बकोये, लालदेइया की जगह हाइब्रिड का कब्जा

पहले किसान खेतों में ज्वार, बाजरा, मक्का, कोदो, मड़ुआ आदि उपजाते थे। इनकी थाली पौष्टिकता के साथ स्वाद से भरी रहती थी। कोदो का चावल लोग चाव से खाते थे। एक दशक पहले तक किसान अपने खेतों में परंपरागत बीज से खेती करते थे। बकोये, अगहनी, लालदेइया, सुनरदेव, चौतीस, रागो, पाखर, जागर आदि धान खेतों में बोये जाते थे। अनाज तैयार होने के बाद किसान पुआल से मोजर तैयार कर लेते थे और प्रथम वर्षा के साथ ही धान की नर्सरी तैयार हो जाती थी। लेकिन देश में अनाज का संकट गहराया तो संकर प्रभेद के बीजों से खेती होने लगी। सरकार की कृषि नीति की वजह से धीरे-धीरे परंपरागत बीज की प्रजातियां खत्म हो गई है और उसकी जगह हाईब्रिड बीजों ने ले लिया। लेकिन आज भी बहुत ऐसे किसान हैं जो अपने खेतों में परंपरागत बीज को ही प्राथमिकता देते हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिला स्थित सरैंया ब्लॉक के बिसरपट्टी, हरिहरपुर और रूपौली आदि गांवों के दर्जनों किसान अभी भी परंपरागत बीज पर ही विश्वास करते हैं। हरिहरपुर के कई किसानों का कहना है कि लालदेइया, बकोये व बासमती धान का भात बहुत मीठा और सुपाच्य होता है। खाने से पेट में गैस, कब्ज एवं अपच की शिकायत नहीं होती। कृषि विज्ञान केंद्र ने परंपरागत बीज राजेन्द्र मंसूरी, राजेन्द्र कस्तूरी, राजेन्द्र भगवती आदि किस्मों की खोजकर अन्न संकट को बहुत हद तक मिटाया है। 2009 में मुजफ्फरपुर के पारू ब्लाक स्थित चांदकेवारी पंचायत के 100 किसानों ने 50 एकड़ में राजेन्द्र 359 आधार बीज लगाकर कीर्तिमान स्थापित किया था। जिसके बाद इसे बीजग्राम का दर्जा दिया गया। कीर्तिमान को जारी रखने के लिए किसान साथी क्लब की स्थापना की गई। बीजग्राम के तहत सभी कृषकों को राज्यस्तर पर विषेश प्रशिक्षण दिया गया। जिसमें महिला किसानों ने भी बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। बीज की नर्सरी व उत्पादन की ट्रेनिंग दी गई और 4 क्विंटल बीज उपलबध कराया गया। धान की फसल जबरदस्त हुई। गांव के जगत कुमार कौशिक, धर्मनाथ भगत, विजय भगत, शंभू मिश्र, नौदागर सहनी, कैलाश तिवारी, विकास ओझा, विश्वनाथ प्रसाद आदि सौ किसानों ने करीब 1000 क्विंटल प्रमाणित बीज का उत्पादन किया। बीजों का प्रमाणीकरण बिहार बीज निगम लिमिटेड से कराया गया। खेतीहरों के चेहरे पर बांछे खिल गई लेकिन अफसोस की बात यह है कि सरकारी विभाग ने इसके प्रोत्साहन के लिए कुछ भी नहीं किया। किसान प्रोत्साहन राशि के लिए विभाग का चक्कर काटते रहे, लेकिन सरकारी सहयोग कुछ भी नहीं मिला। किसान साथी क्लब के अध्यक्ष फूलदेव पटेल के अनुसार बीजग्राम योजना के तहत प्रति क्विंटल बीज पर एक हजार रुपए सब्सिडी की राशि मिलनी थी। प्रमाणन से संबंधित सभी कागजात सौंपने के बावजूद कोई लाभ नहीं हुआ और लगभग 1000 क्विंटल बीज चूहे खा गए। लाखों रुपए की आर्थिक क्षति हुई और पूरा का पूरा बीज खराब हो गया। आज भी किसान प्रोत्साहन राशि की आस लगाए बैठे हैं। जिले के सरैया ब्लाक स्थित बीजग्राम अंबारा तेज के किसान महेश्वर प्रसाद यादव ने बीजग्राम के तहत 5 हेक्टयर में नारेन्द्र मंसूरी का फाउंडेशन सीड लगाया। केवीके के वैज्ञानिक से सलाह मशविरा लेकर खेती कर करीब 208 क्विंटल प्रमाणित बीज का उत्पादन किया। लेकिन विभागीय उदासीनता के कारण बीज की मार्केटिंग नहीं हो सकी। जिसके बाद देवकीनंदन भगत, सत्येन्द्र भगत, रमेश कुमार जैसे दर्जनों किसानों ने बीज उत्पादन का काम बंद कर दिया। लेकिन महेश्वर ने हिम्मत नहीं हारी और अपने गांव में बीज उत्पादन केंद्र बनाकर परंपरागत धान के अलावा भिंडी, लौकी, नेनुआ, टमाटर आदि सब्जियों के बीज का उत्पादन किया और आज उन्हें लाभ मिल रहा है। इनका बीज दूर-दराज के किसान खरीदने लगे हैं। महेश्वर यादव कहते हैं कि परंपरागत बीज 20-30 रुपए प्रति किलो मिलता है और प्रति कट्ठा 70-80 किलो मनी (इल्ड) देता है, जबकि हाइब्रिड जेके, धन्या, पायनियर आदि 200-300 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है और उत्पादन में मात्र 10-20 किलो का अंतर होता है। परंपरागत बीजों की अनदेखी वैशाली गढ़ स्थित वास्फा संस्था के महामंत्री व कृषि विशेषज्ञ उपेन्द्र प्रसाद सिंह कहते हैं कि एक तरफ केंद्र सरकार परंपरागत बीज के संरक्षण के लिए चिंतित है तो दूसरी ओर प्रखंड स्तर पर हाइब्रिड बीज किसानों को दिया जा रहा है। इसके पीछे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गहरी साजिश है। जिसे सरकार को समझना होगा। सालाना बीज के नाम पर सौ डॉलर से अधिक पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। जबकि सीड्स प्रोडक्शन एक्ट्स में स्पष्ट कहा गया है कि परंपरागत बीज का संरक्षण करने की मजबूत मुहिम चलाई जाए। इसके लिए आसीएआर संस्था की स्थापना भी की गई है। इस पर फिलहाल काम चल रहा है। हमने वैशाली जिले से लेकर बेतिया के तकरीबन 874 किसानों को जोड़कर परंपरागत बीज से उत्पादन करा रहे हैं। ‘वास्पा’ किसानों का मंच है यहां सैकड़ों किसान राजेन्द्र भगवती धान की खेती कर रहे हैं। स्पेशल गेहूं व आलू का आधार बीज तैयार किया जा रहा है। परंपरागत बीज को बचाना सबसे बड़ी चुनौती है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर ही किसान और स्वयंसेवी संस्था को पहल करनी होगी अन्यथा हाइब्रिड धान की खेती से पानी की खपत बढ़ेगी और मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ेगा और हमारी खेती कंपनियों का गुलाम हो जाएगी। दूसरी ओर सरकार किसानों को बीज उत्पादन की प्रणाली से ज्यादा हाइब्रिड (बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीज) धान की बिक्री कराने में ज्यादा ही दिलचस्पी दिखा रही है। पारू ब्लाक स्थित सोहांसा गांव के किसान राकेश चौधरी और शरीफ मंसूरी के अनुसार अब इस योजना में भ्रष्टाचार के घुन लग चुके हैं। बीज दुकानदार से मिलीभगत कर बिचौलियो की मोटी कमाई हो रही है। एक-एक परिवार में दो-दो परमिट काटे जा रहे हैं। 6 किलो की परमिट बन रही है और बीज मिल रहा है तीन किलो। जिनके पास जमीन नहीं है उनके नाम से भी बीज उठाव का खेल जारी है। जिस पर जल्द काबू पाना जरूरी है। बीजग्राम के तहत परंपरागत बीज का उत्पादन किया जाता है ताकि कंपनियों के हाइब्रिड बीज पर से निर्भरता खत्म की जा सके। हाइब्रिड बीज की तुलना में परंपरागत बीज से यह लाभ है कि लगातार तीन साल तक इससे धान की खेती की जा सकती है। बीज बिल्कुल देशी तकनीक पर आधारित होता है। बीजग्राम योजना से किसानों को भारी-भरकम खर्चों से बचाया जा सकता है। एक गांव में बीज का उत्पादन हो जाए तो आसपास के दर्जनों गांव को बाजार से बीज नहीं खरीदना होगा। ऐसे में अब जरूरत है इस योजना को अधिक से अधिक प्रचारित करने की। लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा हाईब्रिड बीज का व्यापार करने वाली कंपनियां होंगी। जिनके पास मीडिया को खरीदने की ताक़त होती है। 

इनपुट : अमृतांज इंदीवर

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