चमगादड़ों के गांव ‘बादुर छपरा मेघ’ में आपका स्वागत है

मुसहरी से रिंकु कुमारी // आज हम आपको एक ऐसे गांव का सैर कराना चाहते हैं, जिस गांव को लोग ‘बादुर’ यानी ‘बादुर छपरा मेघ’ के नाम से पुकारते हैं. उत्तर बिहार में चमगादड़ को बादुर भी कहा जाता है. अब आप समझ गये होंगे कि हम उस गांव की बात कर रहे हैं, जिसका संबंध चमगादड़ से है. हालांकि इस गांव का असली नाम ‘छपरा मेघ’ है, लेकिन कालांतर में लोग बादुर छपरा मेघ कहने लगे. यह है मुजफ्फरपुर जिले के मुसहरी प्रखंड में. यह गांव अन्य गांवों से इसलिए अजूबा है कि यहां के विशाल बरगद व खीरी के पेड़ों पर सैकड़ों की संख्या में चमगादड़ का बसेरा है. श्रीजानकी मठ, पानी से लबालब भरे दो तालाब, इन जलाशयों के किनारे बड़े-बड़े बरगद आदि के पेड़ों की श्रृंखला और श्मशान घाट. चारों ओर हरियाली व पेड़ों पर सैकड़ों चमगादड़ों का कलरव और बीच-बीच में मंदिर के घंटे की आवाज आपको आनंद से भर देता है.

अपशगुन नहीं, यहां के लिए है लक्ष्मी समान
अमूमन चमगादड़ को अपशगुन समझा जाता है. लेकिन यहां के लोगों के लिए यह लक्ष्मी के समान है. श्रीराम जानकी मठ के पुजारी कहते हैं कि चमगादड़ की कहानी पौराणिक है. चमगादड़ इस गांव में कब से है, किसी को पता नहीं है. यह यहां की लक्ष्मी मानी जाती है. इसको कुछ हो जाये, तो गांव के लोग शांत नहीं रहते हैं. जितना लोग अपने परिवार के लिए नहीं होते, उतना इसके लिए उठ खड़े होते हैं. कोई एक ठेला भी नहीं फेंक सकता है, इसका ख्याल रखा जाता है.

बादुर को भगाने पर गायब हो गयी थी खुशहाली
ग्रामीण मोहन सिंह कहते हैं कि हमारे गांव में बादुर कब से है यह न मुझे पता है और न मेरे बाबा को था. इस संबंध में यह कहा जाता है कि एक बार इस गांव के लोगों ने बादुर को भगा दिया था. इसके बाद गांव से खुशहाली गायब हो गयी. आपदा-विपदा से गांव के लोग परेशान रहने लगे. तब लोगों लगा कि शायद यह सब बादुर को भगा देने का ही नतीजा है. तब इस मठ के महंथ परमहंस जी ने किसी तरह पूजा-पाठ करके बादुर को वापस लाया. आज यहां 4000-5000 हजार से अधिक चमगादड़ों का बसेरा है यह गांव.

वन विभाग से मांग, संरक्षण के लिए करें पहल
ऐसे समय में जब पूरी दुनिया पर्यावरण को बचाने के लिए, वन्यजीव के संरक्षण के लिए चिंतित है, इस स्तनपायी जीव के संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है. ग्रामीण मनोज कुमार सिंह अफसोस जताते हुए कहते हैं कि आज तक न वन विभाग का कोई अधिकारी आया और इस दिशा में प्रशासनिक स्तर पर न कोई पहल हुई. जिस तरह गिद्ध विलुप्त हो गये, जीव-जंतुओं की कितनी ही प्रजातियां विलुप्त हो गयी. समय रहते न चेतें, तो चमगादड़ भी विलुप्त हो जायेंगे. इसलिए हम सरकार से मांग करते हैं कि छपरा मेघ के बादुर (चमगादड़) के संरक्षण की ओर ध्यान दिया जाये.

जानें चमगादड़ के बारे में रोचक बातें
चमगादड़ उड़नेवाला एक स्तनपायी जीव है. इसे बादुर भी कहा जाता है. यह इकलौते स्तनधारी प्राणी है, जो उड़ सकते हैं. चमगादड़ को दिन में नहीं, रात में दिखता है, इसलिए इसे निशाचर भी कहते हैं. ये पेड़ों की डालियां या अंधेरी गुफाओं में उल्टे लटके रहते हैं. ये अन्य पक्षियों की तरह जमीन से उड़ान नहीं भर सकते, इसलिए ये उलटे लटकते हैं, ताकि उड़ान भरने में आसानी हो. जनश्रुति के अनुसार चमगादड़ का घर में घुसना अपशकुन माना जाता है, किंतु चमगादड़ घर में अपना बसेरा बना ले, तो वह समृद्धि प्रदान करनेवाला समझा जाता है. पूरी दुिनया में चमगादड़ों की करीब 1100 प्रजातियां पायी जाती हैं. एक चमगादड़ एक घंटे में 600 खटमल तक हजम कर सकता है. खून पीने वाले चमगादड़ भी होते हैं, जिसे पिशाच चमगादड़ कहा जाता है.

– अप्पन समाचार न्यूज नेटवर्क

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One thought on “चमगादड़ों के गांव ‘बादुर छपरा मेघ’ में आपका स्वागत है

  • September 10, 2017 at 9:27 pm
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    Excellent initiative

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