खेती के ढर्रे बदले, किसानों की तकदीर नहीं

मुशहरी से रिंकु कुमारी || वक्त के बदलते मिजाज के साथ खेती के तौर–तरीके भी बदल गये। सामा, कउनी, मडुआ, कोदो, जौ, जौ बुट्टा, जौ खेसरा, जौ केराई, जवार, बाजरा के पौधों से लहलहाने वाले खेतों में अब औषधिये पौधे, मेंथा, गेंदा, गुलाब की खेती हो रही है। परंपरागत फसलों को छोड़कर वैज्ञानिक व नकदी खेती का चलन बढ़ा है। महंगी होती खेती, सिकुड़ते खेत–खलिहान व शहरीकरण ने खेती–किसानी के ढर्रे को बदलकर कई समस्याएं पैदा की हैं। एक आम आदमी के स्वास्थ्य से लेकर खेतों की सेहत तक प्रभावित हो रही हैं। इन वजहों से गरमा व मोटा कहे जानेवाले धान के कई प्रभेद विलुप्त हो रहे हैं। बीजों के संरक्षण का चलन हाइब्रिड बीजों के कारण बीते दिनों की बात हो गयी। किसान की तकदीर कुख्यात बीज कंपनियों, दुकानदारों व कृषि विभाग के कारनामों पर टिकी है। नयी पीढ़ी के युवा किसान से सामा–कउनी का नाम पूछिये, तो शायद वे नहीं बता पायेंगे। किंतु मोनसेंटो का नाम जरूर बता देंगे। अधिक उपज के लालच में किसान ने परंपरागत खेती को छोड़कर वैज्ञानिक की राह पकड़ी। इनका अच्छा फलाफल मिला,लेकिन नुकसान भी कम नहीं उठाना पड़ रहा। फसलों की कई प्रजातियां बीजों के संरक्षण के अभाव में खत्म हो गयीं। किसानों की तमाम परेशानियों के बीच समय–समय पर खबरें आती हैं कि मक्के–गेहूं की बाली में दाना नहीं आया, तो कभी गेहूं के बीजों का अंकुरण नहीं होने की खबरें आती हैं। दिसंबर में मुजफ्फरपुर के कई प्रखंडों के किसान जिला कृषि कार्यालय में शिकायत लेकर पहुंचे कि उनलोगों ने टीडीसी (उत्तराखंड सीड्स एवं तराई डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) कंपनी के गेहूं बीज की बुआई किया था, जो खेतों में नमी रहने के बाद भी अंकुरित नहीं हुआ। गेहूं की तीन किस्मों एचडी 2967, बीड ब्लू 17 एवं पीबीडब्ल्यू 373 के फेल होने से सैकड़ों किसान हताश हैं। मुजफ्फरपुर जिला कृषि विभाग ने कार्रवाई करते हुए बीजों की लैब में जांच करायी। उपनिदेशक शस्य बीज विश्लेषण (बिहार) ने जांच में तीनों किस्मों के बीज को अमानक पाया। इसके बाद कृषि विभाग ने टीडीसी कंपनी के स्थानीय विपणन अधिकारी, वितरक व विक्रेताओं पर प्राथमिकी दर्ज करायी। पूर्व कृषि उपनिदेशक, तिरहुत ललन कुमार चौधरी कहते हैं कि किसान ठगे गये हैं। अमानक बीज की श्रेणी में और भी बीज हैं। यह राज्य सरकार के बीज विश्लेषण लैब की रिपोर्ट है। किसानों की बर्बादी की कथा–व्यथा देशभर में मौजूद हैं। इनमें सरकार से लेकर बीज कंपनियों व कृषि अधिकारियों तक की भूमिका खलनायकी वाली रही है। सरकारी पहल से भी किसानों का भला नहीं हो रहा। ‘बीज ग्राम योजना’ बिहार के किसानों के लिए उम्मीद बनकर आयी थी, लेकिन वह भी दगा दे गयी। यह योजना भी अन्य योजनाओं की तरह फेल हो गयी। बिहार राज्य बीज निगम सर्टिफाइड बीज का प्रमाणपत्र देने के अलावा कुछ नहीं कर सका। योजना के तहत किसानों ने बीज का उत्पादन किया, लेकिन चूहे का निवाला बन गया। किसानों को न मार्केट मिला और न ही अनुदान राशि मिली। चांदकेवारी बीज ग्राम के किसान भी भुक्तभोगी बने। सरैया प्रखंड के बल्ली सरैया के किसान महेश्वर यादव कहते हैं कि विभागीय अधिकारियों की लापरवाही के कारण योजना सफल नहीं हुई। वे कहते हैं कि हाइब्रिड बीज न हमारे पर्यावरण और न खेतों के लिए फायदेमंद है। इससे लाभ बस इतना हुआ है कि उपज थोड़ी बढ़ी है, पर नुकसान भी कम नहीं हुआ है। पहले चीना, कोदो, मडुआ आदि की खेती होती थी। इसकी खेती कम–से–कम पानी में होता था। फर्टिलाइजर की भी बहुत जरूरत नहीं होती थी। ये फसलें सूखा बर्दाश्त करती थीं। परंपरागत धान की खेती भी कम पानी में होती थी। महेश्वर जैसे अन्य किसानों का भी कहना है कि हाइब्रिड इसका विकल्प नहीं बन सकता। इसमें पानी अधिक व फर्टिलाइजर–पेस्टीसाइड्स का अंधाधुंध प्रयोग करना पड़ता है। महंगा बीज बेचकर कंपनियां किसानों का दोहन ही करती हैं। इसलिए आज बीज का संरक्षण जरूरी हो गया है। राज्य सरकार को बीज के संरक्षण व उसकी गुणवत्ता के लिए बीज निगम को सुदृद्ध बनाने की जरूरत है। मडुआ, सामा, कोदो समेत कई परंपरागत प्रभेद के बीज विलुप्त हो गये या होने के कगार पर है। किसानों का कहना है कि परंपरागत बीजों के संरक्षण व विपणन में किसी भी बीज कंपनियों को दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि इसमें कमाई कम नजर आती है। सीड्स जेनेरेशन व फ्रूटिंग के सवाल पर महकमे के अधिकारी का तर्क कुछ अलग है। किरण किशोर प्रसाद (उपनिदेशक सह बीज विश्लेषण, पटना) का कहना है कि पौधों में बाली नहीं आना या बीज अंकुरित न होना कई कारणों पर निर्भर करता है। सिर्फ बीज कंपनियों पर दोष मढ़ना ठीक नहीं है। किसानों में जागरुकता की कमी, बीज की ढुलाई व रखरखाव, आसपास का तापमान, फील्ड कंडीशन, मौसम, मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी आदि कई कारण हैं बीजों के अंकुरित नहीं होने के। बीज एक कारण हो सकता है। कई बार देखा गया है कि बीज दुकानदार एक ही गोदाम में बीज व खाद की बोरी एवं कीटनाशक रखे होते हैं। ऐसे में उस बीज की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। मौसम में बदलाव खेती पर व्यापक असर डाल रहा है। गांवों में यह कहा जाता रहा है कि जब मुंह से भाप निकलने लगे, तो गेहूं की बुआई शुरू कर देना चाहिए। लेकिन कई जगह दिसंबर बीतने पर भी मुंह से भाप नहीं निकला। विभाग के अधिकारी किसान को सलाह देते हैं कि बुआई से पहले सर्विस नमूना (सैंपल बीज) की जांच सरकारी लैब में एक रुपये टोकन मनी देकर प्रखंड कृषि अधिकारी, कृषि सलाहकार व समन्वयक के माध्यम से करा लें। बिहार के पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सहरसा, भागलपुर, कैमूर समेत सात जिलों में सात लैब हैं, जहां बीज के मानक की जांच कराने की सुविधा उपलब्ध है। अन्य जिलों में भी लैब हैं, लेकिन कर्मियों की कमी के कारण चालू नहीं हैं। किसान खुद भी बुआई से पहले बीज की डेमो जांच कर सकते हैं। थोड़े–से बालू व मिट्टी में बीज गिराकर देख लें कि कितना प्रतिशत अंकुरण हुआ। तभी बुआई करें, तो सही उपज होगी। बीज विश्लेषण श्री प्रसाद बताते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के साथ–साथ प्रोडक्शन को भी बढ़ाना जरूरी है। बदलते मौसम को देखते हुए अन्न संकट की आशंका बढ़ गयी है। अनावृष्टि की स्थिति में वैकल्पिक खेती ही सहारा बनेगी। सरकार अभी से सचेत है। राज्य सरकार मडुआ समेत अन्य वैकल्पिक खेती को प्रोत्साहन दे रही है, ताकि जल संकट की घड़ी में खेती संभव हो। पटना यूनिवर्सिटी के जंतुविज्ञान विभागाध्यक्ष व डॉल्फिन मैन के नाम से चर्चित डॉ आरके सिन्हा कहते हैं कि धरती से वनस्पति की 17 हजार प्रजातियां खत्म हो चुकी हैं। हम नहीं चेते, तो मनुष्य का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। वे बताते हैं कि साठी धान में ल्यूसियम नामक तत्व पाया जाता है, जो मनुष्य के रक्त में अॉक्सीजन घोलने की क्षमता बढ़ाता है। यह धान पानी में रहते 60 दिनों में तैयार हो जाता है, लेकिन इसकी उपज कम होती है। इस वजह से किसान शंकर प्रजाति के धान की खेती करते हैं। ऐसे में साठी धान का प्रभेद खत्म हो रहा है, जबकि शंकर धान में साठी का गुण नहीं होने के कारण मनुष्य के शरीर में अॉक्सीजन ढोने की क्षमता घटती जा रही है, जो बीमारियों को जन्म देते हैं.

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