गणतंत्र के मायने

बहुत पहले पढ़े सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के एक नाटक ‘बकरी ‘ का एक संवाद याद कर रहा हूं. बकरी की मालकिन बुढ़िया को जब देश का हवाला दिया जाता है, तब मासूमियत के साथ वह कहती है -‘हम देस में ना रहत हईं हुज़ूर, गांव में रहत हईं ‘ ( मैं देश में नहीं रहती, गांव में रहती हूँ.) बहुत कुछ ऐसा ही कविवर सुमित्रानंदन पंत का अनुभव रहा होगा, तभी तो उन्होंने लिखा –

”भारत माता ग्रामवासिनी
तरुतल निवासिनी”

आज अपने राष्ट्रीय त्योहार पर अपने देश पर सोचते हुए सतरंगे विचार आ रहे हैं. क्या और कैसा है हमारा देश? यह भी क़ि क्या होता जा रहा है? किनका होता जा रहा है? वे कौन हैं, जो देश पर अमरबेल की तरह पसरते- फैलते जा रहे हैं, उसे अपने आगोश में लिए जा रहे हैं. और वे कौन हैं जो अपने गांव और अपनी काया में, बकरी की बुढ़िया की तरह सिमटते जा रहे हैं. लगभग सवा सौ करोड़ जनगण का यह मुल्क आज मुट्ठी भर लोगों की जागीर बन कर रह गया है, तो क्यों?

स्पष्ट कर दूं, मैं भारत-व्याकुल प्राणी नहीं हूं. हमारा देश प्यारा जरूर है, क्योंकि यही है जो मेरा है; लेकिन यह न्यारा भी है यह नहीं कह सकता. हाँ, न्यारा बनाना जरूर चाहूंगा इसे. इतना न्यारा कि पूरी दुनिया को निमंत्रित कर सकूं कि आओ म्हारे घर, देखो म्हारा घर. हमारे लिए देश का अर्थ है एक घर जहां भाईचारा, बराबरी और प्रेम हो. एक नागरिक के रूप में हमारी जिम्मेदारी है कि संविधान – संहिता के रूप में हमारे पुरखों ने हम पर देश में गणतंत्र -यानी जनता के राज की जो जिम्मेदारी सौंपी है, उसका कुशलता से संवहन करें. यहां नयी मनुष्यता का निर्माण करें. जाति, धर्म और संकीर्णताओं से दूर एक ऐसी मनुष्यता का, जिसका स्वप्न हमारे संविधान निर्माताओं ने देखा था. बचपन में हमलोगों ने संकल्प-गीत गाये थे –

”देश हमारा, धरती अपनी, हम धरती के लाल
नया संसार बसायेंगे, नया इंसान बनाएंगे.”

हमारा देश धरती का एक हिस्सा है, ऐसा हिस्सा जिसपर हम है; इसलिए हमारी जिम्मेदारी है की इसे खूबसूरत बनायें. इसे खूबसूरत बनाकर ही दुनिया में हम गर्व से घूम सकेंगे. लेकिन कुछ लोग हैं कि तोप-तलवारों और मिसाइलों से भारत बनाना चाहते हैं. देश के भीतर और बाहर कोहराम खड़ा कर वे वर्चस्व और दादागिरी स्थापित करना चाहते हैं. आप तनिक ठहर कर विचारिये कि वे देश को कैसा बनाना चाहते हैं. क्या सचमुच ऐसा देश हमारे ऋषि -मुनियों, कवियों और दार्शनिकों ने बनाना चाहा था? मेरा मन उत्फुल हो जाता है जब सोचता हूं हमारे देश का नाम भारत; किसी राजा ने नहीं, किसी कवि अथवा कवियों के समूह ने प्रस्तावित किया. शकुंतला के बेटे भरत के नाम पर संभवतः यह भारतवर्ष बना. करुणा, संवेदना, सौंदर्य और पीड़ा का जैसा समावेश शकुंतला और भरत की कथा में है, उससे मन बार -बार भावुक हो जाता है. लेकिन वह भावुकता, वह संवेदना और करुणा हम अपने राष्ट्र में शामिल क्यों नहीं कर पाते. हम भारत को मातृ रूप देकर भारतमाता तो बना देते हैं, लेकिन उसमें मातृत्व के संस्कार – यथा दया और करुणा – क्यों नहीं समावेशित कर पाते हैं. हम राष्ट्र को क्रूर, अहंकारी और वर्चस्वकारी ही क्यों बनाना चाहते हैं?

आज देश में गणतंत्र स्थापित होने के इस पर्व पर क्या हम संकल्प लेना चाहेंगे हैं कि देश से गरीबी, गैरबराबरी और अशिक्षा दूर करने हेतु अपनी तरफ से कुछ प्रयास करेंगे. गंदगी और गैरबराबरी सतत उभरते रहने वाली चीजें हैं. एक रोज स्नान कर आप पूरी जिंदगी स्वच्छ नहीं रह पाएंगे. स्वच्छता और समता के लिए निरंतर चौकसी बरतनी होती है. हम इसे अपने राष्ट्र के संस्कार या धड़कन में शामिल करने का प्रयास कर सकें, यही कोशिश होनी चाहिए.

Premkumar Mani

प्रेमकुमार मणि के फेसबुक वॉल से साभार (लेखक बिहार विधान परिषद् के सदस्य हैं.)