पैसे हो या न हो, खाकर जाइए

मुजफ्फरपुर। कुछ लोग समाज की सेवा नाम व दाम कमाने के लिए करते हैं, तो कुछ लोग आत्मसंतुष्टि के लिए और अपनी अंतरात्मा की पुकार पर करते हैं. चुपचाप रचनात्मक काम करते रहते हैं. इस तरह के लोगों का काम भले मीडिया के लिए सुर्खियां न बने, मगर वे उनलोगों के लिए हीरो से कम नहीं होते हैं, जिनके बीच वे काम करते हैं. संवेदनाओं के साथ काम करना और स्वार्थ के लिए काम करने में काफी फर्क होता है. किसी पीड़ित को देखकर कुछ लोग पहले प्रेस फ़ोटोग्राफर को बुलाते हैं, फिर उसकी सेवा का अभिनय करते हैं. कुछ लोगों की संवेदना गरीबों-जरूरतमंदों की तकलीफों को देखकर स्वतः जग जाती है और वे चल पड़ते हैं उनकी मदद करने.

सेवा करना कोई शत्रुघ्न चायवाला से सीखें
शत्रुघ्न साह इसी तरह के लोगों में हैं, जिनके भीतर का सच्चा आदमी बाढ़पीड़ितों की तकलीफों को देखकर जाग उठा. 19 अगस्त को राजवाड़ा बांध टूटने के बाद लोग बांधों पर शरण लेने में लगे थे और उधर शत्रुघ्न पीड़ितों की सेवा के लिए संसाधन जुटाने में लगा था. उसने बांस-बल्ले के सहारे तिरपाल तानकर चाय, चूरा-पकौड़ी, कचरी, चप की दूकान खोली. जिसके पास पैसे नहीं होते थे, उसके लिए मुफ्त सेवा और जिसके पास पैसे होते थे उसके लिए किफायती रेट पर. स्पेशल चाय तीन रुपये, चप तीन रुपये, 50 पैसे प्याजूआ कचरी यानी हर चीज का रेट कम. यह रेट बाढ़ के समय से लेकर आज तक लागू है. शत्रुघ्न बताते हैं कि जब लोग भागकर बांध पर आये, तो बाढ़पीड़ितों की तकलीफ देखी नहीं गयी. लगा अपने लोगों की सेवा करनी चाहिए. तभी मैंने दूसरा काम छोड़कर इस काम में लग गया. मुझे बहुत अच्छा लगता है, जब लोग दुआ देते हैं. मैं अबतक करीब 95 हजार रुपये खर्च कर चुका हूं.

ग्वाला ने भी दूध का दाम कर दिया कम

ग्वालों से दूध लेनेवालों की अकसर शिकायत रहती है कि वे दूध में पानी मिलाते हैं. निःसंदेह ऐसा कुछ लोग जरूर करते हैं, लेकिन सभी को गलत नहीं कहा जा सकता है. बेईमानी और संवेदनहीनता तो हर क्षेत्र में है. लेकिन ईमानदारी और संवेदना लोगों में आज भी बची है. राजवाड़ा भगवान के पशुपालक सीताराम राय उन्हीं ग्वालों में हैं, जिनकी संवेदना पीड़ितों और शत्रुघ्न जैसे नौजवाओं की सेवा को देखकर जागृत हुई. सीताराम ने शत्रुघ्न को कहा कि आप अकेले नहीं हैं, मैं भी आपके साथ हूं. मार्केट में जिस रेट में दूध देता हूं, मुझे उससे दस रुपये कम देना. सीताराम कहते हैं कि इससे बाढ़पीड़ितों को बहुत राहत मिली है. शत्रुघ्न पब्लिक की सेवा कर रहे हैं. इसकी चारों ओर सराहना हो रही है. गांव के बसरूद्दीन मियां कहते हैं कि बाढ़ के समय जिसके पास पैसे नहीं थे, उसके लिए भी शत्रुघ्न की दूकान खुली रहती थी. देवेंद्र उर्फ़ पल्लू यादव बताते हैं कि शत्रुघ्न दिल का राजा आदमी है. परवाह नहीं है कि कितना लाभ हुआ और कितनी हानि हुई. लिट्टी,समोसा, चना, बिस्कुट सबकुछ सस्ता. बाढ़ के समय शत्रुघ्न ने घोषणा कर दिया था कि जिसको पैसा देना है दे, नहीं है तो जाए, लेकिन खाकर जाये.

 

– अप्पन समाचार न्यूज नेटवर्क

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