फसल बीमा योजना का किसानों को कम, कंपनियों को अधिक लाभ

मुजफ्फरपुर. धरती के बढ़ते तापमान के कारण अनेक प्राकृतिक आपदाएं हर साल हम झेल रहे हैं. पिछले सौ साल में धरती का तापमान करीब तीन डिग्री बढ़ा है. जलवायु परिवर्तन ने हमारे सामने कई संकट पैदा किए हैं. इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य के साथ फसलों की पैदावार पर पड़ रहा है. भारत का अधिकतर हिस्सा कभी सुखाड़, तो कभी भारी बारिश के कारण तबाह रहता है. इसी साल असम से लेकर उत्तर भारत के कई राज्य अधिक बारिश के कारण बाढ़ का प्रकोप झेल रहा है. लाखों हेक्टेयर में लगी खरीफ फसल बर्बाद हो गयी. प्रकृति का प्रकोप झेलते किसानों को सहारा देने के लिए ही दुनियाभर के कई देशों में फसल बीमा का प्रावधान किया गया है. पहले नेशनल एग्री इंश्योरेंस स्कीम (एनएआइएस) व मोडिफाइड एग्री नेशनल इंश्योरेंस स्कीम (एमएनएआइएस) योजनाएं संचालित की गयीं. पिछले साल खरीफ मौसम में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की शुरुआत की गयी, ताकि मौसम की मार झेलते किसानों को फसल के नुकसान होने की स्थिति में थोड़ी आर्थिक सहायता मिल सके. इस योजना के दायरे में पंजाब राज्य को नहीं लाया गया है. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना एक परिवर्तनकारी योजना है, जो एक सार्वभौमिक सब्सिडी कृषि बीमा योजना की परिकल्पना करती है, जो किसानों के अनुकूल और निष्पक्ष है. लेकिन किसानों में जागरूकता की कमी, बैंकों की असहयोगातमक रवैये, राज्यों की उदासीनता, एवं क्रियान्वयन में त्रुटियों की वजह से इस बीमा योजना का लाभ पीड़ित व असली किसानों तक नहीं पहुंच रहा है. आश्चर्य कि बात यह है कि किसानों से अधिक फायदा तो बीमा कंपनियां उठा रही हैं. सीएसई का आकलन है कि खरीफ 2016 के दौरान बीमा कंपनियों ने करीब 10,000 करोड़ का सकल मुनाफा कमाया.

बिहार के साथ सौतेला व्यवहार
सीएसई के अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि बीमा कंपनियों ने अन्य राज्यों के मुकाबले बिहार में ज्यादा प्रीमियम दर वसूला गया, जबकि क्लेम काफी कम रहा है. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत खरीफ 2016 में कंपनियों की ओर से बिहार में 17 फीसदी प्रीमियम दरें वसूली गयी है, जबिक पूरे देश में औसतन 12.6 प्रतिशत प्रीमियम दर ही वूसली गयी है. एनएनएआइएस योजना में भी देशस्तर पर औसतन प्रीमियम दरें 9 से 11.5 फीसदी के बीच में थी. जबकि बिहार में इस योजना में खरीफ 2011 से खरीफ 2013 के बीच में 18.5 से 23.1 फीसदी प्रीमियम वसूला गया. क्या यह बिहार के साथ सौतेला व्यवहार नहीं है?

Dy. DG, CSE, Chandra Bhushan releasing a review report on PMFBY

छोटे किसानों का समावेश
असम, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल को छोड़कर प्रत्येक राज्य में प्रति किसान बीमाकृत औसत क्षेत्र घट गया है. असम और तमिलनाडु में बीमा वाले किसानों की संख्या अपेक्षाकृत कम है और इसलिए छोटे किसानों को शामिल करने के बारे में कोई निर्णय करना मुश्किल है. पश्चिम बंगाल में हर किसान का बीमाकृत औसत क्षेत्र 0.4 हेक्टेयर से बढ़कर 0.5 हेक्टेयर हाे गया है. इसका एक कारण यह भी है कि पश्चिम बंगाल में गैर-ऋणी को राज्य सरकार ने किसानों के प्रीमियम योगदान को पूरी तरह से माफ कर दिया है. किसानों ने स्वेच्छा से बीमा नहीं खरीदा है. इस प्रकार, भले ही प्रति किसान बीमाकृत क्षेत्र में बढ़ोतरी हुई है, औसत बीमाकृत क्षेत्र 1.1 हेक्टेयर ही है. इससे पता चलता है कि बड़े पैमाने पर छोटे किसान कृषि बीमा का लाभ उठा रहे हैं. इससे निष्कर्ष निकलता है कि बड़ी संख्या में छोटे किसानों ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा लिया है. इसका कारण यह भी प्रतीत होता है कि छोटे किसान कर्ज ले रहे हैं और इसलिए उन्हें अनिवार्य रूप से बीमा लेने को कहा जा रहा है.

किसानों की पीड़ा
बिहार में मुजफ्फरपुर जिले के बंदरा प्रखंड के प्रगतिशील किसान व किसान भूषण से सम्मानित सतीश कुमार द्विवेदी बताते हैं कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना अभी धरातल पर सही ढंग से नहीं उतरी है. क्रॉप कटिंग के पेचीदे प्रावधान में बदलाव लाना होगा, तभी फायदा हो सकता है.हमलोगों को सबसे अधिक नुकसान नीलगाय और जंगली सूअर से होता है, लेकिन इस बीमा योजना में इसके लिए कोई प्रावधान नहीं है. एक एकड़ में मक्के की खेती किए थे. आधा एकड़ की फसल को जंगली जानवरों ने बर्बाद कर दिया. अब बताइये हम किसान क्या करें. उधर, बंदरा प्रखंड के हत्था पंचायत के पैक्स अध्यक्ष नंदकिशोर द्विवेदी ने कहा कि बंदरा, सकरा और मुरौल प्रखंड में एक भी गैर-ऋणी किसान की फसल का बीमा नहीं हुआ है जो ऋणी किसान हैं और जिनका लेनदेन ठीक नहीं है उनकी फसल का बीमा करने में बैंक रुचि नहीं लेता है. किसान कैसे जियेगा, पता नहीं. 2012 से अबतक केसीसी लोन का प्रीमियम किसान जमा करता रहा, लेकिन एक रुपया भी अब तक नहीं आया है.

विशेषज्ञ बोले
मध्यप्रदेश के किसान नेता केदार सिरोही सवाल करते हैं कि क्या सिर्फ नोटिफाइड फसल का ही बीमा होना चाहिए? पीएमएफबीवाइ खरीफ फसल के लिए तो ठीक है, लेकिन रबी फसल के लिए ठीक नहीं है. सरकार जबरदस्ती किसानों को रबी फसल का बीमा कराने को कहती है. डराती है, क्योंकि किसान लोनी हैं. जो किसान फांसी लगा रहे हैं, सरकार उनके लिए क्या करती है? वे कहते हैं कि सिर्फ 4-5 फीसदी फसलों का ही बीमा किया जा रहा है. हम मांग करते हैं कि केवल प्रीमियम का ही नहीं, प्रोडक्शन व प्राइस का भी इंश्योरेंस होना चाहिए, तभी किसानों को लाभ मिल सकेगा.
एआइसीएल के डिप्टी जेनरल मैनेजर अजय सिंघल कहते हैं कि कृषि जोखिमभरा पेशा है. 1985 से फसल के बीमा के नाम पर योजना चल रही है, लेकिन अधिकतर किसान इसका लाभ नहीं उठा पाए हैं. इसका एक प्रमुख कारण है बैंकों का डिले प्रोसेस यानी धीमी प्रक्रिया. स्थानीय नेताओं के दबाव के कारण भी असली किसानों को फसल बीमा का लाभ नहीं मिल पाता है.
पीएमएफबीवाई पर पहली व्यापक मूल्यांकन व विश्लेषण रिपोर्ट जारी करते हुए सीएसइ के डिप्टी डायरेक्टर जेनरल चंद्रभूषण ने कहा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पिछले दो फसल बीमा योजनाओं से नि:संदेह बेहतर है, लेकिन खराब क्रियान्वयन के कारण और बिना तैयारी के और जल्दबाजी में लायी गयी इस योजना में इतने पेंच हैं कि किसानों को भरपूर फायदा नहीं हो पा रहा है. आज भी राज्य तैयार नहीं हैं. इतने प्रावधान हैं कि इसे शत-प्रतिशत लागू करना मुश्किल है.

कैग की रिपोर्ट में मिलीं त्रुटियां
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने 21 जुलाई को संसद में एक रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें इस बात का जिक्र है कि 2011 से 2016 के बीच बीमा कंपनियों को 3,622.79 करोड़ रुपये की प्रीमियम राशि बिना किसी गाइडलाइन पूरा किए ही दे दी गयी, जबकि प्रावधान है कि प्रीमियम राशि का कुछ हिस्सा किसान को देना हैं और शेष हिस्सा सरकार देती है. कैग ने यह भी कहा है कि निजी बीमा कंपनियों को भारी भरकम फंड देने के बाद भी उनके खातों की ऑडिट जांच के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है. आडिट के दौरान कुछ किसानों के सर्वे भी किया गया है, जिसमें पाया गया कि 67 प्रतिशत किसानों को फसल बीमा योजना के बारे में तो पता ही नहीं है. किसानों को समय पर राशि मिले और उनकी शिकायत शीघ्र दूर हो, इसकी कोई व्यवस्था नहीं की गयी है.

सुधार की जरूरत
जब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को लागू किया गया था, तो वह खरीफ 2016 का पहला सत्र था. इस अवधि के दौरान योजना के क्रियान्वयन में जो चुनौतियां व त्रुटियां सामने आयीं, उसके आधार पर कृषि विशेषज्ञों व किसानों ने सुधार के लिए कई सुझाव दिए हैं-
1. सभी फसलों को फसल बीमा के तहत कवर किया जाना चािहए.
2. जंगली जानवरों, आग, पाला आदि के कारण फसलों को हुई क्षति पर भी व्यक्तिगत स्तर पर विचार किया जाना चािहए. ओला आदि के कारण हुए नुकसान को भी फसल की बुआई के बाद नुकसान की श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए.
3. आदर्श रूप में किसानों से सहमति उनके फसल बीमा प्रीमियम काटने से पहले ली जानी चाहिए. उन्हें उचित बीमा पॉलिसी दस्तावेज दिया जाना चािहए, जैसे कि बीमा कंपनी का नाम, बीमा राशि, भुगतान किया गया प्रीमियम, बीमे का निबंधन व शर्तें, बीमाकृत फसल का विवरण, अधिसूचित बीमा क्षेत्र, विभिन्न प्रकार की फसलों के नुकसान के बारे में जानकारी कैसे दी जाये, फसल की बुआई के बाद हुए नुकसान के नियम व शर्तों का विवरण, स्थानीय आपदा, बुवाई व दावा निपटान प्रक्रियाओं को रोकना.
4. पीएमएफबीवाई के क्रियान्वयन के में पंचायत प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चािहए तथा सभी डाटा व दस्तावेज को सार्वजनिक किया जाना चाहिए.
5. बीमा दावा राशि पर पहला अधिकार किसानों का होना चाहिए, न कि बैंकों का.
6. बैंकों और बीमा कंपनियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि खरीफ और रबी मौसम के लिए बीमित किसानों को उचित प्रतिनिधित्व मिले. अन्यथा, आमतौर पर किसान वर्ष की शुरुआत में ऋण की अपनी पूर्ण वार्षिक संयुक्त सीमा को विड्रॉ कर लेते हैं और केवल खरीफ मौसम के लिए ही बीमा कवर मिलता है. परिणामस्वरूप, रबी फसलों के लिए बीमा कराए गये किसानों की संख्या खरीफ से कम हो जाती है. ऋण राशि को दर्शाते हुए यह दिखाया जा सकता है कि दोनों मौसम के लिए फसल का बीमा होता है. इसके अलावा और सुधार की गुंजाइश है, तभी इस योजना का लाभ किसानों तक पहुंचाया जा सकता है.

फसल बीमा पोर्टल
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत बेहतर प्रशासन, हितधारकों के बीच समन्वय, किसानों, राज्यों, बीमाकर्ताओं एवं बैंकों की सहूलियत के लिए, जानकारियों-सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए व पादर्शिता के लिए एक फसल बीमा पोर्टल बनाया गया है.
www.agri-insurance.gov.in

-अप्पन समाचार न्यूज नेटवर्क

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Appan Samachar Desk

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