मधुरेंद्र को रेत बुलाती है, परछाई पुकारती है

मोतिहारी. वह कहता है, मुझे रेत बुलाती है. नदी-नाले, खेत-खलिहान की माटी और घर-आँगन की दीवारों पर अनेकानेक अदृश्य आकृतियां उसे उकेरने के लिए झकझोरती हैं. फेंक दी गयीं वस्तुएं उसे पुकारतीं हैं तिनके-तिनके को जोड़कर प्रकृति की अनुपम रचना कर डालने को. वह अदना-सा आदमी कोई और नहीं, साधारण कद-काठी का एक जुनूनी युवक है, जिसका नाम है मधुरेन्द्र.

परिवार के सदस्यों के साथ सैंड आर्टिस्ट मधुरेन्द्र

मधुरेन्द्र गांव की माटी में खेलकर बड़ा हुआ. नदी के बालू को छू-छू कर अपने भीतर के कलाकार को निखारा. न किसी गुरु का ज्ञान लिया और न ही किसी कला विद्यालय से शिक्षा पायी. फिर भी वह खुद को एक अद्भुत कलाकार के रूप में खुद को स्थापित कर लिया, जिसकी कृति को देखकर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने उसे ‘मार्वेलस आर्टिस्ट’ कहा.

बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के बिजवनी गांव में एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्में मधुरेंद्र अपनी उपलब्धियों पर खुश हैं. मधुरेंद्र कहते हैं कि बचपन में बालू के रेत के ढेर पर आखिर कौन नहीं खेला होगा? गांव-मुहल्ले में पड़े रेत के ढेर पर नटखट बच्चों को गुफा बनाते हुए आपने भी देखा होगा. मैं भी इन्हीं बच्चों की तरह मिट्टी और बालू में खेलते हुए सैंड आर्टिस्ट बन गया. बचपन के इस खेल को अब हमने अपना कैरियर बना लिया है. मधुरेंद्र कहते हैं, जब से होश संभाला, कलाकारी ही की. बचपन से ही मुझे पढ़ने में रुचि नहीं थी. फिर भी जैसे-तैसे मैट्रिक-इंटर तक पढ़ा. किसी की परछाई देखकर लगता था कि मुझे कोई बुला रहा है. तब मैं 6-7 साल का था. मेरे माता-पिता मुझे भैंस-बकरी चराने भेज देते थे. बकरी चराते हुए मैं वहीं नदी किनारे मिट्टी-बालू पर कुछ न कुछ आकृति बना डालता था. यह सिलसिला उम्र बढ़ने के साथ भी जारी रहा. बड़ा हुआ तो गांव में ही ‘नशे के दुष्प्रभाव’ थीम पर एक कलाकृति बनाई, जिसकी लोगों ने खूब प्रशंसा की. पहली बार अखबारों में छपा. तब मुझे लगा कि मैं सही दिशा में हूं.

बिहार के प्रसिद्ध सोनपुर मेले व पटना के दियारा तट पर बनाये गये सैंड आर्ट ने मधुरेन्द्र को पहचान दिलायी. ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े मधुरेंद्र राज्य व राज्य के बाहर कई मेलों, महोत्सवों, सरकारी आयोजनों में सैंड आर्ट के नमूने प्रदर्शित कर चुके हैं. सैंड आर्ट के लिए मधुरेंद्र कला सम्राट अवार्ड समेत दो दर्जन से अधिक पुरस्कारों से नवाजे जा चुके हैं. नेपाल में विश्व कैंसर दिवस पर उन्हें सम्मानित किया गया था. आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद वह अपनी कोशिशों में कमजोर नहीं दिखते हैं और पूरी बुलंदी के साथ अपनी साधना में रत हैं.

मधुरेंद्र ने स्वध्याय, इच्छाशक्ति और जुनून को अपनी सफलता का हथियार बनाया है. समाज, राजनीति, पर्यावरण संरक्षण, शराबबंदी, जनसंख्या नियंत्रण, नशे का दुष्प्रभाव, मानव स्वास्थ्य, भारतीय नृत्य, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं, नारी उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, गरीबी, मजदूरों का शोषण और आतंकवाद जैसे सामाजिक और ज्वलंत मसलों पर मधुरेंद्र ने अबतक एक हजार से अधिक कलाकृतियों की रचना की है. बिहार के राजगीर महोत्सव, बौद्ध महोत्सव, थावे महोत्सव, सोनपुर मेला, किशनगंज के खगड़ा मेला एवं नेपाल, पंजाब में भी मधुरेंद्र ने बालू की रेत पर अपनी कला का प्रदर्शन किया है. पंजाब के भटिंडा में उन्होंने दो ट्रक बालू पर 30 फ़ीट लंबी और 12 फ़ीट ऊंची आकृति बनाकर देश के वीर शहीदों को श्रद्धांजलि दी थी. नशामुक्त समाज बनाने का संदेश देने के लिए मधुरेंद्र ने खाकर फेंके गए गुटखे के रैपर, पाउच के पन्नी और सिगरेट से एक मानव कंकाल बनाया, जिसका शीर्षक रखा था “जवानों की मृत्यु”. इस कलाकृति को देखने करीब आधे दर्जन गांवों के लोग आये. बालू और रेत से इतर भी मधुरेंद्र ने अपने हाथ आजमाए हैं. मुजफ्फरपुर सुधा डेयरी के लिए वर्गीस कुरियन की पीतल की 50 किलो की मूर्ति बना कर दिया है. मधुरेंद्र की कला को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी सराहा है.

मधुरेंद्र के पिताजी खेती-किसानी करते हैं और वे खुद स्टूडियो चला कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं. मधुरेंद्र बताते हैं कि मैंने गरीबी झेलते हुए अपने अंदर की कला को मांजा है. मुझे याद है कि सिर पर हांडी लेकर मैं गांव-गांव घूमकर दही बेचने जाता था. तब पांच रुपए किलो दही बिकता था. वो संघर्ष के दिन याद है मुझे. वैसे तो संघर्ष मैं आज भी कर रहा हूं.

पांच भाई-बहनों में मधुरेंद्र सबसे बड़े हैं. वे फ़िलहाल आरा से फाइन एंड आर्ट्स में बीएफए की पढ़ाई कर रहे हैं. पिता शिव कुमार साह और माता गेना देवी को आज अपने बेटे पर गर्व है. निःसंदेह मधुरेंद्र बिहार के सुदर्शन हैं. पेंटिंग और जुडो कराटे में भी इनका कोई सानी नहीं है.

भारत में सैंड आर्ट की ऐसे हुई शुरुआत
कहा जाता है कि पहली बार प्राचीन व मध्यकालीन भारत में बालू मूर्तिकला के बारे में थोड़ा-बहुत जिक्र मिलता है. उड़ीसा में 14वीं शताब्दी में इस कला के संदर्भ में लिखित जानकारी मिलती है, जिसमें बलराम दास नामक कलाकार के बारे में जिक्र है. बलराम दास दलित थे, जो पुरी में होनेवाली भगवान जगन्नाथ की यात्रा में शामिल होना चाहते थे. लेकिन राजा ने उन्हें समुदाय से होने के कारण यात्रा में शामिल होने की अनुमति नहीं दी. बड़े धूमधाम से रथयात्रा निकाली गयी, लेकिन वह आगे बढ़ ही नहीं पा रहा था. अथक प्रयास के बाद भी जब रथ टस से मस नहीं हुआ, तो राजा भगवान की शरण में गये. भगवान के कहा, मैं तो समुद्र के किनारे हूं. मेरा भक्त तो वहीं है. दरअसल, बलराम दास राजा के दुत्कार के बाद समुद्र के किनारे चले गये और उन्होंने बालू से तीन रथ बना डाले. इस प्रकार भारतीय इतिहास में बालू मूर्तिकार के रूप में पहला नाम बलराम दास का आता है. आज भी भारत में सैंड आर्टिस्ट गिने-चुने है. आज उड़ीसा के सुदर्शन पटनायक का नाम रेत कला के क्षेत्र में अग्रगण्य है. इस कड़ी में बिहार से जो अकेला नाम जुड़ता है, वह मधुरेंद्र कुमार का ही है.

– अप्पन समाचार डेस्क

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