अभिमन्यु ‘कुमार’ से अभिमन्यु कुमार ‘साहा’ होने का मेरा फ़ैसला गलत था?

जाति का जहर कितना घातक होता है, यह किसी से छिपा नहीं है. उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक जाति के राक्षसों ने अपने से छोटी व कथित रूप से अछूत जाति के लोगों पर न जाने अबतक कितने कहर ढाये हैं. वर्ण व्यवस्था के क्रूर चाल-ढाल व सामंती करतूतों की अनगिनत कहानियां इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, तो कितनी -ही डरावनी कहानियां दफ़न हो गयीं. भक्तिकाल से लेकर आजतक जात-पात के खिलाफ कितने ही आंदोलन हुए, लेकिन आज भी जाति का जहर हमारे समाज को विषाक्त कर रहा है. एक पत्रकार ने नौकरी पाने से लेकर न्यूज रूम तक में जो जातीय दंश झेला, उसे अपने फेसबुक वॉल पर साझा किया है, जिसे हम यहां हूबहू पेश कर रहे है –

सबकुछ ठीक चल रहा था. ग्रैजुएशन में था. पैसे नहीं थे कि किसी बड़ी यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले पाता. साल बर्बाद न हो जाए इसलिए पटना के मौलाना मज़हरूल हक़ विश्वविद्यालय में सात हजार सलाना की फीस पर मीडिया कोर्स में एडमिशन ले लिया.
इससे पहले की पढ़ाई मैंने अपने इलाक़े के बड़े स्कूलों में की थी. मुझे मलाल नहीं था कि मैंने उस यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया, जिसे कोई नहीं जानता है.
यूनिवर्सिटी में जितने संसाधन थे, उसका पूरा इस्तेमाल करने लगा. उत्साह और जोश इतना था कि आसमान से तारे तोड़ लाता.
तीसरे वर्ष में था. मैंने उत्साह में GENX मैगज़ीन शुरू कर दिया. मैनेजिंग एडिटर बना. गज़ब की सफलता मिली. स्टूडेंट लाइफ में लाखों कमाएं. जिस दिन पहली बार मेरे अकाउंट में एक लाख रुपए हुए थे, उस दिन धीरू भाई अंबानी सा फील हो रहा था. मैंने ग्रैजुएशन से लेकर आईआईएमसी तक की पढ़ाई खुद के पैसों से की.
एक दिन मैं पिताजी के एक दोस्त को मैगज़ीन भेंट करने गया. वो एक निजी कॉलेज के डायरेक्टर हैं. जब मैंने उन्हें मैगजीन का अंक पकड़ाया, उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और कहा, “बेटा- तुम धारा के विरुद्ध चल रहे हो, हमारी जाति में कोई पत्रकार भी बनता है क्या?”
मुझे बहुत अच्छा लगा. मैं रातभर सोया नहीं. उनकी बातें मेरे कानों गूंजती रही. मुझे लगा कि शायद मैं अपने समाज के लिए कुछ अलग कर रहा हूं, जिससे प्रेरित होकर आने वाली पीढ़ियां परचून की दुकान (हमारा परंपरागत व्यवसाय) से खुद को निकाल कर कोई और गैर-परंपरागत काम-धंधा करेंगी.
इस समय तक मैं ‘अभिमन्यु कुमार’ हुआ करता था. मैंने ‘अभिमन्यु कुमार साहा’ बनने का फ़ैसला किया ताकि आने वाले समय में पत्रकारिता में जहां भी मेरा नाम पढ़ा जाए, मेरी जाति और समुदाय के लोग यह समझ सकें कि वो कोई भी काम कर सकते हैं.
यहां तक सबकुछ अच्छा चल रहा था, पर इस फ़ैसले के बाद सबकुछ अचानक बिगड़ता चला गया. कॉलेज के दौरान मुझे जातिवादी होने का सर्टिफिकेट दिया गया. भेदभाव का शिकार हुआ. आरक्षण मेरी पहचान बनती चली गई.
लोग सवाल करने लगे कि आरक्षण से ही इतने बड़े संस्थान में एडमिशन मिला होगा. पर यह सवाल करने वाले को मालूम नहीं था कि मैंने इंटरव्यू के दौरान पैनल के सामने अपनी मैगज़ीन के 12 अंक प्रस्तुत किए थे. वो चौंक गए थे. पैनल में से एक ने पूछा- जो काम लोग यहां से जाने के बाद भी नहीं कर पाते हैं, वो आपने पहले ही कर दिया. यहां पढ़ने की ज़रूरत क्या है आपको?
मैंने जवाब दिया- यह सबकुछ अल्प ज्ञान के बूते किया हूं. अगर यहां पढ़ लूंगा तो शायद मैं भविष्य में टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अख़बार का मालिक बन सकूंगा.
जवाब सुन कर सभी खुश हुएं और मेरा एडमिशन हो गया.
कॉलेज से असीम ऊर्जा के साथ निकला. कुछ अलग और समाज में बदलाव लाने की चाहत उमड़ रही थी. मैंने वो सबकुछ किया, जो शायद लोग दस साल के करियर के बाद भी नहीं कर पाते हैं.
स्टिंग ऑपरेशन, घोटालों का भंडाफोड़, प्रशासन की नाकामियों को सामने लाना, कई लोगों की मौतों के जिम्मेदार को तलाशना, सरकारी कार्यालयों में हर काम के लिए घूस की प्रवृति को ख़त्म करना… वो सबकुछ जो एक ‘क्रांतिकारी’ पत्रकार करना चाहता है.
मैं गर्व से कह सकता हूं कि मैंने वो हर काम किया, जिससे समाज में बदलाव आया, छोटा या बड़ा. हां मुझे गर्व है खुद पर. सैलरी भले ही कुछ हजारों में थी, पर संतुष्टि करोड़ों की थी.
यहां तक की मैंने अख़बार का एक जिला एडिशन भी लॉन्च किया था, वो भी सफलतापूर्वक.
पर क्या इतना करने के बाद भी मेरे साथ भेदभाव नहीं हुआ होगा…?
हुआ और बहुत हुआ. मुझे मेरी जाति ‘तेली’ से संबोधित किया जाने लगा. मुझे जबरन नकारा साबित किया जाने लगा. मीटिंग में जलील किया जाता था.
मेरी तुलना इंटर्नशिप में आए लड़कों से की जाती थी. हर बार यह बताया जाता था कि मैं नकारा हूं. मुझसे वो सभी काम छीन लिए जाते थे जिसमें मैं ‘कुछ बड़ा’ कर सकता था.
और दूसरी ओर उन्हें प्रोमोशन और इंक्रिमेंट मिलता था, जो दफ्तर से बाहर तक नहीं जाते थे.
मैं टूटने लगा था. इतना टारगेट किया जाने लगा कि मैंने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया.
जाति और नकारा साबित करने के बाद भी लोगों का मन नहीं भरता था तो वो मेरी शारीरिक संरचना का मजाक बनाते थे. मेरे पतले होने को ‘दिनभर में दस बार हस्तमैथुन करने वालों’ से जोड़ा जाता था.
मैं कुछ नहीं कर पाता था. विरोध करता था तो ज्यादा टारगेट किया जाने लगता था. घुटन होने लगी मुझे.
अंत में मैंने दूसरा अख़बार ज्वाइन कर लिया.
मालूम है मेरी विदाई किन शब्दों से की गई… सोच भी नहीं सकते हैं आप.
“ऊ… तिवरिया (तिवारी) ई तेलिया (तेली) को नौकरी कैसे दे दिया हो”
यह वाक्य मेरी कई सालों की मेहनत की कमाई थी, जिसे मैंने आज भी दिल में संभाल कर रखा है.
हां भाई… मैं पिछड़ी जाति से हूं और रहूंगा.

अभिमन्यु कुमार से अभिमन्यु कुमार साहा बनने का दर्द यहीं नहीं खत्म हुआ. आगे भी मेरी मेहनत के आड़े जाति आती रही.
पटना में एक अख़बार के इंटरव्यू के दौरान खुल कर मुझसे जाति पूछी गई. ‘साहा’ टाइटल देखकर मेरी सीवी (CV) फेंक दी जाती थी.
हर पल बेहतर मौकों की तलाश में रहता था. ऑफिस के बाद बड़ी परीक्षाओं (मीडिया) की तैयारी करता था.
मैंने क्या-क्या किया और क्या-क्या झेला, उस बारे में कितना लिखूं. पढ़ कर थक जाएंगे. हो सकता है कि आपकी नफरत मुझसे और बढ़ जाए, आप मुझे जातिवादी ठहराने लगें, पर ये सबकुछ लिखना ज़रूरी था.
कई सालों से मेरे अंदर एक आग थी, जिसे मैंने आज शब्दों के जरिए निकालने की कोशिश की है.
हां… कई सालों से… आपको मालूम है यह लिखते हुए मेरे आंखों से वो दर्द आंसू बनकर लैपटॉप के की-बोर्ड को भिगो रहे हैं. इतना दर्द है मेरे भीतर.
मैं नहीं जानता कि मैं इस मीडिया में कितने दिन काम कर पाऊंगा, जहां सैंकड़ों सालों से वे लोग हैं, जो नहीं चाहते हैं कि कोई ‘तेली’, ‘चमार’, ‘डोम’, ‘कहार’ आए.
क्या आपने इन टाइटल के पत्रकार देखे हैं? या आपके आसपास कितने हैं? या फिर टीवी पर पत्रकार या फिर विशेषज्ञ के रूप में आने वालों के नाम के आगे ये टाइटल जुड़ा देखते है?
मैं ये जानता हूं कि मुझे पहले जाति के नाम पर रोका जाएगा. उससे भी नहीं रुका तो मुझे नकारा साबित किया जाएगा. अगर उससे भी नहीं रुका तो वे ‘चरित्रहीन’ साबित करने का ब्रह्मास्त्र चलाएंगे.
हां, हो चुका है मेरे साथ ऐसा. मेरी एक पिछड़ी जाति की महिला पत्रकार के साथ भी ऐसा ही हुआ है और अब वो मीडिया छोड़ चुकी है.
मैं फिर इसे दोहरा रहा हूं कि इस दर्द को लिखने के बाद वो मुझे ‘घोर जातिवादी’ का तमगा देंगे. मैं उसे हंसते हुए स्वीकार करूंगा और अपना काम को पूरी ईमानदारी से करने की कोशिश करूंगा.
इस कलयुग में भी अभिमन्यु (साहा) छठे दरवाजे तक ज़रूर पहुंचेगा. सातवें में अगर उन्होंने रोका, तो वो अपनी बची हिम्मत से लड़ेगा. फिर भी रोका गया तो वो इस मीडिया को हमेशा के लिए अलविदा कह देगा.
हां… उस दिन मैं मीडिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दूंगा.
मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं यह समझना है तो अपना भारी भरकम टाइटल छोड़िए और कभी कुछ दिन के लिए ही सही ‘तेली’, ‘चमार’, ‘डोम’ जैसे टाइटल के साथ जिंदगी जिएं.
मेरे पिताजी हमेशा मेरी टाइटल को लेकर नाराज रहते हैं और इसे हटाने को कहते हैं, पर पिताजी मैं इसे कभी नहीं हटाऊंगा… हां कभी नहीं हटाऊंगा.

(ऐसा नहीं है कि अब तक के सफर में सभी मिश्रा, त्रिपाठी, तिवारी, सिन्हा, शर्मा और सिंह ने सिर्फ मुझे दर्द ही दिया. ऐसे भी मिलें, जो मेरी हिम्मत बनें. उनको मैं सलाम करता हूं. काश! आपकी तरह सभी हो जाएं. मेरे आगे बढ़ने में और जो भी मैंने छोटी-मोटी सफलता हासिल की है, उसमें उनका भी योगदान है.)

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