बिहार में बाढ़ व बांध का सरकारी कहर

मुजफ्फरपुर. पूरा उत्तर बिहार बाढ़ की चपेट में है. बाढ़ से राज्य के 17 जिलों में तबाही मची है. एक करोड़ से अधिक लोगों की जिंदगी मझधार में फंसी है. अब तक डेढ़ सौ से अधिक लोगों की जानें जा चुकी हैं. किसानों की सारी मेहनत व दाना-पानी बह चुका है. फसलों को भारी क्षति हुई है. प्रारंभिक आकलन के अनुसार, 15 जिलों के 63 प्रखंडों में 2.28 लाख हेक्टेयर में लगी फसल बाढ़ के पानी में डूब चुकी है. जान-माल को भारी नुकसान हुआ है. मूक पशुओं पर भी आफत आन पड़ी है. बेतिया व मोतिहारी में दो दर्जन से अधिक हिरण व गैंडे बह कर आ गये. एक हिरण की मौत भी हो गयी. सरकारी व गैरसरकारी स्तर पर राहत व बचाव कार्य भी चलाये जा रहे हैं. सेना व एनडीआरएफ का बचाव दल भी बाढ़ग्रस्त इलाकों में पहुंच कर फंसे लोगों को निकालने में लगा है. हालांकि, तमाम कवायद के बाद भी अधिकतर इलाकों में राहत सामग्री नहीं पहुंच पा रही है. केवल ऊंचे स्थानों पर शरण लिए बाढ़पीड़ितों तक ही राहत बांटी जा रही है. हजारों लोग कई-कई दिनों से भूख से बिलबिला रहे हैं. एक-दो दिन हेलीकाॅप्टर से राहत पैकेट गिराये गये. कुछ लोगों को मिला, तो बहुत लोग हाथ उठाये देखते रह गये. कुछ ने आकाश से गिरे पैकेट लूट लिये. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हवाई सर्वेक्षण कर सरकारी कोरम पूरा कर चुके हैं. यानी बाढ़ का सरकारी जलसा चल रहा है. जिसका सबकुछ डूब गया, बह गया, उसे न सीएम साहब लौटा पायेंगे और न डीएम साहब. पानी उतरने के साथ नेताजी अपनी राजनीति चमकाने में लग जायेंगे और प्रशासनिक अमला कागजी खेल में लग जायेगा. बाढ़ आती है, तो सर्वाधिक नुकसान सिर्फ गरीब-गुरबों व आमलोगों का होता है. नेताओं-अधिकारियों के लिए खजाने खुल जाते हैं. इसलिए बाढ़ आती रहनी चाहिए. तटबंध व बांध का खेल जारी रहना चाहिए.

हर साल माॅनसून आने के पहले सरकारी व प्रशासनिक अमला तटबंध की सुरक्षा का नाटक करता है, लेकिन जमीन पर होता क्या है, यह छुपा नहीं है. हर साल लाखों रुपये बांध की मरम्मत व इसकी सुरक्षा के नाम पर खर्च हो जाते हैं, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं होता है. इंजीनियर से लेकर होमगार्ड के जवान तक कागजों पर ही ड्यूटी निभाते रहते हैं. इस साल आयी प्रलयंकारी बाढ़ पर गौर करें, तो साफ हो जाता है कि यह सब नदियों को बांधने और फिर बांध की मरम्मत के नाम पर होनेवाली प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है. कई साल बाद जब माॅनसून कुछ ज्यादा ही मेहरबान हुई, तो नेपाल और उसके तराई क्षेत्रों में कई दिनों तक खूब बारिश हुई. नेपाल से निकलनेवाली नदियां उफना कर बिहार में प्रलय मचाने लगी, तो एक के बाद एक तटबंध टूटने लगे. आखिर तटबंध की जरूरत ही क्या है, जो ढाई दिन की बाढ़ को ढाई महीने की बाढ़ में तब्दील कर दें.

Flood in Gopalganj district

अभी की बाढ़ में सिर्फ मधुबनी में दो तटबंध टूटे और एक में रिसाव की खबर आयी. बेनीपट्टी में अधवारा समूह का महाराजी तटबंध और मधेपुर में कोसी-कमला का तटबंध टूटा। झंझारपुर में कमला नदी के तटबंध में रिसाव से कई गांव बाढ़ की चपेट में आ गये. मधुबनी जिले के बाढ़प्रभावित़ 13 प्रखंडों के करीब छह लाख लोग तबाह हो गये. स्थानीय लोग बताते हैं कि कोसी, कमला व भुतही बलान का तटबंध इसलिए कमजोर हो गया कि इन नदियों में वर्षों से बालू का अवैध खनन किया जा रहा है. हद तो यह है कि बालू का खनन तटबंध के किनारे तक कर लिया जाता है. इसमें बालू माफिया, स्थानीय प्रशासन व पुलिस की मिलीभगत नहीं होती, तो जब बालू खनन पर रोक लगायी गयी थी, तब भी यहां खनन का काम चलता रहा. एक स्थानीय पत्रकार ने बताया कि हर साल जुलाई से अक्टूबर महीने तक के लिए 254 होमगार्ड जवानों को तटबंधों की मरम्मत के लिए लगाया जाता है, लेकिन ने कभी कोई इंजीनियर जाता है और न कोई होमगार्ड. एक-आध बार तटबंध का जायजा लेकर कोरम पूरा कर दिया जाता है और अखबार में खबर प्रकाशित करवा ली जाती है, ताकि सरकार को बताया जा सके कि सभी संबंधित अलर्ट हैं. सही पूछिये तो सभी कागज पर ही ड्यूटी बजाते हैं, फिर भी बिल टनाटन रहता है. 17 साल पहले झंझारपुर-मधेपुर में तटबंध की मरम्मत का काम हुआ था, इसके बाद आज तक नहीं हुआ.

इसी तरह दरभंगा के घनश्यामपुर में पहले कमला बलान का तटबंध टूट कर कहर बरपाया. फिर केवटी के करजापट्टी गांव के पास बागमती नदी का तटबंध बेकाबू होकर शहर को भी बाढ़ का पानी अपनी चपेट में ले लिया, शहर के कई इलाके जलमग्न हो गये. जाले प्रखंड में भी तटबंध को तोड़कर बौरायी नदी का पानी दर्जनों गांवों में घुस गया. अधवारा समूह की खिरोई नदी का दो स्थानों पर तटबंध टूट गया. शहरवासियों ने बताया कि शहर की सुरक्षा बांध को बरसों से कोई देखने नहीं आया. एक करनी सीमेंट तक नहीं लगाया गया है. बाढ़ग्रस्त इलाकों का जायजा लेने पहुंचे प्रभारी मंत्री ने स्वीकार किया कि जिला प्रशासन ने सरकार को फेक रिपोर्ट सौंपी है. उन्होंने फाटक को भी निरर्थक बताया. दरभंगा बाढ़ प्रमंडल के एक अभियंता ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि हमको फांसी पर चढ़ा दीजिये, तब भी हम क्या कर सकते हैं. पैसा मिलेगा, तभी कुछ कर पायेंगे न.

Flood in Katihar district

सरकार की अदूरदर्शिता का शिकार दरभंगा जिला पहले भी हो चुका है. करीब 30 साल पहले हनुमाननगर में शांति नदी के मुहाने को ही तटबंध बनाकर बांध दिया गया था. इसका परिणाम यह हुआ कि 1987 की कहर बरपाती बाढ़ ने मजबूत बने तटबंध के ऊपर से क्राॅस कर बाढ़ का पानी जटमलपुर में रोड को तोड़ते हुए विशाल खाई बना दिया. बाढ़ ने तब आसपास के गांवों में भारी तबाही मचायी. इतनी बर्बादी पहले के किसी बाढ़ में यहां की आबादी ने नहीं झेली थी. यह शांति नदी के मुहाने को बांध देने का नतीजा था. इसके बाद स्थानीय लोगों ने शांति नदी का मुहाना खोलने के लिए करीब 15 किलोमीटर लंबी मानव श्रृंखला बनायी. सरकार ने लोगों को मुर्ख बनाते हुए निविदा निकाली और गेट बनाकर छोड़ दिया. हनुमाननगर के लोगों ने बताया कि नदी को बांधियेगा, तो प्रलय तो आना ही है.

2008 में कोसी में आयी भयंकर बाढ़ ने भी भारी तबाही मचायी थी. लगभग एक दशक बाद बाढ़ का इतना भयानक व रौद्र रूप इस साल देखने को मिल रहा है. इसके पहले 1987 में भी बाढ़ ने कहर ढाया था. बिहार आजादी के पहले से बाढ़ की बर्बादी झेलता आ रहा है. सवाल उठता है कि क्या यह बाढ़ प्राकृतिक विपदा है या मानवनिर्मित आपदा? क्यों एक अंतराल के बाद बाढ़ आती है, जीवनभर की कमाई बहाकर ले जाती है? आखिर कौन दोषी है इसके लिए? क्या नेपाल या फिर प्रकृति, आपदा प्रबंधन विभाग, इंजीनियर यो कोई और. पहले यह बात फैलायी जाती रही कि बिहार के बाढ़ के लिए नेपाल सरकार दोषी है. नेपाल के पानी छोड़ने से बिहार में जलप्रलय आता है. यह बात शिगुफा की तरह उड़ायी जाती रही है. हकीकत यह है कि यह सब सरकारी कुप्रबंधन का नतीजा है. विशेषज्ञ भी मानते हैं कि बांध बनाकर नदियों की धारा को रोकने का प्रयास तबाही को न्योता देता है. पर्यावरणविद व गंगा मुक्ति आंदोलन के प्रणेता अनिल प्रकाश मानते हैं कि बाढ़ नियंत्रण की जगह बाढ़ प्रबंधन पर सरकारी नीति बननी चाहिए.

– अप्पन समाचार न्यूज नेटवर्क

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Appan Samachar Desk

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