कब तक ब्याही जायेंगी गुड्डे से खेलनेवाली बच्चियां ?

बाल विवाह हमारे समाज की एक बड़ी समस्या है. यह प्रथा बरसों से चली आ रही है. इस कुप्रथा को रोकने के लिए सरकारी व गैरसरकारी स्तर पर कई कार्यक्रम, जागरूकता अभियान चलाये जाते रहे हैं. कानून भी बने हैं, लेकिन आज भी बिहार के गांवों में, कम पढ़े-लिखे समाज में बाल विवाह हो रहे हैं. लड़की के जन्म लेते ही माता-पिता को उसकी शादी की चिंता सताने लगती है. सपने देखते-देखते कुछ बड़ी होती है. सोचती हैं कि बड़ी होकर, पढ़-लिख कर गांव-समाज व देश के लिए कुछ करूंगी. माता-पिता का नाम रौशन करूंगी. मगर उसके सपनों में पंख लगे, इसके पहले ही उसके हाथ पीले कर दिये जाते हैं. 18 से कम उम्र की लड़की का विवाह करना कानूनन अपराध है, लेकिन कानून का डर किसे है? कई लड़कियों की शादी 13-14 की अवस्था पूरी होने से पहले ही कर दी जाती है.

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के पारू प्रखंड का आर्थिक रूप से पिछड़ा एक गांव है सोहांसा. पश्चिमी दियारा इलाके में अवस्थित इस गांव में शिक्षा व जागरूकता की काफी कमी है. सामाजिक कुरीतियों व कुप्रथाओं में जकड़े इस गांव में बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराइयां आज भी व्याप्त हैं. रितू इसी गांव की एक अबोध किशोरी थी, जो पढ़-लिख कर शिक्षक बनना चाहती थी. लेकिन नियति को यह मंजूर नहीं था. पहले पिता की मृत्यु हो गयी. उसके बाद सामाजिक दबाव व आर्थिक कारणों से उसकी विधवा मां ने उसकी शादी 13 साल की उम्र में ही कर दी. एक साल बाद ही उसने एक बच्चे को जन्म दिया. शादी का दूसरा साल आते-आते शारीरिक रूप से वह रुग्ण हो गयी. और फिर वह असमय मौत के आगोश में समा गयी. चांदकेवारी पंचायत के पूर्व मुखिया राजकुमार दास कहते हैं की रितु की मौत का कारण बाल विवाह ही है.

इसी जिले के नेकनामपुर की अनीता की भी शादी 15 साल की कच्ची उम्र में ही कर दी गयी, जबकि वह पढ़ना चाहती थी. उसके माता-पिता की जिद के आगे उस बेटी का कुछ भी नहीं चला. वह कहती हैं कि मेरे माता-पिता दोनों अनपढ़ हैं. वे पढ़ाई के महत्व को नहीं जानते हैं. समझाने पर उल्टे डांटने लगते हैं कि बेटी-टाटी हो. तुम्हारा काम घर बसाना है. पढ़ना-लिखना लड़कों का काम है. अनीता किसी तरह आठवीं तक की पढ़ाई पूरी कर सकी, लेकिन शादी के बाद उसकी आगे की पढ़ाई रुक गयी. उसका पति अनपढ़ है. उसने भी उसे पढ़ने की इजाजत नहीं दी. आज अनीता के सपने टूट चुके हैं. उसकी जिंदगी सिर्फ अपने घरों, पति, सास-ससुर की सेवा तक ही सिमट कर रह गयी है. अब उसने सपने देखना छोड़ दिया है.

अनिता सिर्फ अकेली लड़की नहीं है. हमारे समाज में सैकड़ों अनीता हैं, जिनके सपने बाल विवाह के कारण टूटते-बिखड़ते रहते हैं. बगहा के भैरोगंज इलाके के जुड़ापकड़ी, कदमहवा टोला, मंझरीया, भैंसही, नड्डा समेत कई महादलित बस्तियों में खेलने-कूदने की उम्र में छोटी-छोटी बच्चियों की शादी कर दी जाती है. इन बस्तियों की बच्चियां सोनी, मीना, सीमा, प्रतिमा को विवाह का मतलब पता नहीं है, लेकिन उसके माथे पर सिंदूर सज गयी. छोटे दूल्हे के सिर पर मौड़ी डाल दिया गया. बचपन जिम्मेदारियों के बोझ तले मुरझाने को छोड़ दिया गया, फिर भी मझरिया दलित बस्ती के सुखल डोम, विजयी डोम, दुखंती अपनी बेटियों की शादी कर खुश हैं. मिथिलांचल में भी बाल विवाह की खबरें आती रहती हैं. मधुबनी जिले में छोटी उम्र में बच्चियों के ब्याहे जाने की खबर सुर्खियां बनी थी. हालांकि, बाल विवाह की कुप्रथा धीरे-धीरे कम हो रही है. शिक्षित समाज इस दंश से काफी ऊपर उठ चुका है, लेकिन राज्य में आज भी सैकड़ों गांव हैं, जहां अशिक्षा व गरीबी की वजह से यह कुप्रथा जारी है. खासकर दलित, महादलित और कुछ पिछड़े व अशिक्षित समुदाय में इसका चलन आज भी है.कम उम्र में शादी के कारण कई तरह की समस्याएं उत्पन्न होती हैं. किशोरी का शारीरिक व मानसिक विकास नहीं हो पाता है. इसके अलावा कच्ची उम्र की लड़कियों के कंधे पर पूरे परिवार की पहाड़ जैसी जिम्मेदारियां अचानक आ जाती हैं. स्वाभाविक है कि खेलने-कूदने के उम्र में घर का काम करीने से नहीं कर पायेंगी. ऐसी स्थिति में सास, ननद, पति की डांट, मानसिक व शारीरिक यातना की शिकार होना पड़ता है. अशिक्षित या कम पढ़े-लिखे होने की वजह से वह सही निर्णय भी नहीं ले पाती हैं. कम उम्र में शादी के कारण वह कम उम्र में मां बन जाती है. ऐसी स्थिति में जच्चा-बच्चा की जान पर खतरा काफी बढ़ जाता है. प्रसव के बाद भी शिशु कुपोषण का शिकार हो जाता है. मां रक्त अल्पतता के कारण कमजोर हो जाती हैं.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, भारत बाल विवाह के मामले में दूसरे स्थान पर है. यूनीसेफ के अनुसार (‘विश्व के बच्चों की स्थिति-2009’) विश्व के बाल विवाहों में से 40 प्रतिशत भारत में होते हैं. शादी को दो परिपक्व (बालिग) व्यक्तियों की आपसी सहमति से बना पवित्र रिश्ता माना जाता है, जो जीवनभर के लिये एक-दूसरे की सभी जिम्मेदारियों को स्वीकार करने के लिये तैयार होते हैं. इस संबंध में, बाल विवाह का होना एक अनुचित रिवाज माना जाता है. बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 (Prohibition of Child marriage Act 2006) भारत का एक अधिनियम है, जो 01 नवम्बर 2007 से लागू हुआ. इस अधिनियम के अनुसार, बाल विवाह वह है जिसमें लड़के की उम्र 21 वर्ष से कम या लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम हो. ऐसे विवाह को बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 द्वारा प्रतिबंधित किया गया है.

-चांदकेवारी से पिंकी कुमारी

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