100 सागवान के पौधे लगा अमीर बनने के सपने बाढ़ में बहे

मुजफ्फरपुर. चारों ओर पानी ही पानी. कल तक खेतों में लहलहा रहीं फसलें आज जलसमाधि ले चुकी हैं. रजवाड़ा तटबंध के आसपास बसे लोग घर-बार छोड़कर जितना सामान समेट पाये, लेकर ऊंचे स्थान पर अा गये हैं. जाे सामान घर में रह गये, वे या तो बह गये या गल गये. उसे निकाल पाने का साधन जुटाते, तबतक घर में पानी भर गया. नाव की व्यवस्था हाेती, ताे कुछ सामान निकाल लाते. रजवाड़ा हरिजन आवासीय विद्यालय के पास तटबंध पर माल-मवेशी व बाल-बच्चों के साथ शरण लिए कई लोग मिलते हैं. रजवाड़ा भगवान के हरेंद्र राय, कपिलदेव राय, मोहन राय व भूपेंद्र मिश्रा मिलते हैं. कुरेदने पर सभी अपने-अपने तरीके से होनेवाले नुकसान के बारे में बताने लगते हैं.
इस गांव के किसान हरेंद्र राय के लिए यह बाढ़ तबाही लेकर आयी. हरेंद्र ने सुबह से शाम तक खेतों में पसीने बहा कर सब्जी की खेती की थी, इस उम्मीद में कि इस बार की आमदनी से सिर से कर्ज का बोझ उतार देंगे. घर-परिवार की उन्नति के लिए कुछ नया काम करेंगे. लेकिन हरेंद्र को क्या पता था कि अचानक बाढ़ की मनहूस खबर आधी रात को कहर बरपाती आयेगी और तटबंध को तोड़ती हुई सारे सपनों को अपने साथ बहा कर ले जायेगी. हरेंद्र मायूस होकर बताते हैं कि सात-आठ एकड़ में सब्जी की खेती की थी. चार एकड़ में कद्दू, एक-एक एकड़ में बैंगन व घियुरा, 10 कट्ठा में अरूई, डेढ़ एकड़ में मूली की फसल लहलहा रही थी. करीब डेढ़ लाख रुपये का नुकसान हुआ है. पत्नी रीता देवी महिला समूह की सदस्य है. उसने समूह से 25 हजार रुपये खेती के लिए कर्ज लिया था. दूसरे महाजन से भी सूद पर पैसे लेकर खेती में लगाया था. सारी मिहनत पर पानी फिर गया, सब दह गया.
विलास सहनी की पीड़ा भी हरेंद्र से बहुत अलग नहीं है. इस साल करीब तीन बिगहा में भिंडी, घिउरा, कद्दू, मूली व धान की खेती की थी. अब भी खाद दुकानदार का 12-14 हजार रुपये बाकी है. महाजन से पांच रुपये के सूद पर 30-35 हजार रुपये कर्ज लिया था. विलास अपना दर्द बयां करते हुए कहते हैं कि कुछ हथफेर करके, तो कुछ रुपये गेहूं बेचकर खेती में लगाया था. गेहूं तो गया ही, बाकी फसल भी बर्बाद हो गयी.
अपनी 12 जर्सी नस्ल की गायों व बछड़ाें को लेकर परिवार के साथ बांध पर ठहरे अशोक राय कहते हैं कि नाव की सुविधा होती, तो बेढ़ी में बंद गेहूं की बोरी बच जाती. जिसके पास नाव है भी तो वे हेल्प नहीं कर रहे हैं. तीन एकड़ मक्के व एक बिगहा में लगी धान की फसल चौपट हो गयी. 30-40 क्विंटल भूसा पानी में सड़ जायेगा. अशोक कहता है कि मेरा सबसे बड़ा नुकसान सागवान के पेड़ों का नष्ट हो जाना होगा. 40 हजार रुपये खर्च कर 100 सागवान के पौधे लगाये थे. पौधे बड़े-बड़े हो चुके थे. लेकिन बाढ़ आने के बाद भर छाती पानी में डूबा है. कुछ कटाव के कारण बह गये और जो शेष बचे हैं, जल्दी पानी नहीं उतरा तो, सारे पौधे सूख जायेंगे और हमारा बड़ा नुकसान हो जायेगा. सागवान का पेड़ कीमती बिकता है. तीन साल पहले यह सोच कर लगाया था कि इसे बेच कर अमीर बन जायेंगे, क्योंकि 10 साल बाद यह 20-25 लाख रुपये का हो जायेगा. लेकिन लगता है यह सपना अब अधूरा ही रह जायेगा.
इसी गांव में भूपेंद्र कुमार मिश्रा का मकान हरिजन आवासीय विद्यालय से उत्तर अवस्थित है. भूपेंद्र का घर-बार भी बूढ़ी गंडक नदी में आयी बाढ़ के पानी से घिर चुका है. वे अपने परिवार के साथ तटबंध पर शरण लिए हुए हैं. भूपेंद्र बताते हैं कि मैंने एक एकड़ में धान की खेती की थी. सब डूब गया. लगभग 14-15 हजार रुपये खर्च आया था. चौपट हो गया है.
बाढ़ की यह त्रासदी व दर्दभरी कहानी एक नहीं, सैकड़ों किसानों की है. मणिका विशुनपुर चांद पंचायत भी बाढ़ की चपेट में है. यहां के सरपंच राजेंद्र राय कहते हैं कि अन्नदाता कहलानेवाले किसान हाड़-मांस तोड़कर कड़ी धूप हो, कि बारिश, वे अपने परिवार के लिए सुख-सुिवधा जुटाने में सालों भर लगे रहते हैं, लेकिन प्रकृति के गुस्से का शिकार होकर एक झटके में वे सबकुछ लुटा देते हैं. प्राकृतिक आपदा का सबसे अधिक कोपभाजन कोई होता है, तो वे किसान ही हैं. किसानी ऐसा पेशा है, जिसके हिस्से में सिर्फ दुख, दुर्दिन व दुर्दशा ही आता है.

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