अबकी बार गणतंत्र परेड में भाग लेंगे ऊंट, घोड़े, कुत्ते और पक्षी
हेमलता म्हस्के
इस दुनिया में ऐसे भी योद्धा हैं जो न तो नारे लगाते हैं, न ही अपनी बहादुरी का बखान करते हैं। वे चुपचाप काम करते हैं, हर कठिनाई सहते हैं और ज़रूरत पड़ने पर अपनी जान तक कुर्बान कर देते हैं। ये योद्धा हैं—हमारे बेजुबान पशु-पक्षी।
पशु और पक्षी हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। दूध, मांस, अंडे, खेती, बोझ ढोना, ऊन, चमड़ा, दवाइयों के शोध से लेकर भावनात्मक सहारे तक—हम हर मोड़ पर उन पर निर्भर हैं। फिर भी यह एक कड़वी सच्चाई है कि हम अक्सर उनके प्रति संवेदनहीन और क्रूर बने रहते हैं। कानून होने के बावजूद पशुओं पर अत्याचार कम नहीं हो रहे।
लेकिन अब समय आ गया है कि देश और दुनिया उनकी एक और भूमिका को पहचाने—देश की रक्षा में उनका योगदान।

गणतंत्र दिवस परेड 2026: इतिहास का एक नया अध्याय
इस वर्ष 26 जनवरी को कर्तव्य पथ पर कुछ ऐसा देखने को मिलेगा जो पहले कभी इतने बड़े स्तर पर नहीं हुआ। गणतंत्र दिवस परेड में पहली बार पशु-पक्षियों का विशेष सैन्य दस्ता शामिल होगा। यह नज़ारा केवल सेना की ताकत नहीं दिखाएगा, बल्कि यह भी बताएगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि विश्वास और समर्पण से भी मजबूत होती है।
इस परेड में शामिल होंगे—
दो बैक्ट्रीयन ऊंट, चार जांस्कर टट्टू, चार शिकारी पक्षी (रैपटर्स), भारतीय नस्ल के दस सैन्य कुत्ते और छह पारंपरिक आर्मी डॉग्स।
लद्दाख के ठंडे रेगिस्तान के प्रहरी: बैक्ट्रीयन ऊंट
बैक्ट्रीयन ऊंट लद्दाख की नुब्रा घाटी में पाए जाते हैं। उनकी पहचान है—पीठ पर दो कूबड़ और अद्भुत सहनशक्ति।
ये ऊंट 15,000 फीट से अधिक ऊंचाई और बेहद ठंडे मौसम में भी आसानी से काम कर सकते हैं। 250 किलोग्राम तक का भार उठाना और कम पानी-चारे में लंबी दूरी तय करना इनके लिए सामान्य बात है।
जहाँ इंसानों के लिए सांस लेना मुश्किल हो जाता है, वहाँ ये ऊंट सेना के लिए जीवनरेखा बनते हैं।
छोटे कद में बड़ी ताकत: जांस्कर टट्टू
जांस्कर टट्टू लद्दाख की एक दुर्लभ और स्वदेशी नस्ल हैं। देखने में छोटे, लेकिन ताकत और सहनशक्ति में असाधारण।
ये टट्टू 15,000 फीट से ज्यादा ऊंचाई पर, -40 डिग्री से लेकर 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में 40–60 किलो भार लेकर लंबी दूरी तय कर सकते हैं।
2020 में सेना में शामिल होने के बाद से इन्होंने सियाचिन जैसे दुनिया के सबसे कठिन इलाकों में सेवाएं दी हैं। कई बार ये एक ही दिन में 70 किलोमीटर तक चल जाते हैं—वो भी जोखिम भरे इलाकों में।
आकाश के मूक प्रहरी: शिकारी पक्षी (Raptors)
इस बार परेड में चार शिकारी पक्षी भी शामिल होंगे। इन्हें रैपटर्स कहा जाता है।
इनका उपयोग हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों पर पक्षियों के टकराव से होने वाले नुकसान को रोकने और निगरानी के लिए किया जाता है।
“रैप्टर” शब्द लैटिन भाषा से आया है, जिसका अर्थ है झपटना या पकड़ना—और यह इनके स्वभाव पर बिल्कुल सटीक बैठता है। भविष्य में इन्हें ड्रोन वॉरफेयर जैसे आधुनिक सैन्य कार्यों के लिए भी तैयार किया जा रहा है।
चार पैरों वाले सच्चे सैनिक: भारतीय सेना के कुत्ते
सेना के कुत्तों को अक्सर “मौन योद्धा” कहा जाता है।
मेरठ स्थित रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर में प्रशिक्षित ये कुत्ते आतंकवाद विरोधी अभियानों, विस्फोटक और बारूदी सुरंगों की पहचान, ट्रैकिंग, सुरक्षा, आपदा राहत और खोज-बचाव अभियानों में सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं।
कई बार इन कुत्तों ने अपनी जान की परवाह किए बिना सैनिकों की जान बचाई है।
आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत अब मुधोल हाउंड, रामपुर हाउंड, चिप्पीपराई, कोम्बई और राजापलायम जैसी स्वदेशी नस्लों को भी सेना में शामिल किया जा रहा है।
जिनकी आवाज़ नहीं, पर योगदान अमर है
सियाचिन की बर्फीली चोटियों से लेकर लद्दाख के ठंडे रेगिस्तान तक, इन बेजुबान योद्धाओं ने बिना किसी शिकायत के अपना कर्तव्य निभाया है।
गणतंत्र दिवस परेड में जब ये कदमताल करेंगे, तो यह हमें याद दिलाएगा कि देश की रक्षा केवल इंसान नहीं करते—कई मौन प्राणी भी चुपचाप हमारी आज़ादी की कीमत चुका रहे हैं।
👉 शायद अब समय है कि हम सिर्फ तालियाँ न बजाएँ, बल्कि उनके प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक भी बनें।
Good story