रामलाल ने समझाई असली ‘किसानी’

आजकल किसानों की बड़ी चर्चा है. किसानी सुर्खियों में है. कुछ लोग समूह बनाकर आंदोलन पर उतारू हैं. कुछ इसको महायज्ञ बनाकर विभिन्न प्रकार की गाड़ियों की आहुति देकर अब कुछ अलग करने की सोच रहे हैं. आंदोलन हिंसक न हो तबतक न मज़ा आता है और न सुर्खियों में आता है. कुछ धुआं उठे, तब तो मीडिया वाले दूर से धुएं की दिशा में पहुंच पाएं. यज्ञ में शंख, दुदुम्भी आदि का स्थान देसी कट्टे और बमों ने ले लिया है. आखिर हम तरक्की जो कर रहे हैं. आंदोलन में सबका ख्याल रखा जा रहा है. लोग कहते हैं कि शहर में सभ्यता खत्म हो गयी है. बताते हैं कि गांवों में बची है. जितना सभ्य समाज; उतना तेज़, उग्र आंदोलन. सोचता हूं, मैं भी किसानी अपना ही लूं.

आदतन सबसे पहले रामलाल जी से किसानी समझने की कोशिश की. रामलाल जी ने विस्तार से समझाया. बोले, पहले मामले की जड़ तक जाओ. किसानी तो बाद में समझना. पहले यह तो जानो कि किसान कहते किसे हैं? पुराने जमाने में किसान वह होता था, जो खेती करता था. वह अपने, और फिर बाद में बैल के कंधों पर हल रखता. हल चलता, खेत तैयार होते, बीज बोए जाते, वर्षा होती, फसल तैयार होती और फसल पकते ही वे उन्हें काट लेते. जैसे-जैसे तरक्की होती गयी, कइयों की जमीन छोटी होती चली गयी और कइयों की बढ़ती चली गयी. जिनकी बढ़ गयी, उनके कंधों में हल उठाने में दर्द होने लगा. नतीजा यह हुआ कि दूसरे के कंधे इस्तेमाल होने लगे. चाहे हल चलाने में हो या रबर रूपी जमीन को खींच कर लंबा करने में. जिनकी घट गयी,  उनके कंधे खाली रहने लगे. खाली कंधा भार खोजता है. बढ़नेवालों ने उसपर हल के अलावा धर्म, रीति-रिवाज आदि उनके कंधों पर रख दिया, जिसको वे ढोने लगे. उनको धीरे-धीरे ढोने की आदत हो गयी. ढुलवाने वालों को खाली समय मिलता. इसका उपयोग वे धर्म और समाज चलाने में करने लगे. जब धर्म और समाज दोनों में पास-पास रहने से टक्कर होने लगी, तो इन दोनों के बीच कुछ दूरी बनाने में ढोनेवाले और ढुलवाने वाले भीड़ गये. कुछ इस लफ़ड़े में न पड़ के, धर्म और समाज से अलग सरकार बनाकर चलाने लगे. सरकारें आपस में लड़ती रहती हैं. विदेशियों ने इसका फायदा उठा लिया. वे घुस आए. सरकार चलाने की आदत वाले मिल-जुल कर रहने लगे और अपने खेत, खलिहान को बढ़ाते रहे. कंधे पुश्तैनी हो चुके थे. खेत वाले जो मजबूत थे, अपने आप को किसान के बदले जमींदार कहने लगे. वे इस बात का पूरा ध्यान रखते कि कोई दूसरा जमींदार बनकर उनसे आगे न निकल जाये. इसलिए सरकार चलाने वालों की ड्रेस पहनकर उसमें शामिल रहे. अंग्रजों के समय इनका काम बढ़ गया. जिनका नहीं बढ़ा, उसने जुगत लगा कर बढ़ाने की कोशिश विधिवत की. दूसरा जमींदार न बन जाए, इसलिए नाम ही बदलने के लिए जमींदारी उन्मूलन कानून आज़ादी के बाद ले आये. फिर भी खटका बना रहा. वे अपना-अपना हिस्सा कंधों के नाम कागज़ में कर लिए. जब यह सब हो गया, तब भूदान, लैंड सीलिंग वगैरह के कानून ले आये.
तू डाल-डाल, मैं पात-पात. ढोनेवाले कंधे झुकने लगे. जब उनकी कमर भी झुकने लगी, तो कई लाल बाबा साधु वेश में जम गये. वे उन कंधों को अपनी दवाई यह कह कर बेचते कि इससे कंधों का दर्द कम होगा, एक-दूसरे को पकड़कर चलने से रीढ़ की हड्डी सीधी हो जायेगी. बाबा सब दवा बेचते-बेचते ढुलवाने वाले हो गये. कंधा न सीधा हुआ, न रीढ़ की हड्डी सीधी हुई. जब ढोनेवाले कंधों की तादात काफी बढ़ गयी और गांवों में उतनी संख्या में हल नहीं मिलने लगे, तो बहुत लोग गांव छोड़कर शहर आने लगे, लेकिन उन्होंने अपनी संस्कृति नहीं छोड़ी. अपने को ‘किसान’ कहते, किसानों के हित की सार्वजनिक रूप से बात करते, किसानों के हक के लिए लड़ना पेशा बना बैठे. इसे ही “किसानी” कहते हैं. वे किसान कहे जाते, किसानों के नाम पर सारे लाभ लेते, कर्ज लेते. दिखाने के लिए लोन की सूची में कंधों का नाम भी लिखवा देते. बीच-बीच में भांडा फूटता, तो कर्जमाफी के लिए यज्ञ कर डालते. कई कंधों की आहुति दे देते. फिर यज्ञ के पुण्य प्रताप से कर्ज माफ हो जाता. इतना बताकर रामलाल जी भावुक हो गये. बोले-कल यज्ञ में कुछ कंधों की आहुति होगी. इंतज़ाम का भार मेरे कंधों पर है. अगर इंतज़ाम हो गया, तो दो मंज़िल की छत बन जायेगी. अभी काम करने दीजिए. किसानी बाद में ठीक से समझ लीजिएगा. इसमें अधीर होने की जरूरत नहीं है. किसान सदियों से हैं और रहेंगे, हड़बड़ाइये मत.
रामलाल जी जा चुके थे. किसानी की बात बीच में ही छोड़ गये.अब अगली बार मिलेंगे, तो पूरा सीखने की कोशिश करूंगा. फिलहाल इतना ही.
अस्तु !

– प्रशान्त करण

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