकी ज़िद थी।

किस्मत से लड़ने का फैसला

कंचन जानती थी कि उसका रास्ता आसान नहीं होगा। मुश्किलें आएँगी, असफलताएँ भी मिलेंगी, लेकिन उसने तय कर लिया था कि वह हार नहीं मानेगी। वह गलत रास्ता नहीं चुनेगी, आत्महत्या जैसे विचारों से दूर रहेगी और पूरी ताकत से किस्मत से लड़ती रहेगी। उसका विश्वास था कि मेहनत, लगन और धैर्य किसी भी किस्मत से बड़े होते हैं।

सफलता तक का सफ़र

कंचन जानती थी कि सफलता एक दिन में नहीं मिलती। इसलिए उसने खुद से वादा किया था कि वह तब तक प्रयास करती रहेगी, जब तक सफल नहीं हो जाती। उसे भरोसा था कि जिस दिन उसकी मेहनत रंग लाएगी, उसी दिन वह अपनी माँ की किस्मत भी बदल देगी।

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