अमेरिका से चलाते हैं गांव का पुस्तकालय

अक्षरों की चमक, शब्दों की दुनिया, पुस्तकों का संसार और ज्ञान का भंडार देखना-खोजना हो, तो आप बिना सोचे-समझे पुस्तकालय की आेर रूख कर लीजिए. आप संतुष्ट होकर लौटेंगे, कुछ लेकर वापस होंगे. एक समय था, जब सफर करते लोगों के हाथों में किताबें दिख जाती थीं. उपन्यास, साहित्यिक पत्रिकाएं, प्रतियोगी पुस्तकें लंबी दूरी के सफर को भी कम कर देता था. यात्रियों को पता ही नहीं चलता था, कब हम अपने गंतव्य तक पहुंच गये.  लेकिन अब समय बदल गया है. हाथों में किताबों की जगह स्मार्ट फोन ने ले लिया है. किताब पढ़ने की आदत को फेसबुक-ट्विटर ने बिगाड़ कर रख दिया है. इसके बावजूद पुस्तकों की अहमियत को हम नकार नहीं सकतेे हैं. छपे शब्दों की ताक के सामने आभासी दुनिया की क्या औकात? 

माना कि 4जी के इस जमाने में पुस्तकालय को जिंदा रखना एक चुनौती है. लेकिन ग्रामीण इलाके में चल रहे पुस्तकालय एक उम्मीद जगाता है. जी हां, हम बात कर रहे मुशहरी प्रखंड में स्थापित उस ग्रामीण पुस्तकालय की, जिसे अमेरिका में रहनेवाले गांव के ही एक एनआरआई यज्ञानंद प्रसाद सिन्हा ने 2003 में अपने पिता की याद में स्थापित किया था. ‘वैद्यनाथ प्रसाद सिंह पुस्तकालय’ मुजफ्फरपुर शहर से करीब छह किलाेमीटर पूरब रोहुआ गांव में मनोरम वातावरण के बीच ज्ञान की रोशनी फैला रहा है. इस लाइब्रेरी में छात्र अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाने आते हैं, तो बुजुर्ग अपनी रुचि की धार्मिक पुस्तकें बढ़े चाव से पढ़कर अपनी ज्ञान पिपासा बुझाते हैं. महान व्यक्तित्व की जीवनी यहां आनेवालों को प्रेरित करती है एक जिम्मेदार नागरिक बनने की. प्रेमचंद के गोदान में रोहुआ पंचायत के किसान-मजदूर अपनी पीड़ा महसूस करते हैं. गांधीजी से जुड़ी मोटी-मोटी कई किताबें इस पुस्तकालय में उपलब्ध हैं. गांधीजी पर शोध करनेवाले छात्रों के लिए काफी सामग्री मिल सकती हैं.  

तीन-चार कट्ठा में बने भवन में संचालित इस पुस्तकालय में एक-एक चीज व्यवस्थित दिखती हैं. दीवारों पर टंगी तसवीरों में वैज्ञानिकों, राजनेताओं, समाज सुधारकों का दिव्य चेहरा व उनके अनमोल वचन पाठकों के मन को झकझोरती हैं. उद्वेलित करती हैं कि आप कुछ भी बनो, लेकिन एक अच्छा इंसान जरूर बनो.  अपने पुत्र के शिक्षक के नाम अब्राहम लिंकन का पत्र हर आनेवाले को पढ़ने को मजबूर करता है. ‘हे शिक्षक! मैं जानता हूं और मानता हूं कि न तो हर व्यक्ति सही होता है और न ही होता है सच्चा,  किंतु तुम्हें सिखाना होगा कि कौन बुरा है और कौन अच्छा.’      
लाइब्रेरियन शंभु प्रसाद श्रीवास्तव है कि यहां हर वर्ग के लोग आते हैं, लेकिन सबसे अधिक पढ़ने-लिखने वाले बच्चे आते रहे हैं. दिनभर में अमूमन 25-30 लोग पुस्तकालय आते हैं और घंटों किताब पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ाते हैं. गांव के बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए लाइब्रेरी में चार कंप्यूटर भी लगाये गये थे. कुछ दिन तक कंप्यूटर की ट्रेनिंग दी जाती रही, लेकिन लैपटॉप-मोबाइल आने के बाद कंप्यूटर सीखनेवालों की संख्या घट गयी. अंत में हमलोगों ने कंप्यूटर को हटवा दिया. एक पाठक का कहना है कि जब से जियो और 4जी वाले मोबाइल का जमाना आया है, तब से लोग उसी में उलझे रहते हैं. पुस्तकालय में आनेवालों की संख्या भी घटी है. इसके बाद भी पुस्तकालय के 744 सदस्य हैं.  किताबें दो हजार से अधिक हैं. पत्र-पत्रिकाएं नियमित मंगवाया जाता है, ताकि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करनेवाले छात्र इसका लाभ उठा सके. 

नेशनल मिशन ऑफ लाइब्रेरी
पढ़ने की आदत विकसित करने के उद्देश्य से मनमोहन सिंह की सरकार में देशभर में 7,000 नये पुस्तकालय खोलने की योजना बनी थी. इंटरनेट सुविधा से युक्त ऐसे ज्यादातर पुस्तकालय देश के ग्रामीण हिस्सों में स्थापित किये जाने थे. आज इग्नू इस पहल में संस्कृति मंत्रालय की मदद कर रहा है, जो नेशनल मिशन आॅफ लाइब्रेरी के तहत आगे बढ़ाया जा रहा है. यह राष्ट्रीय भारतीय आभासी पुस्तकालय (नेशनल वर्चुअल लाइब्रेरी आफ इंडिया) सृजित करने का हिस्सा है. यदि आप भी पुस्तकालय संचालित कर रहे हैं, तो नेशनल मिशन ऑफ लाइब्रेरी से रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं.

फालतू पड़ी पुस्तकों को संजोने की जरूरत
मध्यप्रदेश के शिवपुर जिले के ग्रामीण अंचल में शिक्षा का अलख जगाने के लिए गांव-गांव में ग्रामीण पुस्तकालय खोले जाने की योजना पर काम हो रहा है. इन पुस्तकालयों के संचालन के लिए सामाजिक संगठनों व स्वयंसेवी संगठनों का सहयोग लिया जायेगा. प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी का कहना है कि उन्होंने सभी प्रेरकों से कहा है कि हजारों ऐसे लोग हैं, जिनके पास पुस्तकें पढऩे के बाद फालतू पड़ी रहती हैं. वह अभियान चलाकर अथवा खुद के प्रयास से अपने पास किताबों का एक बैंक बनाएं. इन पुस्तकों को प्रौढ़ शिक्षा केंद्र में रखें और गांव के लोगों को केंद्र पर बुलवा कर इन पुस्तकों को पढ़वाएं. इससे एक तो लोग पढ़ना-लिखना सीखेंगे, दूसरा उनकी किताबों के प्रति समझ बढ़ेगी.

लिहाजा, क्यों न हम भी अपने गांवों के लिए ऐसा प्रयास करें. ग्रामीण पुस्तकालय खोले जाने के अभियान में पंचायत प्रतिनिधियों को शामिल कर ज्ञान का प्रकाश आप भी फैला सकते हैं.

– रोहुआ गांव से रिंकू कुमारी

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