मशरूम से बदल रही गांव की तकदीर

छोटे जोत के किसानों के लिए जीविकोपार्जन व घर-परिवार चलाना मुश्किल हुआ, तो उसने साग-सब्जी के साथ-साथ मशरूम की खेती शुरू कर दी. मुजफ्फरपुर जिले के कांटी प्रखंड के कोठिया गांव के प्रगतिशील किसान लालबहादूर प्रसाद अपनी मेहनत व लगन के बल पर मशरूम उत्पादन के क्षेत्र में बेहतरीन काम कर पाये हैं. विनय कुमार, हनुमान प्रसाद, विमला देवी, सुनीता देवी, अंजना कुमारी, शंभू प्रसाद, बिन्देश्वरी प्रसाद, गणेश प्रसाद सहित 82 किसानों को मशरूम की खेती के लिए आगे लाया है. किसानों ने अपने गांव में ही  ‘धनवर्षा किसान समूह’ नाम से बैंक बनाया है. इस बैंक में करीब 4 लाख 56 हजार रुपये जमा है. इस पैसे से किसान खेती-बाड़ी एवं सुख-दुःख में एक-दूसरे को सस्ते दर पर लोन देते हैं और खाद, बीज, पानी की व्यवस्था भी करते हैं. कैंसर से पीड़ित लालबहादूर ने बीमारी से लड़ने के लिए मशरूम का उत्पादन शुरू किया. अपनी झोपड़ी में बांस से बने शेड पर करीब 50 से भी अधिक प्लास्टिक बैग में ओस्टर व बटर प्रजाति का मशरूम लगाया है. कोठिया के अधिकतर परिवारों के लोग अपने भोजन के साथ मशरूम की सब्जी, अचार, पनीर, सिरका, चटनी, मुरब्बा आदि स्वाद व पौष्टिकता के लिए शामिल करते हैं. पिछले साल फरवरी 2012 में एक स्वयंसेवी संस्था ने इन किसानों को मशरूम के उत्पादन की जानकारी दी थी. फिर क्या था लालबहादूर अपने कुछ किसाना भाइयों के साथ पूसा कृषि विश्वविद्यालय से तीन दिनों के मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण प्राप्त किया और शूरू हो गया खेती का नया सिलसिला. देखा-देखी गांव के छोटे-मझौले किसान अपने घरों में ही मशरूम को लगाना शुरू कर दिया. आज इस गांव में अकेले लालबहादूर के पास एक लाख रुपये से अधिक के मशरूम के पौघे उग आये हैं. लालबहादूर के चार बच्चों की पढ़ाई-लिखाई मशरूम के पैसे से ही हो रही है. पशुपालन, जैविक खाद उत्पादन केंद्र, औषधीये खेती, सब्जी की खेती से सालाना दो लाख रुपये से अधिक की आय हो रही है. स्थानीय स्टेट बैंक से केसीसी लोन नहीं मिला, तो कोठिया के किसानों ने अपना बैंक ‘धनवर्षा किसान समूह’ के नाम से शुरू किया. इस बैंक समूह में 19 किसान 250 रुपये प्रति माह के हिसाब से पैसे की बचत करते हैं, जिसकी मियाद तीन वर्षों की होती है. तीन वर्ष में एक किसान करीब 24 हजार रुपये की बचत करते हैं. इस राशि का उपयोग बेटी की शादी या बीमार पड़ने पर कम ब्याज पर ऋण देने में किया जाता है. लालबहादूर 3000 की पूंजी से मशरूम का उत्पादन शुरू किया और आज एक लाख रुपये तक की उपज होने की संभावना है. लालबहादूर कहते हैं कि किसानों के पास उतना पैसा कहां है कि वे संतुलित भोजन कर सके और बीमारी से बच सकें. भोजन में दूध-दही के अलावा फल-फूल, अंडा आदि की भी जरूरत पड़ती है. मशरूम एकमात्र ऐसा भोज्य पदार्थ है, जो शरीर में अधिकतम जरूरी तत्वों को पूरा कर देता है. प्रोटिन 2.78-3.94 प्रतिशत, वसा 0.25-06.5 प्रतिशत, रेशा 0.7-1.67 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 1.30-6.28 प्रतिशत की मात्रा 24.4-34.4 कैलोरी तक पूरा कर देता है. विटामिन बी1, बी2, सी, डी व खनिज-लवणों से भरपूर है. कई आसाध्य बीमारियों के लिए अचूक दवा है. कैंसर, बहुमूत्र, खून की कमी, बेरी-बेरी, खांसी, मिर्गी, दिल की बीमारी आदि में काफी असरदायक है. शुरू में लालबहादूर को गांव के लोग पागल व सनकी कहते थे. आज लालबहादूर गांव के लिए मशरूम का डॉक्टर बन गया है. आसपास के किसानों के बीच मशरूम उत्पादन की नयी-नयी जानकारी, देखरेख, प्रशिक्षण व बाजार भाव की पूरी जानकारी देते हैं. इन्होंने मशरूम की मार्केटिंग के लिए सबसे पहले अपने गांव के संपन्न लोगों को चुना. ताजा मशरूम 200 रुपये प्रति किलो एवं सूखा हुआ मशरूम 1000 रुपये किलो की दर से खुले बाजार में बिक रहा है और आमदनी भी खूब हो रही है. कांटी थर्मल पावर के अफसर व कर्मचारी इनके उत्पादित जैविक मशरूम पर पूरा भरोसा करते हैं. जैविक होने का मतलब है कि वे मशरूम उत्पादन में किसी प्रकार के रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करते हैं. जिस वजह से शहर के वकील, डॉक्टर व सरकारी अधिकारी तक इनके मशरूम के खरीदार हैं. अब तो लालबहादूर को शहर के मशहूर होटलों से भी आॅर्डर आने लगे हैं. आसपास के प्रखंडों से किसान मशरूम की खेती की जानकारी के लिए लालबहादूर के पास आते रहते हैं. मीनापुर प्रखंड के विनय रजक ने बताया कि हमलोगों को प्रशिक्षण नहीं मिला है. इनके सहयोग से ही मात्र सौ रुपये की लागत से करीब छह हजार का मशरूम उपजाया है. लेकिन वहां के किसानों की सही समय पर मशरूम का बीज नहीं मिलने से परेशानी बढ़ गयी है. मशरूम के उत्पादन के प्रोत्साहन हेतु अनुदान केवल विज्ञापन बन कर रहा गया है. किसानों को अनुदान और बैंक से सहयोग लेने के लिए ऐड़ी-चोटी एक करनी पड़ती है. आज तो मशरूम के उत्पादन से गांव की सेहत भी सुधर रही है और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के खर्चें भी निकल रहे हैं.  

कम पूंजी में अच्छी कमाई

मशरूम की खेती से आमदनी बढ़ाने के लिए बहुत कम पूंजी की जरूरत पड़ती है. एक बेड लगाने के लिए 4 किलो भूसा, 200 ग्राम बीज, एक प्लास्टिक का बैग आदि में लगभग 68 रुपये खर्च आता है. 20-22 दिनों के उपरांत बेड में मशरूम उग आता है. एक बेड से पहले एक किलो, फिर छह माह तक आधा-आधा किलो के हिसाब से तीन किलो तक उत्पादन हो जाता है. मशरूम के उत्पादन के लिए ठंडा व अंधेरे कमरे या झोपड़ी की आवश्यकता पड़ती है. फिलहाल कोठिया के किसान मशरूम की खेती में दिन-रात लगे हुए हैं. इनका मकसद है कि कम पूंजी में अच्छी कमाई करना. उनकी आमदनी भी बढ़े और गांव के छोटे-मझौले किसानों की सेहत भी सुधरे. गांव में मशरूम का अचार, मुरब्बा, चटनी, सिरका आदि को पैकिंग कर बाजार में उतारना चाह रहे हैं. ये किसान मशरूम के बीज की समस्या से निजात पाने के लिए सीड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए प्रयासरत हैं. गांव की महिलाओं को समूह का सदस्य बना रहे हैं, ताकि खेती के साथ-साथ उनका आर्थिक सशक्तीकरण भी हो.  

यदि आप भी मशरूम का उत्पादन करना चाहते हैं, तो इनसे संपर्क कर सकते हैं : लालबहादूर प्रसाद – 7250923058

कांटी से अमृतांज इंदीवर

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