रामलीला के लिए मशहूर है रामलीलागाछी

तुलसीदास, कबीरदास, विद्यापति, भिखारी ठाकुर सरीखे कवियों का दोहा–चौपाई व सवैया आज भी आमजन के दिलों–दिमाग में रचा–बसा है। तुलसीदास की रचना ‘रामचरितमानस’ के पदों को भजन–कीर्तन व अष्टयाम् में गाने की परंपरा गांवों में सालों से चलती आ रही है। सायंकाल में काम–धाम से फुर्सत पाते ही लोग मंदिर, यज्ञशाला, आश्रम व गांव के किसी एकांत व शांत जगह पर कभी गांव की मंडली जुटती थी और भजन–कीर्तन गाने में मग्न हो जाती थी। जिसमें सबसे अधिक राम की लीला पर आधारित दोहे–चौपाई व विद्यापति की पदावली केे पदों का गायन होता था। यह समृद्ध लोक परंपरा कुछ साल पहले तक मुजफ्फरपुर जिले के पश्चिम दियारा क्षे़त्र में अवस्थित रामलीलागाछी में जीवंत थी। स्थानीय लोग कहते हैं कि नारायणी नदी के किनारे स्थित इस इलाके में एक समय हथुआ महाराज का प्रभाव था। कुछ भाग दरंभगा नरेश के शासन के अधीन था। 100 साल पहले पारू प्रखंड का धरफरी, चांदकेवारी, मुहब्बतपुर आदि पंचायत सांस्कृतिक रूप से काफी समृद्ध था। रामलीलागाछी की लोकप्रियता व नामकरण में धरफरी गांव की अहम भूमिका थी। धरफरी में जानकीशरण सिंह, तत्कालीन सांसद नवलकिशोर सिंह, धर्मदत शर्मा जैसे जागरूक समाजकर्मियों की बड़ी भूमिका थी। कलाकार लखन तिवारी के प्रयास से ‘रामचरितमानस’ का नाट्य रूपांतरण करके एवं कलाकारों को अभिनय की कलाकारी सिखाकर धरफरी गर्ल्स स्कूल के समीप रामलीला करायी जाती थी। धरफरी नाट्यमंच पर रामचरितमानस के ‘बालकांड’ से लेकर ‘सीता स्वयंवर’ तक का मंचन बेहद उम्दा होता था। दो ध्वज गाड़े जाते थे। गांव को तीन हिस्सों में बांटकर अयोध्या, जनकरपुर और ठीक नदी किनारे रावण की लंकापुरी मानकर पताके गाड़े जाते थे। यह दृश्य काफी कौतूहलभरा व रोमांचकारी होता था। रामलीला देखनेवाले लोग हजारों की संख्या में उमड़ पड़ते थे। करीब 30 किमी के दायरे में आनेवाले दर्जनों गांवों के लोग रामलीला देखने पहुंचते थे, तो यह क्षेत्र रामनाम के उद्घोष से गुंजायमान हो जाता था। दूसरे पड़ाव में रामलीला मंडली वर्तमान रामलीलागाछी चौक पर वनवास गमन, लंकाकांड व रावणवध तक के दृश्य का मंचन करती थी। यहां वर्तमान में उतर दिशा में स्थित स्टेज के पास राम का पताका लहराता रहता था। दक्षिण दिशा में रावण का पताका गाड़ा जाता था। वनवास गमन व सीता हरण के दृश्य को देखकर लोगों की आंखें भर जाती थीं। दर्शकों में रावण वध के दृश्य को देखने की अजीब उत्कंठा रहती थी, तो दूसरी ओर रावण के अहंकार के प्रति काफी रोष दिखता था। रामलीला देखने के लिए यहां के अधिकतर घरों में रिश्तेदारों व अतिथियों का आगमन दशहरा से ही शुरू हो जाता था। 10 दिनों तक रामलीला का मंचन होता था. प्रतिदिन साहेबगंज, पारू, जाफरपुर, देवरिया, पूर्वी चंपारण के केसरिया आदि जगहों से लोगों का आना–जाना लगा रहता था। करीब एक किमी की परिधि में रामलीलागाछी का मैदान खचाखच भरा रहता था। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, नयीनवेली दुल्हन से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक में रामलीला देखने का भूत सवार रहता था। चांदकेवारी के वयोवृद्ध पूर्व सरपंच मथुरा प्रसाद कहते हैं कि धरफरी व चांदकेवारी के सजग युवकों की मंडली रामधुन, रामलीला में पारंगत थी। रामस्वरूप राय, धर्मदत शर्मा, धनु भगत (वैद्य), अगनू भगत, विश्वनाथ प्रसाद, स्वतंत्रता सेनानी भोली भगत (सुरेन बख्शी), जयनंदन भगत, डॉ मुखा साह, गोपाल भगत आदि लोग रामलीला के आयोजन में काफी दिलचस्पी रखते थे। मथुरा प्रसाद कहते हैं कि ब्रिटिश के शासनकाल में रामलीलागाछी निर्जन व सूनसान जगह थी। दशहरा के समय रामलीला देखने के लिए दूर–दूर से लोगों का आना शुरू हुआ, तो इस जगह को ‘रामलीलागाछी’ नाम से लोकप्रियता मिली। रामलीला का आयोजन सामाजिक परंपरा के रूप में प्रतिष्ठा कायम की। उसके बाद यहां दरभंगा, मधुबनी, वाराणसी, काशी से रामलीला की मंडली बुलायी जाने लगी और यह परंपरा समाज में कायम होती चली गयी। चांदकेवारी के धर्मनाथ प्रसाद कहते हैं कि लोगों में लोककला, लोकसंस्कृति के प्रति काफी लगाव था। मुझे याद है कि सन 1970 से रामलीलागाछी में नाटक का मंचन प्रारंभ हो गया था, जिसमें हरिश्चंद्र नाटक, बिहुला आदि का बेहतरीन मंचन होता था। धीरे–धीरे दशहरा में रामलीला के आयोजन के साथ–साथ नाटक का भी मंचन होने लगा। इसमें प्रमुख रूप से समाज के शिक्षित व जागरूक लोगों की भागीदारी होती थी। लोकगायन–वादन की एक अच्छी परंपरा शुरू हुई थी। मैं खुद हनीफ मियां से हारमोनियम पर सारेगामा के बारे में जाना। हनीफ मियां चार–पांच पंचायत में अकेले ऐसे व्यक्ति थे, जिसने हरेक प्रोग्राम की शुरुआत विद्यापति की पदावली से करते थे। चौक–चौराहे पर इनके पदों को गाते–गुनगुनाते मिल जाते थे। दूसरी ओर, नाटक की सफलता को देखते हुए अधिकांश सांस्कृतिक कार्यक्रम रामलीलागाछी में ही आयोजित होते थे। शिक्षक विश्वनाथ प्रसाद श्रीवास्तव, केदार प्रसाद, डॉ बलराम साहू, डॉ परमेश्वर प्रसाद आदि डायरेक्टर की भूमिका में होते थे। युवाओं को धार्मिक, सामाजिक व पारिवारिक नाटक में अभिनय करने की कला व कौशल से अवगत कराते थे। उम्रदराज होने के बाद भी इन लोगों में नाटक के मंचन के प्रति रूझान दिखता है। नयी पीढ़ी में नाटक व लोकसंस्कृति की ललक पैदा करने में अपनी सार्थकता समझते हैं। आज भी दुर्गा पूजा व दशहरा के अवसर पर यहां नाटक का मंचन पूरी जीवटता के साथ गांव के लोग करते हैं। सुखद अहसास होता है यह जानकर कि राम की लीला के लिए मशहूर रामलीलागाछी पश्चिमी दियारा इलाके में सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। जहां कई गांवों के सभी जाति–वर्ग, धर्म के युवाओं को एक मंच पर लाकर सामाजिक विषमताओं, विसंगतियों, ऊंच–नीच व धार्मिक भेदभाव को मिटाकर नाटक के जरिये एकता के सूत्र में बांधा जाता है। यह मंच वाकई हिंदू–मुस्लिम सभी को दशहरे के मौके पर एक होने का संदेश देता है। 10 दिन का यह समय पूरे साल आपसी सद्भाव व भाईचारे को कायम रखता है। नाटक कला से जुड़े मंजूर आलम, मुन्ना अंसारी, शहाबुद्दीन अंसारी, सौमुदीन मंसूरी, ओमप्रकाश भगत, शिव महतो, अकलू पंडित, जयलाल राम, मुन्ना सिंह, शशिभूषण सिंह, स्व. विजय कुमार आदि कलाकारों में नाटक खेलने का जुनून रहता था। वर्तमान में राम की लीला तो नहीं होती पर, सामाजिक नाटकों का मंचन आज भी होता है। कहने की गरज कि रामलीलागाछी कई गांवों के कलाप्रेमियों व दर्शकों को एक साथ जोड़ता है। मनोरंजन के साथ–साथ आपसी प्रेम व सौहार्द का वातावरण तैयार करता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दशहरा में लोग खरीफ फसल की दिनभर कटनी करने के बाद भी नाटक देखने के लिए रात की नींद खराब करते हैं।

इनपुट : अमृतांज इंदीवर

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