शुद्ध दूध चाहिए, तो बनिए व्हाट्सएप ग्रुप का सदस्य

शिवहर. एक आइडिया किसी बदलाव का बड़ा वाहक कैसे बन जाता है, इसे देखना है तो बिहार के शिवहर जिले के रेवारी गांव जाकर देखा जा सकता है. यहां के पशुपालक किसानों ने सोशल मीडिया को माध्यम बनाकर एक नायाब प्रयोग किया है. जानिए, उन्हीं लोगों की जुबानी –
‘रेवासी मिल्क एसोसिएशन’ बना शुद्ध दूध का बाजार
माधोपुर छाता पंचायत के रेवासी गांव निवासी सत्यदेव कुमार बताते हैं कि हमलोग किसान हैं. खेती-बाड़ी व पशुपालन करते हैं. जीविका का यही एकमात्र साधन है. इसलिए दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ‘रेवासी  मिल्क एसोसिएशन’ नाम का एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया है. इस ग्रुप के माध्यम से हमलोग पशुपालकों व उपभोक्ताओं को जोड़ते हैं, ताकि लोगाें को गाय-भैंस का शुद्ध दूध आसानी से उपलब्ध हो सके. हालांकि, अभी सभी लोगों के पास स्मार्टफोन नहीं है, इसलिए सात पशुपालक ही व्हाट्सएप ग्रुप के मेंबर बने हैं, लेकिन वैसे करीब 250 पशुपालक व दूध के खरीदार इस ग्रुप से जुड़ चुके हैं, जो दूध की जरूरत होने पर हमें मोबाइल पर या सीधे संपर्क करते हैं. यहां के पशुपालक सुधा के सेंटर पर नियमित दूध देते हैं, लेकिन कुछ दूध बचा कर इस ग्रुप को भी देते हैं. कभी सेंटर नहीं जा सकने की स्थिति में या किसी कारण से दूध बच जाने पर वे ग्रुप पर मैसेज डाल देते हैं. यह ग्रुप अप्रैल 2017 में बनाया गया था, लेकिन अभी दो-तीन महीने से अच्छा रिस्पांस मिल रहा है.  वे आगे कहते हैं कि हमलोगों ने एक गाइडलाइन बनाया हुआ है, ताकि 100% शुद्ध दूध लोगों को मिले. दूध की क्वालिटी खराब होने पर हम पशुपालक को ग्रुप में नहीं रखते हैं. उपभोक्ताओं का मैसेज आता है कि मुझे दूध चाहिए, तो दूध उन तक पहुंचाने के एवज में सर्विस चार्ज के रूप में उनसे पांच रुपये लेते हैं. यदि वे खुद दूध ले जाने में सक्षम होते हैं, तो कोई एक्सट्रा चार्ज नहीं लगता है. देसी गाय का प्योर दूध 50 रुपये लीटर देते हैं, जबकि भैस का दूध 30 से 35 रुपये लीटर.
आइडिया से प्रभावित होकर रेवासी पहुंचे तीन आइआइटीयन
इस पहल की जानकारी मिलने के बाद दिल्ली व खड़गपुर के तीन आइआइटीयन विक्रांत वत्सल, नवीन कुमार व अखिलेश कुमार शिवहर जिले के रेवासी गांव पहुंच कर इन किसानों-पशुपालको से मिल कर उनका हौसला बढ़ाया. विक्रांत कहते हैं कि वाकई यहां के लोगों की यह पहल गांव में सोशल मीडिया का क्रांतिकारी प्रयोग है. हम चाहते हैं कि इस पहल को बड़ा रूप दिया जाये, ताकि पशुपालक किसानों को अधिक से अधिक फायदा पहुंचे और आम उपभोक्ताओं को भी शुध दूध मिल सके. हमलोग इसी पर अभी रिसर्च कर रहे हैं.
नवीन कहते हैं कि यह ग्रुप दूध के लिए बना है. यदि किसान दूसरे काम के लिए भी सोशल मीडिया का प्रयोग करें, तो उन्हें इसका अच्छा लाभ मिलेगा. जहां सब्जी आदि की मंडी या बाजार आसानी से उपलब्ध नहीं हैं. वहां के किसान इस काम के लिए भी ऐसा ग्रुप बना सकते हैं. मान लीजिए किसी किसान के पास क्विंटल में टमाटर या फूलगोभी है और उन्हें बाजार उपलब्ध नहीं है. यदि वे व्हाट्सएप ग्रुप बना कर यह डालते हैं कि हमारे पास हरी सब्जी है, जिसे चाहिए वे संपर्क करें, तो उनका माल आसानी से बिक जायेगा और बिचौलियों से भी मुक्ति मिलेगी. खासकर लगन के समय वैवाहिक या अन्य सांस्कृतिक आयोजनों के मौके पर होनेवाले भोज के लिए सब्जी आदि सामान लोगों को आसानी से उपलब्ध हो सकेगा. दूर बाजार में जाने का झंझट भी खत्म हो जायेगा.

आइआइटीयन विक्रांत वत्सल की कलम से –

आज बिहार के शिवहर जिले के एक सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में जाने का मौका मिला. ये गांव है छाता माधोपुर. महीने भर से एक न्यूज हम लोगों को काफी प्रभावित कर रहा था. मैं विक्रांत वत्सल (IIT Delhi), नवीन कुमार (IIT Delhi) और अखिलेश कुमार (IIT Kharagpur) एक केस स्टडी के लिए आज उस गांव में जा पहुंचे, जहां ग्रामीणों ने दूध के सहकारी वितरण के लिए एक व्हाट्सएप ग्रुप बना रखा है. इस ग्रुप में वैसे लोग हैं, जिनके पास गाय/भैंस हैं और वैसे लोग भी हैं, जो दूध के दैनिक उपभोक्ता हैं. उपभोक्ता और उत्पादक दोनों के बीच सूचना का आदान-प्रदान ग्रुप पर होता है. ग्रामीणों से बातचीत से पता चला कि इस पहल से उपभोक्ताओं में शुद्ध दूध सुगम हो गया है और उत्पादक (पशुपालक) का भी दूध बर्बाद/खराब नहीं होता है. इस इनोवेटिव आइडिया से आसपास के गांवों के लोग भी काफी प्रभावित हैं और वे भी अपने गांव में ऐसा ग्रुप बना रहे हैं. हमने पिछले एक महीने का रिपोर्ट रिकॉर्ड किया. बहुत अच्छा अनुभव रहा. सूचना क्रान्ति में एक नया अध्याय !

विशेष जानकारी के लिए संपर्क कर सकते हैं इस नंबर पर : 8882928844

कामेंद्र एन मिश्रा अमेरिका में रहते हैं. सीड्स की बहुराष्ट्रीय कंपनी है इनकी. शिवहर के लोगों के इस प्रयास की सराहना की है.

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