जीते जी नदी के ढाब में धकेल दिया हाकिमों ने

मुजफ्फरपुर. अखाड़ाघाट पुल पार करने के बाद चंद दूरी पर एक फर्नीचर दुकानदार से हमने पूछा कि भइया शेखपुर ढाब का रास्ता किधर से है. इशारों में ही उसने बताया कि थोड़ी दूर जाकर गली से रास्ता जा रहा है. आगे बढ़ने पर शेखपुर ढाब का साइन बाेर्ड दिखा. बाइक घुमाने से पहले गली के मोड़ पर खड़े एक सज्जन ने बताया कि शेखपुर ढाब का रास्ता यही है, लेकिन इस रास्ते से गाड़ी नहीं जा पायेगी, क्योंकि बारिश के जमे पानी व कीचड़ के कारण रास्ता जाने लायक नहीं है. फिर भी, हमलोगों ने हिम्म्मत जुटाई और चल पड़े अपने मुकाम की ओर. कीचड़-पानी के बीच से गुजरते हुए कई बार ऐसा लगा, अब गिरे कि तब. कच्चे रास्ते व पंगडंडी से गुजरते हुए हमलोग एक बगीचे के पास पहुंचे. वहां पर कुछ लड़के जामुन चून रहे थे. सामने कुछ दूरी पर बूढ़ी गंडक के किनारे करीब सौ-सवा सौ की संख्या में झोपड़ियां दिखाई दे रही थीं. उन झोपड़ियों पर लाल झंडे हवा के झाेकों से लहरा रहे थे. यह दृश्य देखने के बाद अंदाजा लग गया कि बूढ़ी गंडक की गोद में बसा शेखपुर ढाब यहीं है. आगे कोई रास्ता नहीं दिखाई देने पर हमारे पैर ठिठक गये. तब उन मासूम बच्चों ने बताया कि हमलोग इसी बस्ती के रहनेवाले हैं. बैंक रोड से आकर यहीं बस गये हैं. इशारों में उसने बताया कि आपलोग उस खेत से होकर बस्ती में जा सकते हैं. आगे बढ़ने पर बस्ती के मुहाने पर ही चंद्रदेव साह की चाय-नाश्ते की दुकान मिली. वहां चार-पांच की संख्या में लोग बैठे हुए थे. हमारी बाइक वहीं रुक गयी. चाय पीने के बहाने हमने उनलोगों से बातचीत शुरू की. एक युवक ने अपनी पीड़ा बताते हुए पूरी बस्ती का हाल जानने के लिए आगे-आगे चल पड़ा. हमारी टीम ने जो कुछ वहां देखा, महसूस किया, उसे हम यहां परोस रहे हैं –

दरअसल, फरवरी 2018 काे मुजफ्फरपुर प्रशासन ने बैंक रोड के पास स्थित झपसी बस्ती में पांच दशकों से अधिक समय से रहनेवाले करीब 150-200 परिवारों को उजाड़ कर रातों-रात बूढ़ी गंडक नदी की पेटी में अपनी झोपडी बनाकर रहने को विवश कर दिया. प्रशासन ने तब आश्वासन दिया कि (शेखपुर ढाब) नदी के किनारे जाकर बस जाओ, हम सभी सरकारी सुविधाएं मुहैया करा देंगे. यहां आये छह महीने बीत गये, लेकिन अब तक किसी ने इनलोगों की सुधि लेने कोई नहीं आया. जब हमने इन विस्थापित लोगों से बात की, तो उनके चेहरे पर उनका दर्द साफ झलक रहा था. बैंक रोड से हटाये गये इन लोगों को आज तक आने-जाने का रास्ता नहीं मिला. इनके बच्चों की पढ़ाई छूट गयी है. बिजली के पोल तो हैं, लेकिन सिर्फ देखने के लिए. एक-दो चापाकल से इतने परिवारों का काम चलता है. एक तरह से जेल की तरह नदी के इस ढाब में इनकी जिंदगी कैद हो गयी है. विस्थापन का दर्द झेल रहे इन गरीब-गुरबों के सिर पर समस्याओं का पहाड़ खड़ा है, जिसे वे खुद ही उठाये जा रहे हैं, न कोई सहारा, न कोई मदद की आस.

यह देश हम जैसे गरीब-गुरबों के लिए नहीं
चाय की दुकान पर बैठे विकलांग सुलिंद्र पासवान ने बताया कि वह ऑटो चलाता है. झपसी टोला में ही उसके मां-बाप रहते थे. उसका जन्म भी वहीं पर हुआ था, लेकिन सरकार ने हमें वहां से क्यों हटा दिया, हमें नहीं पता. शहर में रहते थे तो ऑटो चला कर जीवन-यापन कर लेते थे. लेकिन, अब ढाब में आने के बाद यहां से निकलना मुश्किल हो गया है. यहां आये हुए करीब छह महीने हो गये. अब तक हमलोगों को आने-जाने का रास्ता तक नहीं मिल पाया है. सरकारी व्यवस्था से खफा सुलिंद्र ने कहा कि यह देश हम जैसे गरीब-गुरबा के लिए नहीं है. यहां सिर्फ अमीर व दबंग लोगों की ही पूछ होती है. बातों ही बात में चाय दुकानदार चंद्रदेव साह बाेलने लगे कि अगले चुनाव में हम लोग किसी नेता को वोट नहीं देंगे. सरकार ढेर सारी योजनाओं की बात कहती है, लेकिन यहां एक भी चापाकल नहीं लगवा पा रही है. जैसे-तैसे बूढ़ी गंडक नदी का गंदा पानी पीकर जी रहे हैं.

मासूम बच्चों की छूटी पढ़ाई
बस्ती के अंदर घुसने पर मिट्टी में खेलते हुए छोटे-छोटे बच्चे दिखे. हमारे साथ चल रहे विशाल ने बताया कि झपसी बस्ती से आने के बाद यहां के बच्चों की पढ़ाई छूट गयी है. दिनभर ऐसे ही खेलते रहता है. यहां से शहर आने-जाने का सीधा व सहज रास्ता नहीं है. आसपास में कोई स्कूल भी नहीं है, जहां उन्हें भेजा जाये. बैंक रोड में सभी घरों के बच्चे स्कूल जाते थे. आगे कुछ सूझ नहीं रहा कि कैसे जीवन कटेगा यहां.

निजी रास्ते से जाने पर मालिक लोग कुत्तों से कटवाते हैं
सामने खड़ी उर्मिला देवी ने बताया कि अगर हमलोग किसी के घर के आगे से या निजी रास्ते से होकर शहर की ओर जाते हैं, तो गांव के मालिक लोग कुत्तों से कटवाते हैं. पहले नदी की पेटी सूखी थी, तो हम लोग आसानी से सीधे अखाड़ाघाट पुल के पास से होकर चले जाते थे. लेकिन अब नदी में पानी बढ़ गया है, तो वह रास्ता भी बंद हो गया. अगर नदी में बाढ़ आ गयी, तो सब कुछ डूब जायेगा.

खुले में ही स्त्री-पुरुष जाते हैं शौचालय
एक पेड़ की छांव में बैठी लालती देवी बताती हैं कि किसी के पास शौचालय नहीं है. सामने नदी के किनारे हम औरत-मरद सब शौच करने जाते हैं. कभी-कभी नौबत ऐसी आती है कि कोई मरद बैठा हुआ है और औरत को भी बिना परदे में बैठ जाना पड़ता है. जब हमने बताया कि सरकार अब खुले में शौच करने वालों को पकड़ कर जुर्माना कर देती है और जेल में बंद कर देती है, तो इस बात पर तमतमाए हुए एक सज्जन बोल पड़ते हैं कि पहले आये न कोई सरकार और प्रशासन, हम बताते हैं. अब तक तो पूछने नहीं आया कोई कि हमलोग किस हाल में हैं और जेहल में बंद करता है. पहले शौचालय न बनवा कर दे सरकार.

टीबी पेसेंट हैं, भारी काम नहीं कर सकते, बूढ़ी मां भीख मांगकर खिलाती है
एक टूटी हुई झोपडी में मैले-कुचैले व फटे-चिथड़े बिस्तर पर एक आदमी सोया पड़ा दिखता है. हम उसे उठाते हैं. लोटा में गंदा पानी पीते हुए नरेश नाम का वह आदमी अपने भीतर के दर्द को छलका देता है. कहता है, हम टीबी पेसेंट हैं. कोई भारी काम नहीं कर सकते हैं. इसलिए मां भीख मांगकर लाती है,तो दो बच्चों और हम सबका पेट भरता है. बीमारी के चलते पिछले साल बीवी मर गयी.

हमलोगों ने करीब दो घंटे उस बस्ती में रहकर उनलोगों की पीड़ा को गहराई तक महसूस करने का प्रयत्न किया. विस्थापन का दर्द, गरीबी का दंश, अभाव की जिंदगी और सरकारी आश्वासनों का पिटारा, ये ही तो कुछ चंद चीजें हैं, जिसे अपने सीने में दबाये ये अभावहीन लोग नदी की बहती व कलकल करती धारा को देखकर कुछ क्षण के लिए अपना दुख-दर्द भूल जाते हैं.

– शेखपुर ढाब से देवेंद्र कुमार की रिपोर्ट

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