मर–मिट रहीं उत्तर बिहार की जीवनदायिनी नदियां

मानव सभ्यता का विकास नदियों के आसपास ही हुई है। नदियां हमारे लिए जीवनदायिनी स्वरूपा हैं। मनुष्य के अलावा अन्य प्राणियों, वनस्पतियों एवं इको सिस्टम के लिए भी जरूरी हैं नदियां। इसलिए तो नदियां प्राचीन काल से इतनी पूजनीय हैं। खासकर गंगा को मां का दर्जा देकर हम पूजते आ रहे हैं। पर, आज स्थिति उलट है। अविरल बहनेवाली नदियां रोकी जा रही हैं। नदी नाले में तब्दील होती जा रही है। निर्मल जल काला पानी में बदलता जा रहा है। नदियों की तलहटी में अपना संसार बसानेवाले जीव–जंतु भी मरते–मिटते जा रहे हैं। कहीं औद्योगिक कचरे से नदियों की सेहत बिगड़ रहा है, तो कहीं धार्मिक आस्था व मानवीय करतूतों से नदी मरती–मिटती जा रही हैं। उत्तर बिहार में आठ प्रमुख नदियां बहती हैं। ये हैं गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कोसी, कमला बलान, घाघरा, महानंदा, अधवारा समूह की नदियां। इन सभी नदियों का जल बिहार के बीचो–बीच से गुजरने वाली गंगा में समाहित हो जाती हैं। बूढ़ी गंडक को छोड़कर भोश सातों नदियां नेपाल से निकलती हैं। बूढ़ी गंडक का उद्गम पश्चिम चंपारण का एक चौर है। उत्तर बिहार में इन बड़ी नदियों के अलावा दर्जनों छोटी–बड़ी नदियां बहती हैं, जो इस मैदानी इलाके की आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक समृद्धि में सहायक रही हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश गत कई दशकों से ये नदियां बरसाती बन कर रह गयी हैं अथवा तिल–तिल कर मिटती जा रही हैं। घाघरा नदी वैशाली जिले के लालगंज, भगवानपुर, हाजीपुर, देसरी, सहदेई प्रखंडों से गुजरती हुईं महनार प्रखंड में बाया नदी में मिलती है।

 आगे जाकर यह गंगा में मिल जाती है। यह नदी बिहार में कई जगह लुप्त दिखती है। पहले यह वैशाली जिले में सिंचाई व्यवस्था की रीढ़ थी। गंडक नदी से आवश्यक जल का वितरण होता था, जो इसके बहाव के पूरे क्षेत्र में हजारों एकड़ जमीन को सींचती थी। चंपारण, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर जिलों की जमीन की प्यास बुझाने वाली बाया नदी का हाल भी बुरा है। दशकों से उड़ाही न होने के कारण इसकी पेटी में गाद जमा हो गया है। गरमी में भी पानी सूख जाता है। किसानों के लिए वरदान रही बाया को पुनर्जीवित करने के लिए वाया डैमेज योजना बनायी गयी, पर यह ठंडे बस्ते में पड़ी है। मुजफ्फरपुर जिले में कभी बलखाने वाली छोटी–छोटी नदियां माही, कदाने, नासी भी दम तोड़ चुकी हैं। कहीं–कहीं गड्ढे के रूप में नदी का निशान जरूर मिल जाता है। चंपारण में भपसा, सोनभद्र, तमसा, सिकहरना, मसान, पंडई, ढोंगही, हरबोरा जैसी पहाड़ी नदियां बरसाती बनती जा रही हैं। प्रदूषण का बोझ ढोने को विवश हैं। सिल्टेशन की वजह से ये छिछला होती जा रही हैं। इनमें से कई नदियां खनन विभाग की उदासीनता व बालू माफियाओं के काले धंधे की शिकार हो रही हैं। इस इलाके में नदियों से अवैध ढंग से बालू की बेरोकटोक निकासी की जा रही है। सुतलाबे, सुमौसी, रघवा नदी भी अपनी पुरानी धारा के लिए तरस रही हैं। पूर्वी चंपारण के कल्याणपुर प्रखंड स्थित राजपुर मेला के पास सुमौसी नदी की तलहटी को मिट्टी से घेर कर लोगों ने तालाब बना दिया है, जिसमें वे अस्थायी रूप से मत्स्यपालन करते हैं। केसरिया प्रखंड के फूलतकिया पुल के समीप यह नदी अतिक्रमित कर ली गयी है। झांझा नदी दिलावरपुर के पास पूरी तरह संकीर्ण हो गयी है। सीतामढ़ी में लखनदेई, लालबकेया, झीम नदी अब अविरल व निर्मल नहीं बहती हैं। लखनदेई (लक्ष्मणा) की धमनियों में सीतामढ़ी भाहर का कचरा बह रहा है। इस नदी के किनारे जमीन अतिक्रमित कर लोग घर बना रहे हैं। रीगा चीनी मिल का कचरा मनुशमारा नदी को जहरीला बना रहा है। बीच–बीच में मनुषमारा, लखनदेई की उड़ाही के लिए आंदोलन भी होते रहते हैं, पर कुछ हुआ नहीं। बागमती के कार्यपालक अभियंता भीमशंकर राय ने बताया कि भारत–नेपाल सीमा के भारतीय इलाके में करीब 8 किलोमीटर में स्थानीय लोगों ने अतिक्रमण कर लखनदेई की पेट में घर बना लिया, जिस कारण उसकी धारा अवरूद्ध हो गयी है। ऐसे में नदी की उड़ाही करना मुश्किल हो रहा है। नदी के किनारे के गांवों में सिंचाई की समस्या उत्पन्न हो गयी है। जमुरा–झीम नदी की धारा मोड़ कर लखनदेई में मिलाने की योजना पर काम हो रहा है। करहा, धौंस, जमुनी, बिग्छी आदि नदियां मिथिलांचल के किसानों, पशुपालकों के लिए अब उपयोगी नहीं रही। बिग्छी व जमुनी नेपाल स्थित सिगरेट व कागज की फैक्ट्रियों का रासायनिक अवशेष लेकर आती है और धौंस में मिला देती हैं। ये नदियां कालापानी की सजा भुगत रही हैं। इस नदी में स्नान करने का मतलब है चर्मरोग से ग्रसित हो जाना। कुछ साल पहले केंद्रीय जल आयोग की टीम आयी थी। टीम ने धौंस के पानी को अनुपयोगी बताया था। गत दो–तीन साल में अधवारा समूह की कई नदियों की धारा मर चुकी है। दरभंगा जिले में बहनेवाली करेह, बूढ़नद नदियों ने भी अपना प्राकृतिक प्रवाह खो दिया है। नदी विशेषज्ञ रंजीव कहते हैं कि विकास के अवैज्ञानिक मॉडल व जलवायु परिवर्तन के कारण नदियां मर रही हैं। हाल के दिनों में उत्तर बिहार की नदियों में पानी की आवक कम हुई है। इसका कारण है कि गत एक दशक से हिमालय क्षेत्र में बारिश कम हुई है। बूढ़ी गंडक व बागमती नदी के पानी से बना प्रमुख प्राकृतिक झील कांवर झील भी सूख गया है। तालाब जैसा दिखता है। कोसी की सहायक नदियां तिलयुगा पर बांध बनाया गया है। जगह–जगह स्लुइस गेट लगाया गया। इस सिल्ट लोडेड नदी में स्लुइस गेट लगाने से उसकी धारा बदल गयी है। हमें नदियों के विज्ञान को समझना होगा। तभी विकास की रूपरेखा तय करनी होगी। बागमती की बाई ओर सिपरी नदी कहलानेवाली धारा ‘फलकनी’ तथा ‘हिरम्मा’ गांवों के पास से अलग होकर दाहिनी धारा के समानांतर चलती हुई पूरे मुजफ्फरपुर जिले की पूर्वी सीमा तक बहती थी और दाहिने प्रवाह के साथ जिले की सीमा पर ‘हठा’ नामक गांव के पास मिलती थी, पर यह ‘सिपरी’ धारा भी अब प्राय: लुप्त हो चुकी है। 1970 में बागमती को इस धारा से बहाने का प्रयास किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। सुलतानुपर भीम गांव के पास ही बागमती की एक प्राचीन ‘कोला’ नदी नामक उपधारा ‘सिपरी’ से मिलती थी। कोला नदी भी प्राय: लुप्त हो चुकी है। उत्तर बिहार की नदियों में सरयू के बाद पूर्व की ओर दूसरी बड़ी नदी गंडकी है, जिसे नारायणी भी कहते हैं। नेपाल के तराई क्षेत्र में इसे भालीग्राम भी कहा जाता है। यह नदी भी कहीं सिकुड़ गयी है, तो कहीं दूर चली गयी है। नारायणी के किनारे बसे गांव हुस्सेपुर परनी छपरा के युवा किसान पंकज सिंह बताते हैं कि पहले करीब डेढ़ किलामीटर चौड़ाई में नदी का पानी बहता था। अब तो यह नाले की तरह बह रही है। गाद भर गया है। कटाव के कारण हमारे घर के सामने यह नदी मुजफ्फरपुर से रूठ कर छपरा से बहने लगी है। दरभंगा में एक संगोष्ठी में भाग लेने आये जलपुरूष राजेंद्र सिंह ने कहा कि सन् 1800 में ही ईस्ट इंडिया कंपनी के इंजीनियरों ने बिहार की नदियों के साथ अत्याचार प्रारंभ कर दिया था। इस इलाके के इको सिस्टम को समझे बिना ही पुल, पुलियों, कल्वर्टों का निर्माण शुरू कर दिया गया। रेल की पटरियां बिछाने के लिए गलत तरीके से मिट्टी की कटाई की गयी। इस कारण नदियों का नैसर्गिक प्रवाह प्रभावित हो गया। इस इलाके में पानी का कंटेंट तेजी से बदल रहा है, जो लोगों को बीमार भी बना रहा है। उन्होंने कहा कि पूरा इको सिस्टम जल पर आधारित होती है और एक समृद्ध इको सिस्टम में ही समृद्ध इकोनॉमी विकसित हो सकती है। जल संरक्षण की नीति बनानेवाले केंद्र व राज्य सरकार के अधिकारी यूपी व उत्तरांचल की नदियों के हिसाब से नीतियां बनाते हैं, जो बिहार में सफल नहीं हो पाते हैं। जल संसाधन विभाग की कवायद भी बांध, बाढ़ व राहत कार्यक्रम तक सिमटी रहती हैं। नदियों के विज्ञान, उसकी सेहत व उसके पानी में पलने वाले जीव–जंतुओं के जीवन की चिंता न सरकार को है और न विभाग को। लिहाजा, जरूरत है कि लोग जीवनदायिनी नदियों को मरने से बचायें।

इनपुट : संतोष सारंग

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