राम रहीम जैसे बाबाओं से अच्छे गांव के डिहवार बाबा

गांव में डिहवार बाबा होते थे. ग्राम देवता. देवी थान. महादेव थान. अलग—अलग इलाके में अलग—अलग तरीके के लोक देवता. लोकजीवन में सूर्य को, चंद्रमा को, नदी को, कुआं को, धरती को, कई पेड़ों को ईश्वर मानने की परंपरा पीढ़ियों से रही है. पिछले कुछ दशकों में इन लोकदेवताओं को तेजी से अप्रासंगिक बनाया गया. किसी एक ने नहीं बनाया. कइयों ने मिलजुलकर बनाया.70 के दशक में गांव में विराजमान ऐसी पींडी मूर्तियों पर मूतना नये रंगरूट क्रांतिकारियों के बीच पॉपुलर फैशन बना. किसी भी किस्म के शास्त्र से और वैदिक—ब्राह्मणवादी परंपरा से मुक्त इन लोकदेवी—देवताओं को कइयों ने मिलकर लगातार महत्वहीन, पिछड़ेपन का पयाय बताते हुए विस्थापित किया. डिहवार बाबाओं की स्थिति क्या है गांव में देखिए. माटी के पिंडा को अब कोई नहीं पूछता. गोवर्धन, गायडाढ़, भतुआदान जैसे पर्व त्योहार सिमट रहे हैं. यह सब सिमटाया गया. कुछ ने यह कहते हुए इसे सिमटवाया कि यह सब हिंदूधर्म के पाखंड हैं तो कुछ ने यह कहते हुए सिमटवाया कि दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी और हमलोग अब भी इन लोकदेवी देवताओं में ही फंसे हुए हैं.धर्म और आस्था को लेकर वैक्युम रह नहीं सकता. आस्तिकता को आप खतम कर नहीं सकते और अभी खतम करने की स्थिति भी नहीं है देश में. जिस तरह से रोजाना तनाव बढ़ रहा है. निजी जिंदगी से लेकर सार्वजनिक जिंदगी में. पूंजीवाद के गर्भ से उभरे व्यक्तिवाद ने जिस तरह से इच्छाओं और आकांक्षाओं को परवान चढ़ाकर असंयमी बनाया है और व्यवस्था लगातार ध्वस्त होते जा रही है, उसमें अगर आस्तिकता न हो तो रोजाना न जाने कितने लोग आत्महत्या करें. यह स्थिति न भी हो तो सोचकर देखिए कि एक दिन पूरा देश नास्तिक हो गया. अब कल्पना कीजिए कि कितनी घटनाएं घटती हैं देश में. किसी का पूरा परिवार खत्म हो जाता है किसी हादसे में, किसी का पूरा धंधा चौपट हो जाता है, कोई बड़ी मुसीबत में फंस जाता है. और ऐसे समय में कौन सहारा बनता है. यही एक वाक्य कि ईश्वर को यही मंजूर था और यही वाक्य दुहराते—दुहराते बड़ी से बड़ी विपदा में संभल जाता है इंसान. धर्म का अविष्कार इंसानी समुदाय ने ऐसे ही नहीं किया था. और उस धर्म के लिए माटी—गोबर से बने पिंडी, पेंड़, नदी, सूरज, चंद्रमा को देवता मान पूजा करता रहा. ईश्वर को कभी चमत्कारी नहीं माना. कभी इ्रश्वर से लेनदेन का रिश्ता नहीं रहा समाज का, जब तक कि लोक परंपरा चलती रही. लेकिन हमने कायदे से लोकपरंपराओं को खत्म किया, लोकदेवताओं को मिटाया तो उनकी जगह शास्त्रीय देवताओं ने लिया, शास्त्रीय परंपराओं का बोलबाला बढ़ा और शास्त्रीय परंपराओं के गर्भ से ही बाजारू देवी—देवताओं और धार्मिक परंपराओं का उदय हुआ. गांव में हमने आस्था के प्राचीन केंद्र मिटा दिये कि ये पिछड़ेपन अथवा ढोंग के प्रतिक हैं. प्रगतिशिलों ने गांव के इन केंद्रों को मिटाये तो बड़े लोगों ने नये मानक स्थापित किये कि देवी देवता तो वैष्णवदेवी, तिरूपति बालाजी, रामेश्वरम आदि में ही रहते हैं. जिसका सामर्थय था वे उन जगहों पर जाने लगे ईश्वर से रिश्ता बनाने और जो असमर्थ थे, वे भटकने लगे. जाहिर सी बात है कि इस वैक्युम को भरने के लिए बाबाओं का उदय होना, उनका सिक्का जमना तय था. इसलिए जो बाबा दिखते हैं, उनके भक्तों को देखिएगा कि कौन हैं? अभी तो एक रामरहीम की चर्चा चल रही है. वे तो बस सामने आ जानेवाले उदाहरण भर हैं. आप अपने आसपास नजर दौड़ाइये, हर शहर में ऐसे बाबा मिलेंगे. दूसरे धर्मों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं इसलिए अपने ही धर्म हिंदू धर्म के बारे में बात कर सकता हूं.इस देश में हजार के करीब तो अब महामंडलेश्वर हैं. महामंडलेश्वर बनने का आॅफर इस बार के बनारस ट्रिप में फिर मिला. 30 से 40 लाख खर्च कर के. पत्रकार हैं तो डिस्काउंट रेट में 20 तक भी मामला सलटने की बात हुई. देश में करीब 150 शंकराचार्य हैं. जगतगुरुओं की तो भीड़ है. इतनी भारी संख्या में हालिया दिनों में यह तरह—तरह के नामधारी बाबाओं का उदय कैसे हुआ और क्योंकर हुआ? इसके लिए अपने आसपास के बाबाओं को देखना होगा. बाबाओं पर पूंजी लगायी जाती है. उन्हें खड़ा किया जाता है. जैसे इन दिनों शनी और साईं मंदिरों को खड़ा करने में पूंजी लगायी जा रही है और वह फुल्लाफुल्ली ठेकेदारी वाला काम हो गया है.

– निराला बिदेसिया के फेसबुक वॉल से

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