दलितों को कुर्सी पर बैठने की थी मनाही

50 साल पहले कैसा था हमारा गांव? तब की सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक परिस्थितियां क्या थीं. आज की युवा पीढ़ी यह सब जानना चाहती है. स्वतंत्रता दिवस के ऐन मौके पर नयी व पुरानी पीढ़ी के बीच सेतु बन कर अप्पन समाचार ने तब के गांव को जानने-समझने का प्रयास किया है. इसके लिए नागरिक पत्रकार की हैसियत से चांदकेवारी गांव के अमृतांज इंदीवर ने मुजफ्फरपुर जिले के सरैया प्रखंड के गहिलो गांव निवासी व सिंचाई विभाग से रिटायर्ड 80 साल के वरीय नागरिक रामानंद सिंह से बातचीत की. 50 साल पहले श्री रामानंद 30 साल के युवा थे. प्रस्तुत है आज की पीढ़ी व पुरानी पीढ़ी के बीच हुए संवाद के दाैरान छिटकीं अतीत की यादें-

मैं 1952 में सरैया प्रखंड के जैंतपुर हाइस्कूल में पढ़ता था. पूरे स्कूल में इक्के-दुक्के ही पिछड़े समाज के बच्चे पढ़ते थे. दलित छात्र एक भी नहीं था. लड़कियों के स्कूल जाने की बात करना समाज विरोधी था. चूल्हा-चौका, पारिवारिक व्यवहार व सेवा-टहल करना जान जाये, तो सच्चे अर्थों में यही स्त्रियों के लिए शिक्षा थी. पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन नित्य होते रहते थे. पुरोहित का बहुत सम्मान था. इनकी राय के बगैर कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता था. यही कारण था कि अंधविश्वास, रूढ़ियां, सामाजिक विषमताएं यहां से पैदा हुई. मनुस्मृति में वर्ण विभाजन कर्म के आधार पर किया गया है. पर आज ढोंगी व समाज के धूर्त लोगों ने अपने हित के लिए सामाजिक समरसता व बराबरी को ध्वस्त कर दिया है.

पशुओं जैसा होता था व्यवहार
दलितों व महिलाओं की हालत दयनीय थी. दलितों के प्रति श्रेष्ठ हिंदुओं की मानसिकता अच्छी नहीं थी. लोग घृणा की दृष्टि से उन्हें देखते थे. लोग अछूत व निकृष्ट समझकर दुत्कारते थे. उनके साथ पशुओं जैसा व्यवहार किया जाता था. रामानंद सिंह बताते हैं कि मेरे गांव के बगल में दलित बस्ती थी. उसकी हालत बहुत दयनीय थी. दलित परिवार फूस के घर में निवास करते थे. भोजन, वस्त्र आदि के लिए खेतिहरों के पास मजदूरी करने जाते थे. उन्हें कुर्सी, चौकी या किसी ऊंचे स्थान पर बैठने नहीं दिया जाता था. वास्तव में कई दशक तक वे मंदिर में पूजा-पाठ से भी वंचित रहें. सामाजिक व धार्मिक स्तर पर उनके साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जाता रहा है. यही कारण है कि आजादी के 70 साल बाद भी अधिकतर दलितों के उद्धार के लिए हुए प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो सका.

मिट्टी के घर की बात ही निराली
रामानंद सिंह कहते हैं कि ‘मिट्टी का घर’ प्रेम, भाईचारा, आपसी सौहार्द, संवेदना आदि का निवास स्थान हुआ करता था. तब या तो मिट्टी के घर थे अथवा टाटी के घर. पक्का मकान दूर कहीं किसी इक्के-दुक्के लोगों के पास था. लोग सीधे-सादे व मददगार प्रवृति के होते थे. छल-प्रपंच कम था. मुस्लिम व हिंदू में इतनी एकता थी कि हरेक पर्व-उत्सव को मिल-जुलकर मनाते थे. ईद के मौक पर हिंदुओं के दरवाजे-दरवाजे ताजिया घुमाया जाता था. इससे एक-दूसरे के बीच सौहार्द का माहौल कायम होता था. वहीं, महावीरी झंडा के दौरान मुस्लिम बिरादरी के लोग लाठी-डंडा, तलवार-ढाल, कुश्ती आदि करतब दिखा कर भाइचारे की डोर को भी मजबूत करते थे. सेवई व ठकुआ एक-दूसरे के घर पहुंचते ही बच्चे टूट पड़ते थे. ग्राम देवता, कुलदेवता, अन्नदेवता, पंच-परमेश्वर ये सब गांव की अपनी संपत्ति है. गांव शब्द से अपनत्व का बोध होता है. गांव ही संसार का पालनकर्ता व अन्नदाता है. खेती-किसानी, पशुपालन समेत सामाजिक रीति-रिवाज, परंपराएं, लोकगीत, लोकनृत्य आदि देश का मेरूदंड है. इसके बिना राष्ट्र की उन्नति संभव नहीं है.

50 साल पहले का गांव, गांव नहीं एक परिवार था
गांव में समरसता, मेल-मिलाप, सहानुभूति, प्यार-मुहब्बत का माहौल था. हर परिवार अपने आसपास के लोगों के दुःख-दर्द एवं शादी-अनुष्ठान में आपसी बैर भूला कर शामिल होते थे. गांव में किसी के साथ अनहोनी हो जाये, तो गांव के प्रत्येक लोग उसके लिए उठ खड़े होते थे. तब लोग इतना स्वार्थी व धनलोलुप नहीं थे. बच्चों से लेकर नौजवान तक बुजुर्गों की इज्जत करते थे. उनकी राय के बगैर कोई भी कार्य नहीं करता था. इतना ही नहीं समाज विरोधी या अनैतिक व्यवहार करनेवालों के लिए पंचायत बैठ जाती थी. पंच को परमेश्वर का दर्जा प्राप्त था. पंच की वाणी देववाणी के समान थी. जो न्याय कर दिया गया वह सर्वमान्य होता था. गांव के प्रत्येक बच्चों पर पूरे गांव की निगाह रहती थी. गलत करते पकड़े जाने पर बेहिचक डांट-फटकार लगाने में कोई गुरेज नहीं करता था. कुल मिलाकर गांव के लोग एक समाज के सदस्य की हैसियत से जीवन-बसर करते थे. यही कारण था कि अमन-चैन व शांति कायम थी. परंतु जाति-पाति, ऊंच-नीच, छुआछूत, ढोंग-ढकोसला, झांड़-फूंक, डायन-ओझा आदि बुराइयां तब भी व्याप्त थी और आज भी है. इसका मुख्य कारण अशिक्षा व जातीय वर्चस्व बनाये रखने की मानसिकता थी.

धूप की परछाई देख बताते थे सही समय
किसानों के पास मौसम की गजब जानकारी थी. घर के बुजुर्ग नीले आसमान को देखकर वर्षा, आंधी व हवा के रूख को पहचान जाते थे. तब घड़ी कहां थी लोगों के पास. धूप की परछाई देखकर ही लोग समय का अनुमान लगा लेते थे. रोहिणी, अाद्रा, हथिया आदि नक्षत्रों में घनघोर वर्षा होती थी. अब बारिश के लिए किसान टकटकी लगाये रहते हैं. परंपरागत बीज से किसान खेती करते थे. उपज भले ही कम हो, पर जैविक खेती होती थी. गोबर-करसी का इस्तेमाल होता था.

पहली बार गांव में आया था रेडियो-टीवी
पहली बार सन् 1954 में गांव के बैद्यनाथ सिंह मरफी रेडियो बाजार से खरीदकर लाए थे. दलान में लोगों की भीड़ लग गयी थी. ‘नमस्कार! आकाशवाणी पटना से बोल रहा हूं..’ सुनकर लोग रोमांचित हो उठे थे. आधे घंटे के बाद लोकगीत का कार्यक्रम शुरू हुआ, तो गांव के लोग पहली बार रेडियो पर गाना सुनने का लुत्फ उठाया. इसके बाद हर दिन सायं पहर में प्रसारित होनेवाले समाचार को सुनने के लिए लोग बेताब रहते थे. गांव के कुछ लोग चर्चा करते थे कि आखिर रेडियो में आवाज कहां से आ रही है. इसी तरह 1984 में गांव के प्रोफेसर श्रीमन नारायण सिंह टीवी खरीद कर गांव में पहली बार लाए थे, तो लोग देखकर आश्चर्यचकित रह गये. उन्होंने बरमादे पर टीवी देखने आनेवालों के लिए बैठने की पूरी व्यवस्था की. कल होकर खबर आयी कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का निधन हो गया. खबर जंगल की आग की तरह फैल गयी. लोग टीवी पर समाचार देखने दूरदराज से पहुंचने लगे थे.
अधिवक्ता हरिक्षण सिंह ने पहली बार गांव में हीरो साइकिल खरीद कर लाया था. तब भी ग्रामीण उनके दरवाजे पर साइकिल देखने जुट गये थे.

लोग खाते थे मोटा अनाज
आजादी के बाद भुखमरी की स्थिति थी. मक्के की रोटी, अलुआ, मड़ुवा, कौनी का भात ही लोग खाते थे. गेहूं का उत्पादन कम होता था. पर्व-त्योहार व मेहमाननवाजी में गेहूं की रोटी खाने को मिलती थी. मोटा चावल बकोये, ललदेइया, डोलन, चैरइया, गदर, बासमतिया की उपज 10-15 किलो प्रति कट्ठा के हिसाब से होती थी, जिसे लोग कोठी में रखते थे. बसमतिया चावल मिट्टी की हांडी में इसलिए रखते थे कि अतिथि का सत्कार किया जा सके. स्वतंत्रता के बाद पहली बार जनवितरण प्रणाली की दुकान खुली थी. उसमें अमेरिका से गेहंू व बाजरा आया था, जिसे लोगों ने पहली बार देखा और चखा था. उसके पहले मक्के व मडुवा की रोटी से ही काम चलता था. गरीब लोगों का प्रिय भोजन मक्के का सतुआ व अलुआ था.

पैसे की जगह अनाज दी जाती थी मजदूरी
रामानंद सिंह बताते हैं कि 1956 में मैट्रिक की परीक्षा देने मुजफ्फरपुर गया था. गांधी होटल मुजफ्फरपुर में छह अाने में भरपेट भोजन हो जाता था. एक आना, दो अाना, दस अाना, आठ अाना के सिक्के जिसके पास हो, वह आराम से शहर-बाजार करके आ जाता था. छह अाना आज का करीब 60 रुपये के बराबर है. निकौनी, मजदूरी के एवज में ढाई सेर अनाज दिया जाता था मजदूरों को. मोटा अनाज 40-50 रुपये प्रति क्विंटल मिलता था.

पैदल 10 कोस चलकर शहर पहुंचते थे लोग
‘जंगल सिंह की बस’ एकमात्र साधन था आवागमन का. रामानंद सिंह बताते हैं कि जिला मुख्यालय से गांव 30 किमी की दूरी पर स्थित है. दो दर्जन गांवों के बीच जंगल सिंह की एकमात्र बस चलती थी, जो देवरिया, खैरा, बड़का गांव होते हुए कच्ची सड़क पर हिचकोले खाते हुए दो घंटे में मुजफ्फरपुर पहुंचती थी. किराया आठ अाना था. पैसा बचाने के लिए घर से सुबह 4 बजे पैदल चल कर 9-10 बजे ड्यूटी पहुंच जाते थे. दूर-दराज जाने के लिए टमटम, इक्का, बैलगाड़ी आदि मुख्य सवारियां थीं.

 

– अप्पन समाचार न्यूज नेटवर्क

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