बांध नहीं, एटम बम बना रहे हैं हम : अनिल प्रकाश

जाने-माने पर्यावरणविद व सामाजिक कार्यकर्ता अनिल प्रकाश ने 80-90 के दशक में भागलपुर-कहलगांव के इलाके में गंगा मुक्ति आंदोलन का नेतृत्व कर मछुआरों को उनका हक दिलवाया. अनिलजी ने बोधगया आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभायी थी. उनके लेखों का संग्रह ‘समय से सरोकार’ प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है, जिसमें नदी, बांध जैसे मुद्दों के अलावा बहुराष्ट्रीय कंपनियों की साजिश से पाठकों को सचेत कराते हैं. अनिल प्रकाश अप्पन समाचार से बातचीत करते हुए बाढ़ की विभीषिका व विस्फोटक होते तटबंधों पर खुलकर बोले. यहां पेश है उनसे हुई लंबी बातचीत का संक्षिप्त अंश –

Anil Prakash

उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर बंगाल तक के इस पूरे इलाके में बाढ़ आनी ही है. इसे आप रोक नहीं सकते हैं. लगभग एक दशक के अंतराल पर भीषण बाढ़ आती है. लेकिन सामान्य बाढ़ हर साल आती है. इस इलाके की एक खास प्रकृति है. यह हिमालय से निकलनेवाली नदियों की बाढ़ है. और नदियां क्या हैं? प्रकृति जल बहाव के अपने रास्ते खुद बनाती है. हजारों हजार साल, लाखों लाख साल से इसके निर्माण की प्रक्रिया चलती चली आ रही है. इसकी धाराएं बनती हैं, बिगड़ती हैं. हिमालय की एक खास प्रकृति होती है. यहां से आनेवाली नदियों में हर साल अरबों-खरबों टन हर साल गाद आती है, सिल्ट आता है. और ये उपजाऊ मिट्टी है. एक तरह से समझिये कि यह बाढ़ कभी वरदान बन कर आती थी, आज अभिशाप बन गयी है. पहले के जमाने में सीतामढ़ी के इलाके में लोग कहते थे, ”बाढ़े जीयली, सुखाड़े मरली”. लोग कहते थे, ”बाढ़े आयल बलान तो बनल दलान, गेल बलान तो धंसल दलान”. बहुत पहले की बात है. एक प्रिंसिपल साहब ने मुझसे कहा था कि इस बार हमारे गांव में बाढ़ नहीं आयी. इस पर मैंने कहा, यह तो अच्छा ही हुआ है. उन्होंने तपाक से बोला कि नहीं, बाढ़ पांक लाती है, उपजाऊ मिट्टी बिछा देती है. लाखों वर्ष से इसके निर्माण की प्रक्रिया चल रही है. इसी से बिहार बना है, उत्तर प्रदेश का कई हिस्सा बना है, बंगाल बना है, बांग्लादेश बना है.

हिमालयन क्षेत्र में बाढ़ आयेगी ही, प्रकृति के मार्ग से अवरोध हटाइये
यह सिलसिला है और यह इसलिए है कि यह इलाका भूकंपीय जोन में है. हजारों वर्ष पहले इस इलाके में समु्द्र हुआ करता था. धरती 12 प्लेट्स पर टिकी है. उसमें एक इंडियन प्लेट खिसकते-खिसकते एक उभार पैदा किया और हिमालय पहाड़ बना. अब भी हिमालय जिंदा पहाड़ है. ऊपर की ओर आज भी उठ रहा है. हर साल 400 से लेकर 1000 बार छोटे-बड़े भूकंप के झटके आते रहते हैं. छोटे भूकंप तो पता ही नहीं चलता है. भूकंप के इन्हीं झटकों से हिमालयन जोन में भूस्खलन होता है और जब बारिश आती है तो वही मिट्टी बह-बह कर हमारे यहां आती है. इस चीज को यदि आप नहीं समझते हैं और अनियोजित निर्माण की प्रक्रिया इसी तरह चलती रहेगी, तो इसमें मिट्टी आयेगी, जो अवरोध पैदा करेगी. हमें प्रकृति के मार्ग से अवरोध, पानी के बहाव से अवरोध को हटाना होगा.

मरते गये तालाब, खत्म हो गये डीह
आख्यानों में, गीतों में, लोकगीतों में, किंवदंतियों में आपको कोसी क्षेत्र में, बागमती के क्षेत्र में, कमला के क्षेत्र में मिलेगा कि पहले भी पानी का बहाव रुकता था, लेकिन तब हजारों लोग मिलकर उसे हटा देते थे. इससे बाढ़ का प्रकोप कम हो जाता था. दूसरी बात, यहां बड़े पैमाने पर तालाब बनाने की परंपरा रही है. लोग तालाब बनाते थे. उंची जगह पर डीह बनाते थे. यह 20 फीट, 30 फीट उंचा इलाका होता था, जिससे फ्लड के समय उसका निदान हो जाता था. आप कह सकते हैं कि एक बड़ा सा प्लेटफॉर्म बनाकर उस पर अनाज संग्रह और संपत्ति सुरक्षित करने में मदद मिलती थी. बागमती के इलाके में अधिकतर घरों में पहले लोग नाव रखते थे. हर गांव में 10-12 हाथी के खूंटे दिख जाते थे. तब इतनी समृद्धि थी कि लोग हाथी पालते थे. यह सब उसी बाढ़ में बहकर आयी उर्वर मिट्टी की वजह से होनेवाली खेती के कारण संभव होता था.

तटबंध से बाढ़ सुरक्षा का पैदा हुआ भ्रम
एक बात और. तटबंध से बाढ़ सुरक्षा का भ्रम पैदा हुआ है. तटबंध जब नहीं थे, तो 12 किमी, 15 किमी, 16 किमी में नदी फैल जाती थी. वो विनाशकारी बाढ़ नहीं होती थी. बाढ़ धीरे-धीरे आती थी और नदियों की गहराई बढ़ जाती थी, क्योंकि वह सिल्ट बिछाती थी खेतों में. जिस साल बाढ़ नहीं आती थी, तो बागमती के इलाकों में महिलाएं पूजा करती थीं. वे अर्ज करती थीं कि हे बागमती मैया, बाढ़ ले आव. लोग न्योता देते थे. कोसी-कमला के इलाकों की महिलाएं अविरल बहनेवाली इन नदियों को न्योता देती थीं. अब तो बाढ़ विस्फोटक के रूप में आती है. चूंकि तटबंध का पेट सिल्ट से भरता जा रहा है. कहीं-कहीं तटबंध के भीतर का हिस्सा और बाहर का हिस्सा बराबर है. कहीं-कहीं नदी की पेटी 10-20 फीट तक उंची हो गयी है. कोसी, बागमती के इलाकों में जाकर देखिये. तटबंध नहीं, एक तरह से हमने एटम बम बनाकर रख दिया है.

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Appan Samachar Desk

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