कृषि कर: जरूरी या मजबूरी

भारत में कृषिगत आय कर के दायरे से बाहर है। लेकिन इसकी आड़ में होने वाली कर चोरी को रोकने के लिए कृषि कर लगाने की बात होने लगी है। इसी मुद्दे से जुड़े सवालों के जवाब

 कृषि टैक्स (कर) विवाद क्या है?
25 अप्रैल को नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने सरकार को कृषि पर कर लगाने का सुझाव दिया। उन्होंने टैक्स चोरी रोकने, टैक्स पेयर्स की संख्या बढ़ाने और टैक्स व्यवस्था के सरलीकरण के लिए यह सुझाव दिया। भारत में सिर्फ 3 प्रतिशत यानि 3.7 करोड़ लोग ही डायरेक्ट टैक्स देते हैं जो दुनियाभर के देशों में सबसे कम टैक्स देने वाली आबादी मानी जाती है। कृषि टैक्स की बात 2015-16 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी की गई थी।

कृषि से होने वाले किस-किस कार्य को कृषिगत आमदनी  की श्रेणी में रखा जाएगा?
कृषि भूमि का किराया, कृषि उत्पाद, कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण, फार्म हाउस से आमदनी, बुवाई, बीज के अंकुरण की प्रक्रिया और कृषि भूमि पर खेती से होने वाली आय को कृषिगत आमदनी की श्रेणी में रखा जाएगा। लगाए गए पेड़, फूल और लता से होने वाली आय, नर्सरी कार्यों, बीज बेचने से होने वाली आय एवं कृषि कार्य से जुड़े अपने साथी से लाभांश लेना भी कृषि आमदनी माना जाएगा।      

कृषि से होने वाले किस किस कार्य को कृषि आमदनी नहीं  माना जाएगा?
पोल्ट्री, डेयरी, मधुमक्खी पालन, समुद्र के पानी से नमक बनाना, खनन से मिलने वाली रॉयल्टी, खड़ी फसल का क्रय और मक्खन बनाना और बेचना, प्राकृतिक रूप से उग आए पेड़ से होने वाली आय, फार्महाउस में टीवी या फिल्म की शूटिंग से होने वाली आय को भी कृषि आमदनी नहीं माना जाएगा। अगर जमीन औद्योगिक क्षेत्र में या फिर किसी व्यस्त जगह पर या किसी वाणिज्यिक भवन से घिरा है, तो उस पर उगने वाली सब्जी से आय भी इस श्रेणी में नहीं रखा जाएगा।

कृषि को किस कानून के तहत टैक्स छूट मिलती है?
भारत में कृषि आय को इनकम टैक्स एक्ट 1961 के सेक्शन 10(1) द्वारा टैक्स से बाहर रखा गया है।

कृषि के नाम पर टैक्स की चोरी कैसे होती है?
देश के ज्यादातर नेता और व्यापारी अपनी आमदनी के बड़े हिस्से को कृषि भूमि से होने वाली आय बताते हैं। कृषि योग्य भूमि अमूमन खानदानी होती है। पर राजनेता और व्यापारी जमीन कहीं भी खरीद लेते हैं और उसे अपनी जागीर बताकर टैक्स की चोरी करते हैं। ये अपने आमदनी के बड़े हिस्से को वर्ष में दो बार (खरीफ एवं रबी) होने वाली आमदनी बताते हैं।     
 
भारत सरकार की कृषि कर पर क्या राय है?
नीति आयोग की सलाह के तुरंत बाद ही भारत सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह विषय शुरू से ही राज्य का रहा है, इसलिए इस पर राज्यों को विचार करना चाहिए।

क्या किसी और पार्टी ने भी कृषि कर की बात कही है?
वित्तीय बिल पर बहस के दौरान दो सांसद, बीजू जनता दल के भर्तृहरि महताब और तृण मूल कांग्रेस के सौगात राय ने कृषि पर कर लगाने की मांग की थी। महताब ने ऐसे बड़े किसानों पर टैक्स लगने की मांग की थी, जिनके पास 20 हेक्टेयर से ज्यादा कृषि भूमि है और जिनकी  वार्षिक आय R1 करोड़ से ज्यादा है। साथ ही वैसी कंपनियों पर भी टैक्स लगने की वकालत की गई थी, जिनकी कमाई करोड़ों में होने के बावजूद कृषि आधारित होने की वजह से टैक्स छूट की मांग कर रहे हैं।

क्या इससे पहले कृषि टैक्स के लिए कोई सुझाव आया था?
1970 के दशक में एन राज समिति ने और 1990 के दशक में राज चेल्लियन समिति ने कृषि पर टैक्स लगाने का सुझाव दिया था। पर उस समय की किसी सरकार ने इस सुझाव को नहीं माना था।  

भारत में कृषि कर का क्या इतिहास है?
आजादी से पहले सिर्फ नौ वर्षों (1860-1865 और 1869-1873) के लिए ही कृषि पर कोई टैक्स लगाने का प्रमाण नहीं मिलता है। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 ने कृषि टैक्स लगाने के अधिकार प्रांतीय सरकारों को दे दिए। बिहार देश का पहला राज्य था जिसने 1938 में कृषि पर टैक्स लगाया था। इसके बाद असम, बंगाल, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, हैदराबाद, त्रावणकोर-कोचीन, मद्रास, राजस्थान, कुर्ग, भोपाल और विंध्य प्रदेश ने भी कृषि कर लागू किया। ये सारे टैक्स आजादी के बाद भी लग रहे हैं। आजादी के बाद संविधान ने भी ये अधिकार राज्यों को ही दिए। हालांकि समय के साथ सभी राज्यों ने या तो कृषि टैक्स को हटा दिया या फिर उसमें सुधार किया। उत्तर प्रदेश ने इसे 1957 में, जबकि बाकी के कुछ राज्यों ने आगे के दशकों में इसे हटा दिया। अभी कुछ राज्यों में कृषि टैक्स मात्र प्लांटेशन से होने वाली आय पर लगता है, जिसमें केरला, तमिलनाडु और असम शामिल हैं। कर्नाटक ने 2016 में कृषि टैक्स हटाया था।

भारत में कृषि टैक्स संवेदनशील मुद्दा क्यों है?
कृषि टैक्स अंग्रेजों के जमाने की याद दिलाता है, जिसे अत्याचारी समझा जाता है। कोई भी सरकार अपने मतदाता को नाराज नहीं रखना चाहता है। आज भी देश में 60 करोड़ आबादी कृषि पर निर्भर है। एक अनुमान के मुताबिक 4.1 प्रतिशत बड़े और मंझोले किसानों से लगभग R25,000 करोड़ का कर राजस्व मिल सकता है। गौरतलब है कि जमींदार तबका सरकार में शामिल है और प्रभावकारी भी है।

साभार : ‘डाउन टू अर्थ’

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