बाढ़ राहत शिविर : मजबूरी एक, दर्द अनेक

नरौली (मुजफ्फरपुर). नदियों का पानी अब उतरने लगा है, लेकिन बाढ़पीड़ितों की परेशानी कम नहीं हुई है. स्थिति सामान्य होने में अभी कई दिन व कई सप्ताह लगेंगे. हजारों लोग अब भी नदियों, नहरों के तटबंधों पर या राहत शिविरों में शरण लिये हुए हैं. भरपेट भोजन नसीब नहीं हो रहा है. एक सप्ताह से लोग मैला-कुचैला एक ही कपड़ा पहन कर दिन काट रहे हैं, रात के अंधियारे को छांटने में लगे हैं. मवेशी चारे के अभाव में भूखे हैं. गरीब परिवार के बड़े-बुजुर्गों को तो किस्मत में ही आधा पेट, आधी रोटी खाना लिखा है. लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को कौन समझाए कि हम विपदा के मारे हैं. बच्चों को जी भर कर खाये हुए कई दिन हो गये. पांच साल की नूरी की आंखें डबडबायी हैं, क्योंकि शिविर में बांटे गये बिस्कुट के डिब्बे को लेने में असफल रही. लौट कर अपने तंबू में आकर अपनी दादी के पास रोने लगती है. वह कहती है, ‘दादी बिच्कुट , बिच्कुट’. पोती की आंखों में आंसू देख बूढ़ी दादी की आंखें में भी आंसू आ जाते हैं. भगवान, ई दिन देखे ला दे देलन. यह तसवीर मुजफ्फरपुर जिले से 10-15 किलोमीटर दूर मुशहरी प्रखंड के नरौली गांव की है. नरौली चौक से दक्षिण तिरहुत बांध के दोनों तरफ दूर तक तंबू में लोग आठ दिनों से शरण लिए हुए हैं. यहां चार-पांच पंचायतों के सैकड़ों लोग ठहरे हैं. प्रशासन की ओर से जेनेरेटर की व्यवस्था की गयी है, लेकिन पानी की मुकम्मल व्यवस्था नहीं है. कुछ दवाएं यूं ही बांट दी गयी हैं, लेकिन एक भी डॉक्टर की व्यवस्था नहीं है. बीमार पड़ने पर निजी चिकित्सक को ढूंढ़ना पड़ता है. लोग बताते हैं कि दिनरात मिलाकर एक ही बार खाना मिलता है और वह भी दोपहर बाद. बाढ़ पीड़ित सरकारी इंतजाम से संतुष्ट नहीं है.


पहले अंगूठा लगाओ, तब खिचड़ी मिलेगी
हमलोगों को प्रशासन की ओर से पॉलीथिन-तिरपाल नहीं मिला है. कहा जाता है कि वार्ड सदस्य से मिलिए. एक ही टाइम खाना मिलता है. यह कहना है नरौली के सुरेश महतो का. तटबंध पर बने तंबू में चिंता में डूबी शाहजहां खातून कहती हैं कि रात में जब बाढ़ का हल्ला हुआ, तो हमलोग जान लेके भाग आये. घर का सारा सामान बह गया. यहां हम भूखे मर रहे हैं. जब सामान बंटता है, तो उधरे सब लूट लेता है. खिचड़ियो देता है, तो अंगूठा का निशान लगवाके कटोरा में थोड़ा रख देता है. तरीफन खातून की तीन-चार साल की पोती को जब भूख लगी, तो बगल के एक आदमी से उसने एक पूरी मांग कर लाया. तरीफन इशारा करते हुए कहती हैं, बाबू देखिअयु, हमर पोती नंगे हय. देह पर एगो कपड़ा न हय. सब घरे में रह गेल. सात दिन से हम एके साड़ी पहनले हति. पन्नी भी खरीद क लाबे के परल है.

ग्रामीण चिकित्सक ने नहीं लिया फीस
आगे बढ़ने पर हसीना मिलती है. उसके पास भी दुखों का गुबार भर गया है, जो निकल जाना चाहता है. तरीफन व जुबैदा की आेर इशारा करते हुए बोल पड़ती है, देखिये इन दोनों का मुंह कैसे सूखा हुआ है. अभी पानी (स्लाइन) चढ़ा है. धन-संपत्ति डूब जाने की चिंता में बीपी लो हो गया. जब तबीयत बिगड़ गयी, तो नरौली चौक से गांव के डॉक्टर को बुला कर लाये. डॉक्टर साहब बोले कि कोई फीस नहीं लेंगे, केवल दवा का दाम दे देना. यहां सरकारी डॉक्टर का कोई इंतजाम नहीं है.

पूड़ी-भुजिया के लिए छीना-झपटी
नरौली के लक्ष्मी महतो के घर में रखा अनाज पानी में डूब गया. साल भर की मेहनत चंद मिनट में बर्बाद हो गयी. लक्ष्मी ने बताया कि पांच क्विंटल गेहूं व पांच क्विंटल मक्का बाढ़ के पानी में डूब गया. अब खाने-पीने पर भी आफत है. इसी बीच सरैया प्रखंड के रूपौली पंचायत से पूड़ी-भुजिया व अन्य राहत सामग्री लेकर एक गाड़ी पहुंचती है बांध पर. लोग दौड़ पड़ते हैं. छीना-झपटी के बीच कुछ लोग पैकेट लेने से वंचित रह जाते हैं. जिसके हाथ में मिलता है, वह तुरंत चट कर जाना चाहता है. मणिका हरिकेश के रामचंद्र पासवान भी पूड़ी-भुजिया का पैकेट लेने में सफल होता है. वह खाते हुए कहता है कि अभी तक सरकारी कैंप में खाना नहीं मिला है. अभी करीब तीन बज रहा होगा. दिन-रात मिला कर एक ही बार सिर्फ खिचड़ी-चोखा मिलता है. प्राइवेटवाला और शहर से लोग आकर मदद नहीं करता, तो धिया-पुता मर जाता.

घरेलू गैस का है प्रॉब्लम
खबड़ा पंचायत सचिव उपेंद्र साह को नरौली में तिरहुत नहर पर चल रहे सरकारी राहत शिविर को असिस्ट करने की जिम्मेवारी मिली है. उपेंद्र बताते हैं कि इस कैंप पर दबाव अधिक है. एक की जगह चार पंचायत, नरौली, डुमरी, मणिका हरिकेश और मणिका चांद के लोग यहां खाते हैं. गैस सिलिंडर के प्रॉब्लम के कारण आज देर से खाना बना है.

-अप्पन समाचार न्यूज नेटवर्क

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