गांव का छोरा बन गया बंबइया गीतकार व म्यूजिक डायरेक्टर

सरैया. पिता की एक डांट से यदि बेटे को उसका मुकाम मिल जाये, तो वह डांट, डांट नहीं वरदान बन जाता है. मुजफ्फरपुर जिले के हरिहरपुर गांव के राकेश निराला के लिए भी पिता की डांट, ‘तुम जीरो हो, जीरो’ ने जिंदगी की दिशा ही बदल दी. गांव का यह छोरा 17 साल की उम्र में मजबूत इरादों के साथ बंबई पहुंच गया वॉलीवुड की सतरंगी दुनिया में अपनी किस्मत आजमाने. कम समय में ही राकेश ने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बना ली.  राकेश निराला को सबसे पहले चर्चित सीरियल ‘चंद्रकांता’ की टीम के साथ असिस्ट्रेंट के रूप में काम करने का मौका मिला.  राकेश गायक बनना चाहते थे, लेकिन वे बन गये गीतकार. उन्होंने कई हिंदी व भोजपुरी एलबम व फिल्मों के लिए गीत लिखे. उस्ताद सुल्तान खान व चित्रा के पॉपुलर एलबम ‘पिया बसंती’ के लिए इन्होंने गीत लिखे. ‘द इनफिनिट’, ‘मोर छईंया भुईंया’, ‘कॉलेज कैंपस’, ‘मिस्टर हॉट मिस्टर कूल’, ‘लाल दुपट्टा’, ‘मेरे भगवान श्री साईंबाबा’, ‘साईं की नगरिया’, ‘चलो शेरावाली के धाम’, ‘साईं तूझे शत-शत नमन’, ‘सजना मंगिया सजाई द हमार’ समेत दर्जनों भक्ति व भोजपुरी एलबम में राकेश ने बेहतरीन गीतों का गुलदस्ता सजाया है. संदेश शांडिल्य, विनोद राठौर, उदित नारायण, कविता कृष्णमूर्ति, अल्का याज्ञनिक, आशा भोंसले आदि ने राकेश के गीतों को स्वर दिया है. हिंदी मूवी ‘फ्लेम ‍: एन अनटोल्ड लव स्टोरी’ के लिए भी राकेश ने गीत लिखे. राकेश निराला ने गीतकार के रूप में तो अपनी छाप छोड़ी ही, अब म्यूजिक डायरेक्टर के रूप में अपना जलवा बिखेर रहे हैं. बद्रीनाथ सबत निर्देशित फीचर फिल्म ‘गा’ में राकेश ने संगीत दिया है, जो गांधीजी पर केंद्रित है. उनकी आनेवाली फिल्में, जो पोस्ट प्रोडक्शन में हैं- रैकेट, तर्पण, पुस्तक, इश्क सूफियाना शूट पर हैं. दक्षिण के एक ही प्रोडक्शन हाऊस की दाे फिल्मों को साइन किया है.

हरिहरपुर और हरौना की पुरानी यादें
राकेश निराला का बचपन अपने पैतृक गांव हरिहरपुर में बीता. यह गांव मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड में स्थित है. इसी हरिहरपुर गांव में राकेश का जन्म हुआ. पांच साल की उम्र में वे अपने पिता के साथ रहने हरौना चले गये. पिताजी मोतीपुर प्रखंड के हरौना गांव में एक सरकारी स्कूल में पदस्थापित थे. राकेश यहां आकर बहुत खुश थे. स्कूल प्रांगण में रंग-िबरंगे फूलों की खुशबू, उस पर मंडरानेवाली तितलियाें, विद्यालय से कुछ दूरी पर झील का नजारा, झील के बीचों-बीच पान का बागान. इसी प्राकृतिक सौंदर्य ने राकेश के मन में कवि की कल्पना का संचार करता रहा. नन्हें राकेश ने पहली बार हिंदू-मुसलिम एकता का संदेश देती कविता की रचना की. तब वे आठवीं में पढ़ते थे. राकेश निराला अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि एकांत पलों में झील के किनारे बैठ कर कल्पनाओं में खोया रहना या दोस्तों के साथ तैराकी करना, कमल के फूल व कमलगट्टा के लिए बाजी लगाना और फिर मस्ती करना, वाह क्या दिन थे!

संगीत से जुड़ा नाता
मैं मोतीपुर से हरिहरपुर होते हुए साइकिल से करीब 50 किलोमीटर दूर गोरौल संगीत सीखने जाता था. सप्ताह में दो बार जाना होता था. संगीत के मेरे गुरु थे सरयू भारती. 50 किलोमीटर साइकिल चला कर आने के बाद गुरुजी पान लाने के लिए 2 किलोमीटर दौड़ाते थे. वो देखना चाहते थे मुझमें कितना लगन है.  उन्होंने डेढ़ महीने बाद हारमोनियम छूने को बोला. उस दिन मुझे लगा जन्नत की सैर करने जा रहा  हूं. मैं बहुत जल्द उनके प्रिय शिष्यों में शामिल हो चुका था. अगस्त महीने में सोनपुर मेला में स्थित एक मठ में हर साल संगीत का कायक्रम होता था. गुरुजी मुझे अपने साथ वहां ले गये. पहली बार शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों को देखने का मौका मिला. गुरुजी ने सबसे मिलवाया. मैं उनका यह उपकार आजतक नहीं भूला पाया हूं, जबकि वे भी सवर्ण थे. संगीत से मेरा रागात्मक संबंध मेरी मां यशोदा देवी व पिता राजेंद्र कुमार के कारण प्रगाढ़ हुआ. पिताजी साहित्यप्रेमी थे, इसलिए लेखन का बीज मेरे मन में अंकुरित हुआ.  

मुंबई में महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग की ओर से सम्मानित होते राकेश निराला

पिताजी का डांटना जीवन का टर्निंग प्वाइंट
मेरे जीवन की एक घटना ने सब कुछ बदल दिया. बहन की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ तय कर दी गयी थी, जबकि वह और पढ़ाई करना चाहती थी. अक्सर गांव की लड़कियां अपने माता-पिता के सामने शादी के बारे में खुल कर बोल नहीं पाती हैं. सो,  उसने मुझसे अपनी  शादी का विरोध करने को कहा. मैंने उसका नाम लिए बिना खुल कर विरोध किया. मैंने कहा, अभी वह पढ़ना चाहती है. शादी बाद में भी हो सकती है. बाबूजी ने कहा, अभी सब कुछ कम दहेज में हो रहा है. बाद में ऐसा मिलेगा कि नहीं, पता नहीं. इसलिए यह शादी होगी. मैंने कहा, बाद में मैं कमा कर दहेज जुटा लूंगा और उसकी शादी करूंगा. बाबूजी ने झिड़कते हुए कहा कि तुम्हारे कविता-कहानी व गानाें का कोई पैसा देगा? तुम जीरो हो जीरो, यही बात मुझे लग गयी . चुपचाप झोला-झंटा उठाया और सुबह-सुबह बाबूजी सोये ही थे, तभी उनका आशीर्वाद लेने पहुंच गया. पूछा, कहां की तैयारी है. मैंने बोला बंबई की और अब ये जोरो हीरो बनकर ही लौटेगा. उन्होंने मना नहीं किया. वे समझ गये कि ये मानेगा नही. उन्होंने आशीर्वाद दिया और मैं बंबई के लिए चल दिया. वहां पहुंच कर काम की तलाश में भटता रहा. अंतत: पहली बार चर्चित सीरियल ‘चंद्रकांता’ में असिस्टेंट के रूप में काम करने का मौका मिला. 16,000 प्रति एपिसोड के हिसाब से महीने में 64,000 रुपये कमाया. जब पहली कमाई के पैसे मिले, तो खुशी का ठिकाना नहीं था. 

मेरे साथ हुई चीटिंग
राकेश बताते हैं कि एक बार मोतीपुर मिड्ल स्कूल में खेल प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था. हमने भी सभी खेलों में भाग लिया था. मेरे क्लास में केवल मुझे ही प्रथम पुरस्कार मिला. लेकिन प्रिंसिपल ने मेरे साथ चीटिंग की. प्रथम पुरस्कार के लिए रखी गयी ट्रॉफी छुपा दी गयी और कहा गया कि घर भूल आया हूं. जबकि मैंने खुद दो घंटे पहले ही ऑफिस में रखी ट्रॉफी देखा था. पता चला कि मैं जातीय संकीर्णता का शिकार बन गया हूं. बाद में मुझे पांच नोटबुक मंगा कर थमा दी गयी और वही ट्रॉफी दो महीने बाद एक दूसरी प्रतियोगिता में उन्होंने अपने बेटे को दी. राकेश सवाल करते हैं कि अब आप ही बताइये, जातिवाद को बढ़ावा कौन देता है? स्काउट में भाग लिया, तब भी मेरे साथ चीटिंग की गयी. जिला स्तर पर चुन न लिया जाऊं, इसलिए मेरे साथ साजिश की गयी. जब एक दिन बचा, तो ड्रेस सिलवाने को कहा गया. अंतत: एक दिन में ही मैंने ड्रेस सिलवा लिया और  हाथ में लेकर दौड़ता-दौड़ता स्कूल पहुच गया. मेरे सामने ही स्काउट के बच्चों को लेकर गाड़ी चली गयी. मैं हाथ में पॉलीथिन लिए चिल्ला -चिल्ला कर रोता रह गया.  

– अप्पन समाचार न्यूज नेटवर्क

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