मूसा केवल मुसहर नहीं खाते

आज गांव की गली से निकल रहा था तो एक बुजुर्ग महेष यादव कुछ बच्चों के साथ भोज की तैयारी कर रहे थे. मैंने पूछा कि क्या कर रहे हैं तो जवाब दिया-‘मूसा पकावे छियों भैया.’ बच्चों के चेहरे खुशी देखी, तो फोटू खींच ली. मुंगेर, बिहार के मेरे गांव की कहानी है. महेषरी यादव नाम है इनका. मूसा केवल मुसहर नहीं खाते हैं.

– स्वतंत्र मिश्रा के फेसबुक से

Sarojini Bisht मूसा और मुसहर का कोई संबंध नहीं. दरअसल खेतों में पलने वाले मुसों को लोग पहले बड़े चाव से खाते थे, क्यूंकि वे आनाज पर पलने वाले मुसे होते थे बल्कि मैंने तो खाने वालों से उनके स्वाद के भी किस्से सुने हैं. यहाँ तक कि बिलों में हाथ डालकर मुसों को पकड़ा जाता था. यह काम कोई दिलेर ही कर सकता है. अब उतनी खेती-किसानी रही नहीं, न ही दिलेरी. तो मुसा प्रकरण भी खत्म हो रहा है. हाँ यदा-कदा बचा है.

Gangadhar Dangwal मुसहर समाज आज के बदलाव से कोसों दूर है. उत्तरप्रदेश के कुशीनगर में आप सब देख सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Skip to toolbar