बच्चा बैंक नहीं, ये गरीब बच्चों का खजाना है

 रिंकू कुमारी II मुजफ्फरपुर. बच्चे सिर्फ खर्चीले नहीं होते हैं. उन्हें बचत भी करने आता है. स्कूली बच्चे पॉकेट मनी में से कुछ पैसे बचाते हैं, तो मेहनतकश गरीबों के बच्चे गैराज में पसीने बहा कर चंद सिक्के जुटाते हैं. गुल्लक बैंक इनका घरेलू बैंक तो हैं ही. लेकिन इन दोनों तरह के बच्चों के लिए एक ऐसा बैंक तो चाहिए न जो इनके पैसे को सुरक्षित रख सके.

बिहार के मुजफ्फरपुर में एक ऐसा ही बच्चा बैंक है, जिसका नाम है ”बाल विकास खजाना”. महिला डेवलपमेंट सेंटर ने इस बच्चा बैंक की शुरुआत 2004 में की थी. इन 13 सालों में इस बैंक के 11 ब्रांच खुल चुके हैं. तीनकोठिया, इमामगंज, चकबासू, पुरानी गुदरी, मालीघाट आदि जगहों के करीब 1000 बच्चे इस बैंक के ग्राहक बन चुके हैं. ग्रामीण इलाके में भी बैंक की दो शाखाएं मुरौल प्रखड में चल रही हैं. बच्चा ग्राहक कम से कम एक रुपये अपने खाते में डाल सकते हैं. नयी दिल्ली की संस्था ‘बटरफ्लाई’ इस प्रोजेक्ट को सपोर्ट करती है. मुजफ्फरपुर में मिली अपेक्षित सफलता को देखते हुए पूर्णिया में भी विशेष समुदाय (रेडलाइट एरिया) के बच्चों के लिए दो ब्रांच खोले गए हैं.

परमहंस, संस्थापक

तीसरे क्लास में पढ़ने वाले अर्जुन का पिता फल बेचते हैं. वह 20 रुपये जमा करने बच्चा बैंक पहुंचता है. बचत करते-करते उसके खाते में अब 195 रुपये बैलेंस हो चुका है. इस पैसे का क्या करोगे, पूछने पर वह मुस्कुराता हुआ बताता है, किताब-कॉपी खरीदूंगा. इसी कक्षा का पृथ्वी कपड़ों पर इस्त्री करने वाले गरीब बाप का बेटा है. वह चॉकलेट-बिस्कुट खाने के लिए मिले एक-एक पैसे को जमा करने में लगा है, ताकि वह पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बन सके. स्कूल की छुट्टी होने के बाद छठी कक्षा में पढ़ने वाली कोमल भी बैंक में पैसे जमा करने पहुंचती है. उसके पिता ट्रांस्पोर्ट में काम करते हैं. वह बचत इसलिए करती है कि यह पैसा पढ़ाई-लिखाई, पर्व-त्योहार, बीमारी के अलावा संकट की घड़ी में काम आ सके. नेहा, ज्योति, शाहनवाज जैसे गली-मोहल्ले के ये बच्चे अपने भविष्य को आर्थिक आधार देने में जुटे हैं.

संस्था के संस्थापक परमहंस बताते हैं कि बिहार में इस तरह का पहला प्रयोग हमलोगों ने ही शुरू किया था. पहले हमने स्ट्रीट चिल्ड्रेन व कामकाजी बच्चों के लिए इसे खोला था, लेकिन बाद में स्कूली बच्चों को भी इससे जोड़ा. हर महीने इन बच्चों को मोटिवेशनल ट्रेनिंग देते हैं, ताकि वे शिक्षा का महत्व समझ सकें, स्वस्थ रहना और नशे से दूर रहना सीख जाये. बचत की इस प्रवृति और ट्रेनिंग के असर के कारण सिगरेट-गुटखा खाने की आदत में भी सुधार हुआ है. हेल्थ को-ऑपरेटिव बनाकर इन्हें फर्स्ट एड व स्वास्थ्य संबंधी जानकारी भी देते हैं. बैंक के काउंटर पर बैठे सरोज कुमार कहते हैं कि कैश जमा करने जब ये बच्चे आते हैं तो इनका चेहरा देख कर मुझे एक अजीब-सी ख़ुशी का अनुभव होता है.