सेट तैयार होता, तो टॉम ऑल्टर होते ‘खड़ी बोली के चाणक्य’ के गवर्नर

हिंदी के प्रति समर्पित मुजफ्फरपुर के वीरेन नंदा ने प्रसिद्ध अभिनेता, लेखक पद्मश्री टॉम ऑल्टर के निधन पर अफसोस जाहिर करते हुए अपने फेसबुक वॉल पर अपने उद्गार इस तरह व्यक्त किये हैं –

”अयोध्या प्रसाद खत्री पर बनी मेरी फिल्म ‘खड़ी बोली का चाणक्य’ में एक दृश्य है अंग्रेज गवर्नर से भूदेव मुखोपाध्याय की वार्तालाप का. भूदेव मुखर्जी की भूमिका त्रिपुरारि शरण ने की थी. यह दृश्य पूना फ़िल्म इंस्टीट्यूट में फिल्माया था. उस समय त्रिपुरारि शरण इंस्टीट्यूट के निदेशक थे. उन्होंने गवर्नर की भूमिका के लिए टॉम अॉल्टर को राजी कर लिया था और मुझसे मिलवाया भी. त्रिपुरारिजी के संगीत गुरु गया से आये हुए थे. उनके संगीत का एक कार्यक्रम उन्होंने रखा था, जिसमें टॉम अॉल्टर और पेंटल भी आये हुए थे. टॉम अॉल्टर से खत्री जी पर देर रात तक गपियाते रहे. बड़े चाव से खत्री जी के अवदान पर बातें सुनते और आश्चर्य से सवाल करते रहे. वे इस फ़िल्म में अपना सहयोग देने को काफी उत्साहित थे, किन्तु समय पर सेट पूरा न होने के कारण अगली तिथि पर टॉम अॉल्टर न आ सके, जिसका मुझे अफसोस सदा रहा. एकदम लाल चेहरा ! उसपर खूंटीनुमा सफेद दाढ़ी. अत्यंत मृदुभाषी. हिन्दी में बात करते हुए जरा भी एहसास न हुआ कि उनकी मातृभाषा हिन्दी न हो! एक नेकदिल इंसान और बेहतरीन एक्टर के जाने की ख़बर ने मुझे व्यक्तिगत तौर से आहत कर दिया…..सादर नमन!”

टॉम ऑल्टर के बहाने ‘खड़ी बोली का चाणक्य’ टेलीफिल्म पर चर्चा

खड़ी बोली आंदोलन की पृष्ठभूमि पर बनी टेलीफिल्म ‘खड़ी बोली का चाणक्य’ एक ऐसा प्रयोग है, जो मीडिया में भले सुर्खियां न बनी हो, लेकिन साहित्य को आभासी दुनिया के साथ पिरोना का एक नायाब एक्सपेरिमेंट जरूर कहा जा सकता है. वीरेन नंदा ने खड़ी बोली आंदोलन में अयोध्या प्रसाद खत्री के योगदान पर 2001 से शोध कार्य शुरू किया, जो 2007 में टेलीफिल्म के रूप में आकार लिया. इस सपने को साकार करने के लिए वीरेन ने पूरी जिंदगी की कमाई झोंक दी. फिल्म की एडिटिंग के समय पत्नी सीमा नंदा ने अपने गहने बेच कर पैसे दिए. एक घंटे की इस फिल्म को पहली बार 2007 में मुजफ्फरपुर में दिखाया गया, तो राजेंद्र प्रसाद सिंह व अन्य वरीय साहित्यकारों ने मुक्त कंठ से इस प्रयास की सराहना की. वीरेन नंदा कहते हैं कि इस विषय पर फिल्म निर्माण का आइडिया मेरी बेटी से मिली. मेरी बेटी एक निजी स्कूल में पढ़ती थी. हिंदी के शिक्षक ने लिखवाया कि चंद्रकांता उपन्यास के लेखक अयोध्या प्रसाद खत्री हैं. मैंने कहा, उत्तर गलत है. सही उत्तर होगा, देवकीनंदन खत्री. यह घटना मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि जिस अयोध्या प्रसाद खत्री ने अपना पूरा जीवन मुजफ्फरपुर की धरती पर साहित्य साधना में खपा दिया, उनके बारे में शिक्षक को भी जानकारी नहीं है ! तभी मेरे मन में इस विषय पर काम करने का विचार प्रबल हो उठा. वीरेन कहते हैं कि यह बिहार का दुर्भाग्य है कि अयोध्या प्रसाद खत्री पर पहला शोध कार्य यहां के विश्वविद्यालयों में नहीं, जेएनयू में होता है.
इस फिल्म के अधिकांश सीन को गांवों में फिल्माया गया है. मुशहरी (मुजफ्फरपुर) के रघुनाथपुर, डुमरी और रहुआ गांव के दृश्य हैं. गवर्नर वाली सीन को फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे में शूट किया गया था, जिसमें टॉम ऑल्टर को अभिनय करना था. ‘नंदा फिल्म प्रोडक्शन’ के बैनर तले बनी इस टेलीफिल्म की निर्मात्री सीमा नंदा है. निर्देशन व लेखन वीरेन नंदा ने किया है. पटकथा सहयोग स्वाधीन दास, डॉ शेखर शंकर व डॉ सुरेश प्रसाद सिंह सिंह ने किया है. फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे के पूर्व निदेशक त्रिपुरारि शरण ने भूदेव मुखोपाध्याय की भूमिका में हैं. शेखर शंकर, अजय नांदे, शैलेन्द्र राकेश, सोहैब कुरैशी, एसएस रत्नाकर, अशोक आदित्य, मुकेश कुमार, विनय भारती, तारिक इमाम, रंधीर मेहरोत्रा, टीके नारायण, संजय पंकज, अंजना भाटी, सुबंती बनर्जी, दीपंकर सिंह और मास्टर कुशाग्र ने अपनी अदाकारी से फिल्म के दृश्य को जीवंत कर दिया है. बिहार के वर्तमान डीजी गुप्तेश्वर पांडेय ने चंद्रधर शर्मा गुलेरी के चरित्र में जान डाल दी है.

खड़ी बोली के प्रथम आंदोलनकर्ता अयोध्या प्रसाद खत्री
युवा आलोचक राजीव रंजन गिरि ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से ‘खड़ी बोली पद्य का आंदोलन और अयोध्या प्रसाद खत्री` विषय पर शोध किया है. 5-6 जुलाई, 2007 को पटना में खड़ी बोली के प्रथम आंदोलनकर्ता अयोध्या प्रसाद खत्री की 150वीं जयंती आयोजित की गयी थी. इस अवसर पर कवि वीरेन नंदा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘खड़ी बोली का चाणक्य`का प्रदर्शन भी किया गया था और राजीव रंजन गिरि ने व्याख्यान दिया था. जनविकल्प ब्लॉग पर विस्तार से पूरी रपट प्रकाशित की गयी थी. यहां उसका एक सक्षिप्त अंश प्रस्तुत कर रहे हैं-

मौजूदा दौर में हिन्दी-साहित्य का सामान्य विद्यार्थी अयोध्या प्रसाद खत्री को लगभग भूल चुका है. आखिर इसकी वजह क्या है? क्या अयोध्या प्रसाद खत्री का अवदान इतना कम है कि वह साहित्य के विद्यार्थियों के सामान्य-बोध का अंग न बन सकें. अथवा यह हिन्दी-साहित्य के इतिहासकारों और आलोचकों के दृष्टिकोण की खामी है या अध्ययन की किसी खास रणनीति का नतीजा?

भारतेंदु्युग से हिन्दी-साहित्य में आधुनिकता की शुरूआत हुई. उस दौर के रचनाकारों को आधुनिकता की शुरूआत करने का श्रेय दिया जाता है, जो वाजिब है. इसी दौर में बड़े पैमाने पर भाषा और विषय-वस्तु में बदलाव आया. खड़ीबोली हिन्दी गद्य की भाषा बनी. आचार्य रामचंद्र शुक्ल सहित सभी इतिहासकार-आलोचकों ने विषय-वस्तु के साथ-साथ भाषा के रूप में खड़ी बोली हिन्दी के चलन को आधुनिकता का नियामक माना है. गौरतलब है कि इतिहास के उस कालखंड में, जिसे हम भारतेंदुयुग के नाम से जानते हैं, खड़ीबोली हिन्दी गद्य की भाषा बन गई लेकिन पद्य की भाषा के रूप में ब्रजभाषा का बोलबाला कायम रहा. इतना ही नहीं, कविताओं का विषय भक्ति और रीतिकालीन रहा. इस लिहाज से, कविता मध्यकालीन भाव-बोध तक सीमित रही. अयोध्या प्रसाद खत्री ने गद्य और पद्य की भाषा के अलगाव को गलत मानते हुए इसकी एकरूपता पर जोर दिया. पहली बार इन्होंने साहित्य जगत का ध्यान इस मुद्दे की तरफ खींचा. साथ ही इसे आंदोलन का रूप दिया. इसी क्रम में खत्री जी ने ‘खड़ी-बोली का पद्य` दो खंडों में छपवाया. इन दोनों किताबों को तत्कालीन साहित्य-रसिकों के बीच नि:शुल्क बंटवाया. काबिलेगौर है कि इस किताब के छपने के बाद काव्य-भाषा का सवाल एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में उभरा. हिन्दी-साहित्य के इतिहास में ‘खड़ी बोली का पद्य` ऐसी पहली और अकेली किताब है, जिसकी वजह से इतना अधिक वाद-विवाद हुआ. इस किताब ने काव्य-भाषा के संबंध में जो विचार प्रस्तावित किया, उस पर करीब तीन दशकों तक बहसें होती रहीं. इस किताब के जरिए एक साहित्यिक आंदोलन की शुरूआत हुई. हिन्दी कविता की भाषा क्या हो, ब्रजभाषा अथवा खड़ीबोली हिन्दी? इसके संपादक ने खड़ीबोली हिन्दी का पक्ष लेते हुए ब्रजभाषा को खारिज किया. लिहाजा, इस आंदोलन की वजह से परिस्थितियां ऐसी बदलीं कि ब्रजभाषा जैसी साहित्यिक भाषा बोली बन गयी और खड़ी बोली जैसी बोली साहित्यिक भाषा के तौर पर स्थापित हो गई. ‘खड़ी बोली का पद्य` के पहले भाग की भूमिका में खत्री जी ने खड़ी बोली को पांच भागों में बांटा-ठेठ हिन्दी, पंडित जी की हिन्दी, मुंशी जी की हिन्दी, मौलवी साहब की हिन्दी और यूरेशियन हिन्दी. उन्होंने मुंशी-हिन्दी को आदर्श हिन्दी माना. ऐसी हिन्दी जिसमें कठिन संस्कृतनिष्ठ शब्द न हों. साथ ही अरबी-फारसी के कठिन शब्द भी नहीं हों. लेकिन आमफहम शब्द चाहे किसी भाषा के हों, उससे परहेज न किया गया हो. प्रसंगवश, इसी मुंशी हिन्दी को महात्मा गांधी सहित कई लोगों ने हिन्दोस्तानी कहा है.

छोटे बजट में साहित्य पर फिल्म निर्माण कितना संघर्षभरा काम है, इसकी चर्चा करते हुए वीरेन नंदा कहते हैं कि दूरदर्शन में जिसकी पैरवी है, जिसके पास पैसा है, उसकी ही दाल गलती है. किसी बड़े मंच से फिल्म को प्रोमोट कराने का संघर्ष अब भी जारी है.

-अप्पन समाचार न्यूज नेटवर्क

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