यूरिया का कहर, जमीन में जहर

मुजफ्फरपुर. किसान यूरिया का इस्तेमाल अच्छी उपज के लिए करते हैं, लेकिन इंडियन नाइट्रोजन असेसमेंट का मूल्यांकन है कि यूरिया के प्रयोग से जमीन तो बीमार हो ही रही है, यह जल और जन पर भी खतरनाक असर डाल रही है. यूरिया नाइट्रोजन प्रदूषण का मुख्य कारक है. देखें कैसे यूरिया कहर बन कर जमीन में जहर फैला रही है –
अगस्त 2017 में प्रकाशित ‘इंडियन नाइट्रोजन असेसमेंट’ का मूल्याकंन बताता है कि भारत में नाइट्रोजन प्रदूषण का अहम स्त्रोत कृषि है. इसका अधिकांश भाग नाइट्रोजन फर्टीलाइजर (उर्वरक) खासकर यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल से आता है. भारत में पिछले 60 साल में यूरिया का अत्यधिक इस्तेमाल किया गया है, जिससे कृषि उत्पादकता में कई गुणा बढ़ोतरी हुई है. 1960-61 में कुल नाइट्रोजन फर्टीलाइजर में यूरिया का अंश 10 प्रतिशत था, जो 2015-16 में बढ़कर 82 प्रतिशत हो गया. फर्टीलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एफएआई) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत हर साल 148 लाख टन यूरिया की खपत करता है. यूरिया के इस्तेमाल में अन्य राज्यों को छोड़ दीजिए, बिहार भी पीछे नहीं रहा है. आंकड़ों पर गौर करें तो सिर्फ अप्रैल 2015 से मार्च 2016 तक की अवधि में बिहार में यूरिया की बिक्री 2,358,174 मीट्रिक टन हुई. मूल्यांकन के अनुसार, यूरिया के इस्तेमाल की वजह इसका सस्ता होना है.

एएफओ के अनुमान के मुताबिक, 2050 तक दक्षिण एशिया में उर्वरकों के इस्तेमाल की दर दुनिया में सबसे ज्यादा होगी. जब तक इस प्रदूषण को रोकने का उपाय नहीं किया जाएगा, तब तक यह इन सभी तंत्रों को बिगाड़ने का काम करेगा. नाइट्रोजन का अत्यधिक प्रयोग मिट्टी को अम्लीय बना सकता है और उसमें जहरीले हेवी मेटल्स बढ़ा सकता है. इस कारण पीने के पानी की गुणवत्ता खराब हो सकती है. ये प्रभाव निश्चित रूप से हवा की गुणवत्ता को पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के सहयोग से और खराब कर सकते हैं. अमोनियम नाइट्रेट पार्टिकल इंसानी स्वास्थ्य को चुनौती देंगे. वहीं नाइट्रस ऑक्साइड और अन्य नाइट्रोजन क्रियाएं वैश्विक तापमान पर प्रभाव डालेंगी. प्राकृतिक रूप से मौजूद नाइट्रोजन को भूलने का नतीजा

प्राकृतिक रूप से मौजूद नाइट्रोजन पेड़-पौधाें के लिए जरूरी तत्व है, लेकिन मानव निर्मित नाइट्रोजन (यूरिया) के अंधाधुंध प्रयोग के कारण पूरे नाइट्रोजन चक्र को बुरी तरह प्रभावित किया है. यह जरूरी पौष्टिक तत्व मिट्टी में डाइएजोट्रोफ जीवाणु के जरिए मौजूद रहते हैं. दाल के पौधों की जड़ों में पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन तत्व पाये जाते हैं, इसलिए किसान दो फसलों के बीच में दाल की फसल लगाते थे, ताकि मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनी रहे और उसे जरूरी नाइट्रोजन तत्व मिल सके. लेकिन हरित क्रांति के साथ यूरिया के बढ़ते इस्तेमाल ने जमीन की सेहत को मटियामेट करके रख दिया है. डाउन टू अर्थ व सीएसई की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि सबसे अधिक पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश नाइट्रोजन प्रदूषण से जूझ रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, नाइट्रोजन उर्वरक जल-जमीन के अलावा मानव स्वास्थ्य को बिगाड़ने व जलवायु परिवर्तन के लिए भी जिम्मेवार है. पिछले दिनों अमृतसर में नाइट्रोजन प्रदूषण पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान डाउन टू अर्थ के मैनेजिंग एडिटर रिचर्ड महापात्रा ने कहा कि आइएनजी के अध्ययन के अनुसार, भारत में नाइट्रोजन प्रदूषण का मुख्य स्त्रोत कृषि है. चावल व गेहूं की फसल सबसे ज्यादा प्रदूषण फैला रही है. पिछले पांच दशकों में हर भारतीय किसान ने औसतन 6000 किलो से अधिक यूरिया का इस्तेमाल किया है.

पेयजल में नाइट्रेट से छह महीने तक के बच्चे को ब्लू बेबी सिंड्रोम हो सकता है. इस बीमारी से पीड़ित बच्चों के खून में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, क्योंकि नाइट्रेट हीमोग्लोबिन की के प्रभाव को बाधित कर देता है. हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन का वाहक है. इससे बच्चों को बार-बार डायरिया हो सकता है. यह श्वसन क्रिया को भी बाधित करता है. यह स्कूली बच्चों में उच्च रक्तचाप और ब्लड प्रेशर भी बढ़ा देता है.

कहते हैं विशेषज्ञ
1. इंडियन नाइट्रोजन ग्रुप के अध्यक्ष एन रघुराम ने डाउन टू अर्थ पत्रिका से बातचीत में बताया था कि नाइट्रोजन प्रदूषण के लिए सबसे बड़ा मानव निर्मित स्त्रोत खेतों का अप्रयुक्त फर्टीलाइजर है, चाहे वह मूलरूप से जैविक हो या रासायनिक. किसान फर्टीलाइजर का अधिक इस्तेमाल करते हैं, लेकिन फसलें फर्टीलाइजरों का पूर्ण इस्तेमाल नहीं कर पाती है, इसलिए नाइट्रोजन प्रदूषण में उनका योगदान होता है.

2. इंटरनेशनल नाइट्रोजन इनीशिएटिव के अध्यक्ष मार्क सतन का कहना है कि दुनिया के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्र इस गंभीर नाइट्रोजन चक्रण की जद में हैं. यह उन देशों की समस्या है जो जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक निर्भर हैं और जहां बड़े पैमाने पर खेती होती है. भारत और दक्षिण एशिया विशेष रूप से बढ़ती जा रही है, क्योंकि यहां आबादी और उपभोग की दर तेजी से बढ़ती जा रही है.  (इनपुट : डाउन टू अर्थ)

– अप्पन समाचार डेस्क

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