किताबों व शब्दों की ताकत से लैस होता उत्पीड़ित समाज

अाक्रामक राजनीति के इस युग में सियासत की परिभाषा ही बदल गयी है. इसने समाज के मन-मिजाज को भी बदल कर रख दिया है. आज नफरत, झूठ-फरेब, जातीय संघर्ष के इस खतरनाक दौर से होकर हमारा समाज गुजर रहा है. पढ़ा-लिखा समाज भी संकीर्ण सोच से ऊपर उठने की बजाय सच से काेसाें दूर अपनी-अपनी जातीय अस्मिता बचाने के संघर्ष में लगा है. वर्चस्ववादी शक्तियां अपना हित वर्तमान राजनीतिक समूह को ताकतवर बनाये रखने में देखती हैं, तो बहुजन समाज आज भी अपने सम्मान की लड़ाई को धार देते हुए बार-बार ठगा हुआ महसूस कर रहा है. धार्मिक भावनाओं में बहकर उत्पीड़ित समाज भले हिंदुत्व के नाम पर एक खास पार्टी को सत्ता में काबिज करा दिया हो, लेकिन जब जाति की बात आयी, तो उसे उसके अतीत की याद दिला दी. अगड़ों-पिछड़ों की धार पर हिंदुत्व की शान चढ़ानेवालों की मंशा उजागर हो गयी. देशभर में दलितों के खिलाफ हिंसक घटनाएं बढ़ीं. पिछड़ों को आरक्षण के नाम पर गालियां दी जाने लगीं. एक तरफ हिंदुत्व के नाम पर गोलबंदी, तो दूसरी ओर जातीय श्रेष्ठता के नाम पर अपमान. ये दोनों एक साथ अब नहीं चलेगा. यह बात अब दलित व पिछड़ा समाज कहने लगा है.

दो अप्रैल का भारत बंद भले ही एससी/एसटी एक्ट को कमजोर करने के खिलाफ किया गया हो, लेकिन जिस तरह से इस बंद के जवाब में 10 को भी भारत बंद किया गया, वह जातीय संघर्ष की आग को और धधका गया.  रोहित वेमुला की हत्या, भीम आर्मी सेना के चंद्रशेखर को जेल और दलितों पर बढ़ रहे अत्याचार ने दलित चेतना को सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन में बदल कर रख दिया है. इन सब घटनाओं का राजनीतिक हित-अहित क्या होनेवाला है, हम इसकी चर्चा नहीं करना चाहते हैं. लेकिन इसके दूसरे पहलू की ओर हम जरूर इशारा करना चाहते हैं.

हाल के दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे छोटे-बड़े कार्यक्रमों के जरिये आप वंचित समाज में हो रहे बदलाव को महसूस कर सकते हैं. डॉ आंबेडकर के कथन, ‘शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो इसे पियेगा वही दहाड़ेगा.’ को यह वंचित समाज आत्मसात करने लगा है.

हाल ही में मुजफ्फरपुर (बिहार) के कुढ़नी प्रखंड के केरमा में एक बड़ी सभा का आयोजन दलित संगठनों की ओर से किया गया था. उसमें मंच से खुलेआम ब्राह्मणवाद पर करारा प्रहार किया जा रहा था. डॉ आंबेडकर की जयंती के बहाने कमजोर समाज को जागरूक करने और हिंदुत्ववादी शक्तियों के षड्यंत्र से एससी, एसटी व ओबीसी समुदाय के लोगों को आगाह करने की बात की जा रही थी. सभागार में दलित-पिछड़ी जाति के एक दर्जन महान आत्माओं की तसवीर लगाकर यह बताने की कोशिश की जा रही थी कि 15 प्रतिशत बनाम 85 प्रतिशत के राजनैतिक व शैक्षणिक हैसियत को समझना होगा.  मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए भाजपा सरकार को 2019 में खारिज करने की बात पूरजोर तरीके से की जा रही थी.

पूर्वजों के सत्कर्मों से मिलती है संघर्ष की ताकत
पंडाल के एक छोड़ पर लगी बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर, अमर शहीद जगदेव प्रसाद, बिरसा मुंडा, कर्पूरी ठाकुर, अमर शहीद जुब्बा सहनी, फूलन देवी, संत कबीर, वीर एकलव्य, सम्राट अशोक, अब्दुल कयूम अंसारी, वीर चौहरमल, शाहूजी महाराज, संत रैदास, ज्योतिबा फूले, भगवान बुद्ध की तस्वीरें बहुत कुछ कह रही थीं. शिक्षित दलित युवक अपने पूर्वजों के महान कर्मों से ऊर्जा लेकर आनेवाली पीढ़ियों को बदल देने को आकुल दिख रहे थे. पंडाल के बाहर दलित साहित्य, महान विभूतियों के संघर्ष की कहानियां, मनुस्मृति समेत अन्य पुस्तकों और आंबेडकर जी का पोस्टर खरीदने को लोग जुटे थे. मुजफ्फरपुर जिले के कुढ़नी प्रखंड के इस खांटी देहात में दलित-पिछड़ों के किसी कार्यक्रम में इस तरह से किताबों का स्टॉल लगा पहले नहीं देखा था. खास बात यह थी कि कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी किताब खरीद रहा था. लुंगी पहने एक सज्जन से बताया कि अब समय आ चुका किताबों से दोस्ती करने का. जब तक हम अपना इतिहास नहीं जानेंगे, तब तक हम सताए जाते रहेंगे.

हर दलित बस्ती में खुलेंगे शिक्षा केंद्र
सभा में एक दलित युवा नेता एलान करता है कि है हर गांव -मोहल्ले में एक शिक्षण संस्थान खोला जायेगा. इसकी शुरुआत पहले अपने गांव-घर से शुरू करनी होगी. हम पढ़ेंगे नहीं तो बढ़ेंगे नहीं. इसलिए हमारी माताओं-बहनों को भी पढ़नी होगी. नहीं तो ये मनुवादी लोग और यह सरकार हमारे सारे अधिकार छीन लेंगे.

अपना इतिहास और संविधान पढ़ें
कुढ़नी प्रखंड के एक पूर्व मुखिया रामबाबू सिंह का कहना था कि सबका साथ और मनुवादियों का विकास नहीं चलेगा. हमारा लोकतंत्र जिस संविधान की बुनियाद पर खड़ा है, उसे ही ढाहने की कोशिश की जा रही है. बाबा साहेब की कृति पर खतरा मंडरा रहा है. संविधान बचाने के लिए हम सबको एकजुट होना होगा. अन्य वक्ताओं ने कहा, भाजपा सांपनाथ तो कांग्रेस नागनाथ. कमोवेश सभी पार्टियों के प्रबंधन में सवर्ण ताकतें हावी हैं. हमारे नेताओं को सवर्ण शक्तियां कुछ चलने नहीं देती हैं. इसलिए हमें अपनी लड़ाई सूझबूझ से लड़नी होगी. वक्ताओं ने नौजवानों को ललकारते हुए कहा, बाबा साहब अकेला हमारे अधिकारों की लड़ाई लड़ी, हमें संवैधानिक अधिकार दिलायी. तो क्या हम उनकी दी हुई संपत्ति की रक्षा भी नहीं कर सकते हैं? अपना इतिहास और संविधान पढ़िये. जब तक दोस्त व दुश्मन की पहचान नहीं होगी. आप लड़ाई किससे करेंगे?
कर्मकांड पर हमला बोलते हुए वक्ताओं ने कहा, हमारे घर-घर में ब्राह्मण सांप बनकर घुसा हुआ है. हम मानसिक रूप से गुलाम हैं. महिलाएं तो कर्मकांड में उलझन के कारण और अधिक मानसिक गुलामी झेल रही हैं. उनमें जागरूकता लाना बहुत जरूरी है. लड़ाई तभी आसान होगी. नौजवानों व बच्चों को शिक्षा से जोड़िए, यह गुलामी से मुक्ति का बड़ा हथियार साबित होगा.

बदल रहा है दलित समाज
1. पढ़ाई को दे रहा है महत्व
2. अपने समाज के महान व्यक्तियों के योगदान को कर रहा याद
3. पढ़ा-लिखा दलित युवक समाज को जागरूक को आ रहा आगे
4. ब्राह्मणवाद को दे रहा चुनौती
5. बन रहा अनीश्वरवादी
6. तोड़ रहा है सामाजिक वर्जनाओं को
7. पूर्वजों के अपमान की कहानी उसे कर रहा उद्वेलित
8. कर्मकांडों से कर रह तौबा

 

– अप्पन समाचार डेस्क

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