झुर्रियों व झोंपड़ियों से झांकती मिठन सराय की गरीबी

”गौर से देखो इसे और प्यार से निहार लो, आराम से बैठो यहां पल दो पल गुजार लो
सुध जरा ले लो यहां पर एक हरे से घाव की, कि यह जमीं है गांव की, हां ये जमीं है गांव की..”

योगेश समदर्शी की ये पंक्तियां ‘मिठन सराय’ गांव की माटी को, यहां की आबो-हवा को, खेत-खलिहान को छू लेने को उद्वेलित करता है. यहां के लोगों की पीड़ा को कवि का आदेश मानकर हर लेने को बेताब करता है.
बुधवार की दोपहर दो बजे होंगे. रुक-रुक कर हो रही बारिश में भींगते हुए हम अपनी बाइक से एसकेएमसीएच से करीब तीन-चार किलोमीटर दूर पहुंचते हैं उस गांव में, जिसकी हकीकत व फसानों में बहुत फासला है. संगमघाट से उत्तर दिशा की ओर मुड़ते ही बांध के दोनों तरफ एक-दो पक्के मकानों के बीच दर्जनों झोंपड़ियां हमारा ध्यान खींचती हैं. घास-फूस की इन छोटी-छोटी झोंपड़ियां के भीतर से झांकती गरीबी व जिल्लत भरी जिंदगियां मानों सरकारी दावों की पोल खोलती नजर आती हैं. कांटी प्रखंड के इस गांव में पहुंचते ही 70 साल की बिजली देवी से सामना होता है. चेहरे की झुर्रियां सबकुछ कह देती हैं, जो वह अपने मुंह से नहीं कह पाती हैं. ‘पचासन बेर दौरली, लेकिन इंदिरा आवास न देलक. 400 रुपैओ ले लेलक वृद्धापेंशन के फारम भी भरली. आइ तक न मिलल.’ इस संवाद के बीच में ही फटी-पुरानी व मटमैली साड़ी में लिपटी लक्ष्मीनिया देवी बोल पड़ती है, ‘ऐहे हाल हमरो हय. जनधन खाता भी न खुलल.’
कीचड़ में सने सोलिंग से होते हुए हम आगे बढ़ते हैं. दोे-तीन बुजुर्ग मिलते हैं. 80 साल तक इस गांव को पिछड़ेपन का दंश झेलते देखा है रामपुकार राय ने. रामपुकार कहते हैं, ‘बाबू, इतना साल के हो गेली, अब तक वृद्धापेंशन न मिलल.’ इस गांव के अधिकतर बूढ़े कंधों को वृद्धावस्था पेंशन की लाठी का सहारा नहीं मिला है. बुनियादी सुविधाओं की कमी झेल रहे इस गांव के बहुत-से लोग कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हैं.
दादर कोल्हुआ पंचायत में मिठनसराय, विजयी छपरा, सोनियापुर, कोठियापुर गांव हैं. इस गांव में मल्लाह, यादव, कुर्मी, बनिया, तेली, चमार और ब्राह्मण-राजपूत जाति के लोग रहते हैं. लोग मुख्यत: गेहूं-मक्का और सब्जी की खेती करते हैं. बलुई मिट्टी के कारण धान की खेती न के बराबर होता है. छोटे जोत के किसान खेती-बाड़ी व पशुपालन कर जीवनयापन करते हैं, तो कुछ लोग बगल के शहर में काम-धंधा करने जाते हैं. कुछ नौजवान मुंबई-दिल्ली में काम करता है.
रवि कुछ दिन पहले ही मुंबई से लौटा है. वह नौजवान है और वहां राजमिस्त्री के साथ लेबर का काम करता है. 300-400 रुपये दिहाड़ी मिलता है. रवि कहता, ‘हम गरीबी के कारण पांचवीं कक्षा से अधिक नहीं पढ़ सके. पिछले साल काम की तलाश में मुंबई पहुंचे. वहां एक दवाई की फैक्ट्री में गये, तो मैट्रिक का सर्टिफिकेट मांगा. हम तो ठहरे पंचमा पास. उस समय मुझे लगा कि पढ़ाई कितना जरूरी है.’ यह कहते-कहते उसके चेहरे पर उदासी छा जाती है. उसे इस बात का मलाल है कि घर से इतनी दूर रहकर और इतना शारीरिक मेहनत करने के बाद भी महीने में मुश्किल से तीन-चार हजार ही बचा पाते हैं. यह दुख एक रवि का नहीं है, बल्कि गांव के कई नौजवानों का भी है.
स्कूल के नाम पर गांव में सिर्फ एक प्राथमिक विद्यालय है. बच्चे बांसवाड़ी के नीचे व बरामदे पर बैठकर पढ़ने को विवश हैं. दो छोटे-छोटे कमरों में पांच क्लास की पढ़ाई भला कैसे संभव है? बगल के पंचायत में हाइस्कूल है, लेकिन उतनी दूर अपनी बेटी को पढ़ने के लिए सभी मां-बाप तैयार नहीं हैं. ललीता, गीता, रेखा जब शहर किसी काम से जाती हैं, तो स्कूली ड्रेस में बच्चों को जाते देख मन मचल उठता है कि काश! हम भी पढ़ पाते. गांव के इक्के-दुक्के लड़के ग्रेजुएट तो हैं, लेकिन लड़कियां बमुश्किल मैट्रिक-इंटर तक पहुंच पाती हैं. गांव की एक भी लड़की एमए-बीए पास नहीं है.
ओएफडी का शोर इस गांव तक आते-आते मंद पड़ जाता है. अधिकतर लोग खुले में शौच को मजबूर हैं. 85-90 फीसदी घरों में शौचालय नहीं हैं. बरसात के दिनों में खासकर महिलाओं के लिए खुले मेें शौच करना कितना कष्टकर व शर्मींदगी भरा होता है, इसे महसूस किया जा सकता है.
उपदेश कहता है कि हम शहर से सटे गांव में रहते हैं, लेकिन शिक्षा, शौचालय, स्वास्थ्य, सड़क व बिजली की समस्याओं से जूझते हुए हम जवान हुए हैं. आठ-10 साल पहले ही पाेल गाड़ दिया गया, लेकिन बिजली का तार आज तक नहीं लटका. गांव के कुछ लोग अपने स्तर से बांस-बल्ले से बिजली का तार खींच कर बल्ब जलाते हैं. शुद्ध पेयजल की समस्या काफी गंभीर है. लोग 60-70 फीट वाले चापाकल का पीला पानी पी-पीकर लोग बीमार हो रहे हैं. उधर, मुखिया लखींद्र साह कहते हैं कि पंचायत की समस्याओं को दूर करने की कोशिश में हम लगे हैं.

अप्पन समाचार न्यूज नेटवर्क

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